ज़ईफ़ व मौज़ूअ हदीसों के बारे में रसूलुल्लाह (ﷺ) की चेतावनी
हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, “आख़िरी ज़माने में दज्जाल और झूठे होंगे, वे तुम्हारे सामने ऐसी ऐसी हदीसें पेश करेंगे जो न कभी तुमने सुनी होंगी और न ही तुम्हारे पूर्वजों ने। लिहाजा अपने आपको उनसे बचाए रखना, (कहीं ऐसा न हो कि) वे तुम्हें गुमराह कर दें और फ़ितने में डाल दें।” [मुस्लिम (7) मुकदमा, तहावी फी मिश्कातून आसार (2951)]
इस फ़रमाने नबी की रू से आज हममें से हर मुसलमान की यह ज़िम्मेदारी है कि वह हर संभव तरीक़े से खुद को भी ज़ईफ़ व मनगढ़त हदीसों पर अमल से बचाए और दूसरों को भी उनसे रोकने की कोशिश करे।
ज़ईफ़ हदीसों और बिदअत पर अमल से हम कैसे बचें?
इसके लिए सबसे पहले तो यह ज़रूरी है कि किसी भी वक्ता या उपदेशक के बयान किए गए मसले को बिना दलील और बिना हवाला कुबूल न किया जाए। दूसरे यह कि हम अपने अंदर दीनी मसाइल की तहक़ीक़ का शौक़ पैदा करें, खुद किताब व सुन्नत, सहीह हदीसों की किताबें (जैसे बुख़ारी व मुस्लिम आदि) और अन्य दीनी किताबों का अध्ययन करें, इस्लामी इल्म को हासिल करने के लिए वक्त निकले जहां किसी करीम सल्ल० का मुताअला ज़रूरी है, लेकिन हम आज यह यकिन कैसे करें कि मौजूदा हदीसें हेर फेर वाली या झूठी नहीं?
निवेदन है कि आप यह मन में रखें मैं हदीसों को न तो सहीह कहता हूं और न ही किसी हाल में ग़लत कहता हूं, लेकिन कुछ मुसलमानों ने जितनी भी हदीसें मुझसे बयान कीं वे सब की सब ज़ईफ़ और मौज़ूअ थीं, मैं यथा सामर्थ हदीसों पर अमल करता हूं आपसे निवेदन है कि इस विषय में मालूमात देकर मदद करें?
अल्लाह तआला ने अपने दीन की हिफ़ाज़त का जिम्मा ले रखा है और इसी बारे में अल्लाह की किताब की हिफ़ाज़त भी एक चमत्कार है और उसके साथ सुन्नत नबवी है जो कि क़ुरआन मजीद को समझने में मददगार है, अल्लाह तआला का आदेश कुछ इस तरह है:
“बेशक हमने ही ज़िक्र (कुरान) को नाज़िल फ़रमाया और हम ही उसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं।" [सूरह हिज्र-9]
इस आयत मे ज़िक्र से तात्पर्य क़ुरआन व सुन्नत हैं क्योंकि ये दोनों ज़िक्र में शामिल होता है।
बहुत से लोगों ने अतीत और वर्त्तमान में यह कोशिश की कि पाक शरीअत और हदीसे नबवी में ज़ईफ़ और मौज़ूअ हदीसें दाख़िल की जाएं लेकिन अल्लाह तआला ने उनकी यह कोशिश कामयाब नहीं होने दी और ऐसे कारण उपलब्ध कर दिए जिससे अपने दीन की हिफ़ाज़त फ़रमाई, उन्हीं कारणों में से सिकह उलमाए किराम की जमाअत है। जिन्होंने हदीसों की रिवायतों की छान फटक की, उनके मसादिर का पीछा किया और रावियों के हालात का पता चलाया।
यहां तक कि उन्होंने यह भी बताया कि रावी को मुलाकात कब हुइ और मुलाकात से पहले उससे किसने रिवायत की और मुलाकात के बाद किसने रिवायत बयान की, और वे यह भी जानते हैं कि रावी ने सफ़र कहां और कितने किए और किस किस देश और शहर में दाखिल हुए और वहां किस किस से हदीसें हासिल कीं, तो इस तरह यह एक लम्बी सूची बन जाती है जिसकी गणना संभव नहीं, यह सब कुछ इस पर दलालत करता है कि इस्लाम के दुशमन जितनी भी हेर फेर की कोशिश कर लें फिर भी यह उम्मत अपने दीन की हिफ़ाज़त करती है और दीन महफ़ूज़ है।
हाफ़िज़ ज़हबी रह० ने ज़िक्र किया है, "हारून रशीद एक ज़िन्दीक़ को क़त्ल करने लगा तो उस जालिम ने कहा, उन एक हज़ार हदीसों का क्या करोगे जो मैंने गढ़ी हैं, तो हारून रशीद कहने लगा : ऐ अल्लाह के दुश्मन तू कहां फिर रहा है अबू इसहाक़ फ़ज़ारी और अब्दुल्लाह बिन मुबारक रह० उनकी छान फटक करके एक एक अक्षर निकाल देंगे।"
शागिर्द हदीसों की सनदों और रिजाल किताबों और जिरह व तादील से रावियों के हालात देखते हुए आसान व सरलता से ज़ईफ़ और मौज़ूअ हदीसों को पहचान सकता है।
बहुत सारे उलमा ने ज़ईफ़ और मौज़ूअ हदीसों को एक जगह पर भी जमा कर दिया है (जैसा कि अगले टॉपिक के अन्तर्गत उनका ज़िक्र आ रहा है। ताकि इंसान को उसकी पहचान में आसानी रहे और वह ज़ईफ़ और मौज़ूअ हदीसों से खुद भी बचे और दूसरों को भी बचने की नसीहत करे।
और जिस तरह सवाल करने वाले का यह कहना है कि वह ज़ईफ़ और मौज़ूअ हदीसें सुनता है, तो अल्लाह का शुक्र है कि उससे यह वात प्रकट होती है कि वह सही, ज़ईफ़ और मौज़ूअ में अन्तर करता है, यह अल्लाह तआला की कृपा है जो कि इस बात पर दलालत करता है। कि अल्लाह तआला उस दीन की हिफ़ाज़त करता है, उसके बारे में ऊपर बयान किया जा चुका है।
हम प्रश्न कर्त्ता को यह नसीहत करते हैं कि वह जिरह व तादील और मुस्तलहुल हदीस की किताबों का अध्ययन करे ताकि उसे सुन्नते नबवी में की गई सेवा की पहचान हो, अल्लाह तआला ही सौभाग्य प्रदान करने वाला है।
वे किताबें जिनमें ज़ईफ़ हदीसें जमा करने की कोशिश की गई है-
1. सिलसिला अहादीस ज़ईफ़ा लिलअलबानी
2. ज़ईफ़ जामेअ सगीर लिलअलबानी
3. ज़ईफ़ अत्तर्गीब वत्तर्हीब लिलअलबानी
4. ज़ईफ़ अबू दाऊद लिलअलबानी
5. ज़ईफ़ तिर्मिज़ी लिलअलबानी
6. ज़ईफ़ नसाई लिलअलबानी
7. ज़ईफ़ इब्ने माजा लिलअलबानी
8. फ़वाइद मज्मूआ फ़िल अहादीस मौज़ूअ लिल शौकानी
9. अल असरारुल मरफ़ूआ फ़िल अहादीस मौज़ूअ इब्ने इराक़
10. अल आला मसनूआ फ़िल अहादीस मौज़ूअ लिलसुयूती
11. अलल मुतनाहिया फ़िल अहादीस मौज़ूअ लिलसुयूती
12. किताबुल मौज़ूआत इब्ने जोज़ी
13. अल मिनारुल मुनीफ़ इब्ने क्रय्यिम
एक हदीस में रसूलुल्लाह सल्ल० का यह फ़रमान मौजूद है :
و مَنْ حَدَّثَ عَنِّى بِحَدِيثٍ يَرَى أَنَّهُ كَذِبٌ فَهُوَ أَحَدُ الْكَاذِبِينَ
“जिसने मुझसे कोई हदीस बयान की और वह जानता भी है कि यह झूठ है तो वह खुद झूठों में से एक है।" [मुस्लिम मुक़दमा : बाब वजूब रिवायह, तिर्मिज़ी (2662) किताबुल इल्म, इब्ने माजा (41) मुक़दमा, अहमद (20242) इब्ने हिब्बान (29) मुसनद ए तयालिसी (1/38) इब्ने अबी शैबा (8/595)]
एक और हदीस में ये शब्द हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, “मुझ पर झूठ न बांधो क्योंकि जो मुझ पर झूठ बांधता है वह आग में दाख़िल होगा ।" [मुस्लिम (1) मुक़दमा, बुखारी (106) किताबुल इल्म, तिर्मिज़ी (2660) किताबुल इल्म, इब्ने माजा (31) मुक़दमा, अवू याला (613) तयालिसी (107)]
हदीसें गढ़ने के कारण:
जिन कारणों से हदीसें गढ़ी गईं उनमें से कुछ एक का संक्षेप में तजकिरा यह है :
1. अल्लाह से करीब होने की नीयत
हदीसें गढ़ने वाला अपने आप में लोगों को नेकी और भलाई की इल्म देने का इच्छुक होता है, या उन्हें बुराइयों से रोकना चाहता है और कुछ बातें बनाकर हदीसों की सूरत में बयान करता है। ऐसे लोग अमूमन पीर ज़ाहिद और सूफ़ी जैसे होते हैं और ये सबसे बुरी हदीसें गढ़ने वाले माने जाते हैं। क्योंकि लोग उनकी ज़ाहिरी शक्ल व सूरत और तक़वा के कारण उनकी बातों को बहुत जल्द क़ुबूल कर लेते हैं, जैसे मैसरा बिन अब्द रुबा। इमाम इब्ने हिबान रह० अपनी “किताबुज़्ज़ुअफ़ा” में इब्ने मेहदी से रिवायत करते हैं कि मैंने मैसरा से पूछा, आप ये हदीसे कहां से लाते हैं कि अगर कोई फलां फलां चीज़ पढ़े तो उसके लिए यह यह सवाब है आदि। तो उसने जवाब दिया कि ये बातें मेरी अपनी गढ़ी हुई होती हैं। मैं इस तरह लोगों को भलाई और नेकी की तरफ प्रोत्साहित करता हूं।' [तदरीब रावी (1/282) हवाला, तैसीर मुस्तलहुल हदीस]
2. अपने धर्म की पुष्टि व बढ़ावा
राजनीतिक व धार्मिक सम्प्रदायों के प्रकटन के बाद जैसे ख्वारिज और शीआ आदि, हर गिरोह के लोगों ने अपने धर्म की पुष्टि व बढ़ावे के लिए हदीसें गढ़ीं। जैसे यह रिवायत कि "अली लोगों में सबसे श्रेष्ठ हैं। और जो इसमें सन्देह करे वह काफ़िर है।"
3. दीने इस्लाम पर दोष लगाना
ज़िन्दीक़ लोग जब इस्लाम में किसी और तरह खुले तौर पर बिगाड़ पैदा न कर सके तो खुफ़िया तौर पर उन्होंने यह राह अपना ली और फिर बहुत ही गन्दी और नापसन्दीदा बातें हदीसों व रिवायतों की शक्ल में लोगों के अंदर फैला दीं। फिर उन्हीं की बुनियाद पर इस्लाम को बदनाम करने लगे। जैसे मुहम्मद बिन सईद शामी एक प्रख्यात ज़िन्दीक़ था। उसके उन कुरूप कामों की बिना पर ही उसे सूली पर लटकाया गया और (फिर वह) "अलमसलूब" कहलाया। इसकी (गढ़ी हुई) एक रिवायत इस तरह है जो वह अनस रज़ि० से मरफ़अन ज़िक्र करता था “मैं ख़ातिमुन्नबिय्यीन हूं, मेरे बाद कोई नबी नहीं या यह कि अल्लाह चाहे। [तदरीब रावी (1/284) हवाला, तैसीर मुस्तलहुल हदीस]
4. वक्त के शासक से क़रीब होना
कुछ कमज़ोर ईमान वाले लोग समय की सत्ता की इच्छाओं के लिए कुछ रिवायतें गढ़ कर उनके सामने बयान करते और उन्हें खुश करके उनके यहां अपना दर्जा बढ़ाने की कोशिश करते थे। जैसे ग़यास बिन इब्राहीम नख़ई कूफ़ी। उसकी मशहूर घटना यह है कि जो अमीरुल मोमिनीन मेंहदी अब्बासी के यहां घटी। यह शख्स जब ख़लीफ़ा के यहां गया तो देखा कि वह कबूतरों से खेल रहा है। उसने जाते ही अपनी सनद से रसूलुल्लाह सल्ल० तक एक गढ़ी हुई हदीस सुनाई जो इस प्रकार थी :
"आप सल्ल० ने फ़रमाया, मुक़ाबला सिर्फ़ नेज़ाबाज़ी, ऊंट दौड़, घुड़ दौड़ और परिन्दों (कबूतरों आदि) में ही जाइज़ है।”
गयास ने उल्लिखित रिवायत में परिन्दों के पर या कबूतर आदि के शब्द अपनी तरफ़ से बढ़ा दिए थे कि ख़लीफ़ा खुश हो जाए। मगर मेंहदी को इस गढ़ी हुई हदीस का पता हो गया तो उसने कबूतरों को ज़बह करने का हुक्म दिया और कहा कि “मैंने ही इस व्यक्ति को ये गढ़े हुए शब्द रसूल के फ़रमान में ज्यादती करने पर उभारा है।”
5. रिवायतों का बयान रोजी रोटी का सोर्स बना लेना
कुछ जाहिल मौलाना और क़िस्सा सुनाने वाले लोग अवाम में बेबुनयाद रिवायतें बयान करते है जिनमें अजीब सा ससपेन्स होता और इस तरह वह चाहते कि लोग उनकी महफ़िलों में बैठें और नज़राने पेश करें। अबू सईद मदायनी का नाम इन्हीं में शामिल है।
6. शोहरत की ख्वाइश
कुछ लोग ऐसी ऐसी विचित्र रिवायतें बयान करते हैं कि यह किसी और के पास नहीं हैं, या वे सनदें बदल देते हैं ताकि लोग उनकी तरफ़ आकृष्ट हों और उन्हें ख्याति मिले। जैसे इब्ने अबी दहया और हिमादुन्नसीबी।' [तदरीब रावी (1/286) हवाला, तैसीर मुस्तलहुल हदीस]
ज़ईफ़ हदीसों पर अमल, असल में बिदअतों की ईजाद है
फ़ज़ाइल और तर्गीब व तहब में ज़ईफ़ हदीसों को बयान करने और उन पर अमल को मुस्तहब क़रार देने का नतीजा यह हुआ कि बिदअतों व खुराफ़ात की शुरुआत हुई। लोगों ने अल्पज्ञान वक्ताओं से ज़ौफ़ के स्पष्टीकरण के बिना ज़ईफ़ हदीसें सुनीं और उन पर अमल शुरू कर दिया। धीरे धीरे यह अमल ऐसा पक्का हुआ कि लोगों ने इसी को दीन समझ लिया और यह जानने की ज़रूरत ही महसूस नहीं की कि क्या जो अमल हम दीन समझ कर अपनाए बैठे हैं उसकी बुनियाद किताब व सुन्नत है या ज़ईफ़ व मनगढ़त रिवायतें हैं। फिर आने वाली नस्लों ने जिस तरह अपने बुजुर्गो को उन बिदअतों पर अमल करते हुए देखा उसी तरह खुद भी उन्हें अपना लिया और सही हदीसों के मुक़ाबले में अपने बड़ों के अमल को ही सही समझा। परिणाम स्वरूप लोगों के अक़ीदे व कर्म ज़ईफ़ और गनगढ़त हदीसों की भेंट चढ़ गए।
1. पहली हदीस - वुज़ू के दौरान गर्दन का मसह करना
इस अमल की बुनियाद कुछ ज़ईफ़ रिवायतें हैं जिनमें से एक यह है :
हज़रत वाईल बिन हजर रज़ि० से मरवी एक बड़ी मरफ़अ रिवायत में ये शब्द हैं, “आप सल्ल० ने (वुज़ू करते हुए) अपनी गर्दन का मसह किया।"
इसी तरह एक दूसरी मनगढ़त रिवायत यूं है :
مَسْحُ رَقَبَةٍ أَمَانٌ مِنَ الْغُلَّ
“गर्दन का मसह (क़ियामत के दिन) तौक़ से बचने का साधन।"
देखिये – मौजूअ : सिलसिला ज़ईफ़ा (69)
तखरिज - कश्फुल अस्तार लिल बज़्ज़ार (1/140) यह रिवायत तीन रावियों की बिना पर ज़ईफ है। (मुहम्मद बिन हजर), इमाम बुख़ारी रह० ने उसे महत्वहीन कहा है और इमाम ज़हबी रह० ने कहा है कि इसके लिए मनाकीर हैं। (2) (सईद बिन अब्दुल जब्बार) इमाम नसाई रह० ने इसे कमज़ोर कहा है। (3) (इब्ने तुर्कमानी रह०) बयान करते हैं कि मुझे इसके हाल और नाम का कुछ पता नहीं। मीज़ानुल ऐतिदाल (3/511), (2/147) जीहर नकी जैल सुनन कुंबरा लिल बेहेकी (230)
2. दूसरी हदीस - वुज़ू के बाद आसमान की तरफ़ देखना और उंगली उठाना
यह काम किसी सहीह हदीस से साबित नहीं इसी लिए उलमा ने इसे बिदअत में कहा है। और जिस रिवायत में आसमान की तरफ़ देखने का ज़िक्र है उसमें इब्ने अम्म अबी अक़ील रावी नामालुम है इसलिए वह ज़ईफ़ है।
देखिये – (ज़ईफ़ : ज़ईफ़ अबू दाऊद (31) किताबुत्तहारत, दाऊद (170) इब्ने सुन्नी (31) अहमद (4/150) हाफ़िज़ इब्ने हजर रह० ने इसे ज़ईफ़ कहा है। तल्ख़ीस हुबैर (1/130)
3. तीसरी हदीस - अज़ान के दौरान अंगूठों के साथ आंखें चूमना
इस काम की बुनियाद वह रिवायत है जिसमें उल्लेख है कि “जिस व्यक्ति ने मुअज़्ज़िन के यह कलिमात “अशहदु अन्न मुहम्मदर्रसूलुल्लाह” सुनकर कहा “मरहबन बिहबीबी व कुर्रति एैनी मुहम्मदुबनु अब्दिल्लाहि" फिर अपने अंगूठों का बोसा लेकर उन्हें अपनी आंखों पर लगाया, वह कभी आंख की तकलीफ़ का शिकार नहीं होगा।" यह रिवायत ज़ईफ़ है।
देखिये – (सिलसिला ज़ईफ़ा (73) इमाम सख़ावी रह० ने इस रिवायत को नक़ल करने के बाद कहा है कि इससे कुछ भी मरफ़ूअ साबित नहीं।)
इसी तरह एक दूसरी ज़ईफ़ रिवायत में उल्लेख है कि जो व्यक्ति इस तरह करेगा उसे मुहम्मद सल्ल० की शफ़ाअत नसीब होगी
देखिये – (सिलसिला जईफ़ा (73)
अब जरा आप अपने अंदर झांक कर देखें, आप कुरान पर कितना अमल करते हैं, या सुन्नत पर कितना अमल करते हैं। नबी (ﷺ) से मोहब्बत करने का मतलब यह नहीं है कि सिर्फ वो काम करें जिनसे उन्होंने दूरी अख्तियार की। आप (ﷺ) ने फरमाया, "जिस अमल पर हमारा हुक्म नहीं वो अमल रद्द हैं।" [सहीह बुखारी-2697]
कुछ गुमराह मुसलमान यह मानते हैं कि यह एक बिद्अत है और कहते हैं कि यह एक अच्छी बिद्अत है। इस सवाल का जवाब यह है कि,
रसूल अल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया, "हर बिद्अत गुमराही है।" [सहीह मुस्लिम-867A]
इब्न उमर (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ) बयान फरमाते हैं, "हर बिद्अत गुमराही है अगरचे लोग उसे अच्छा ख्याल करें।" [ऐतिक़ादू अहलिसुन्नह-126]
अब्दुल कादर मंसूरी
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