खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (057) अल हदीद
सूरह (057) अल हदीद
(i) अल्लाह की सिफ़ात का बयान
अल अज़ीज़, अल हकीम, अल क़दीर, अल अव्वल, अल आख़िर, अज़ ज़ाहिर, अल बातिन, अल अलीम, अल बसीर, अर रऊफ़, अर रहीम, अल ख़बीर, अल अज़ीम, अल ग़नी, अल हमीद, अल क़वी, अल ग़फ़ूर वग़ैरह। (1 से 4, 9, 10, 24, 25, 28)
(ii) अल्लाह हमारे साथ कहाँ कहाँ होता है?
अल्लाह तुम्हारे साथ होता है जहाँ कहीं भी तुम होते हो (4)
(iii) फ़तह ए मक्का से पहले और बाद में ईमान लाने वालों में फ़र्क़
फ़तह ए मक्का से पहले जिन्होंने अपना माल ख़र्च किया और जिहाद किया उनके बराबर वह नहीं हो सकते जिन्होंने बाद में ख़र्च किया और जिहाद किया। (आयत 10)
(iv) क़र्ज़े हसन
जो माल अल्लाह की राह, दीन की सुरक्षा और उसको संसार के तमाम इंसानों तक पहुंचाने हेतु ख़र्च किया जाय उसमें दिखावा या शुहरत शामिल न हो, एहसान न जताया जाय केवल उद्देश्य अल्लाह रज़ा हो तो अल्लाह ऐसे क़र्ज़ को क़र्ज़े हसन क़रार देता है। क़यामत के दिन अल्लाह तआला उसे कई गुना बढ़ा कर वापस करेंगे और अपनी तरफ़ से और भी इनआम देंगे। (11)
(v) मोमिनों के लिए नूर
क़यामत के दिन मोमिनों को एक नूर दिया जाएगा जो उनके दाएं बायें और सामने दौड़ रहा होगा। इसकी रौशनी में वह चल रहे होंगे जबकि काफ़िर और मुनाफ़िक़ इस नूर से महरूम होंगे। (12)
(vi) दुनिया की ज़िंदगी एक धोखा है
जान रखो कि दुनिया की ज़िंदगी महज़ खेल और तमाशा और ज़ाहिरी ज़ीनत और आपस में एक दूसरे पर फ़ख्र क़रना और माल और औलाद की एक दूसरे से ज़्यादती की ख़्वाहिश है। दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल बारिश की सी है जिस की वजह से किसानों की खेती लहलहाती और उनको ख़ुश कर देती है फिर सूख जाती है तो उसको देखता है कि पीली पड़ गई है फिर चूर चूर हो जाती है और आख़िरत में (कुफ़्फ़ार के लिए) सख़्त अज़ाब है और (मोमिनों के लिए) अल्लाह की तरफ़ से बख़्शिश और ख़ुशनूदी है और दुनियावी ज़िन्दगी तो बस धोखे का साज़ो सामान है। (आयत 20)
(vii) लोहे के फ़ायदे
लोहा से मुराद राजनीतिक और जंगी ताक़त है, इस के ज़रिए से अदल व इंसाफ़ क़ायम करना है। और हक़ व न्याय व्यवस्था से बग़ावत करने वालों को सज़ा देना है। (25)
(viii) रुहबानियत (monasticism)
रुहबानियत से मुराद किसी ख़ौफ़ की वजह से दुनिया छोड़कर किसी कुटी या जंगल की पनाह लेना, या दुनिया की ज़िंदगी के कष्ट से भाग कर जंगलों और पहाड़ों में पनाह लेना सबसे तअल्लुक़ तोड़कर किसी जगह तन्हा बैठ जाना। यह एक ग़ैर इस्लामी चीज़ है और यह कभी दीन हक़ में शामिल नहीं रही। (27)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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