Khulasa e Qur'an - surah 58 | surah mujadila

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir


खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (058) अल मुजादिला 


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (058) अल मुजादिला 


(i) ज़िहार और उसका बदला

क़बीला खज़रज की एक महिला ख़ौला बिन्ते सअलबा थीं जिनका विवाह क़बीला औस के सरदार उबादह बिन सामित के भाई औस बिन सामित से हुआ था। अरब में एक बुरा रिवाज यह था कि वह अपनी बीवी को "तुम मुझ पर मेरे मां की पीठ या पेट की तरह हो कह देते थे" जिसका मतलब यह था कि जिस तरह मां से संभोग हराम है उसी तरह उनकी बीवियां उनपर हराम हो गईं गोया कि यह तलाक़ से भी ज़्यादा सख़्त मामला था। चुनांचे औस बिन सामित ने भी ज़िहार कर लिया। ख़ौला बिन्ते सअलबा अल्लाह के रसूल के पास अपनी शिकायत लेकर पहुंचीं। पहले तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़ामोश रहे। उन्होंने बच्चों का वास्ता दिया कि उनकी जिंदगी ख़राब होगी लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यही जवाब दिया कि मेरा ख़्याल है कि तुम अपने शौहर पर हराम हो गईं। यह सुनकर ख़ौला ने अल्लाह से शिकायत की और बार-बार शिकायत की। चुनांचे अल्लाह ने उनकी शिकायत सुन ली और यह सूरह नाज़िल हुई जिसमें ज़िहार को एक झूठ और गंदा अमल क़रार दिया गया और उसके लिए कफ़्फ़ारह का ज़िक्र किया गया। 

 ◆ ग़ुलाम आज़ाद किया जाय 

◆ या दो महीने लगातार रोज़ा रखा जाय, 

◆ या साठ मिस्कीनों को खाना खिलाया जाय। (1 से 6 तक)


(ii) आदाब

◆ अगर किसी मजलिस में हों तो कानाफूसी न की जाय यह शैतानी काम है। 

◆ यहूदी और मुनाफ़ेक़ीन सलाम करते तो अस सामु अलैकुम (तुम को मौत आ जाए) कहते इसलिए अस्सलामु अलैकुम (तुमपर सलामती हो) कहा जाय। 

◆ जब मजलिस में कुशादगी इख़्तियार करने को कहा जाय तो जगह कुशादह कर दिया जाय और जब रुख़सत होने को कहा जाय तो रुख़सत हो जाना चाहिए। (7, 8, 11)


(iii) शैतानी पार्टी

जिनके दिलों पर शैतान ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है और अल्लाह की याद उनके दिल से भूला दी है इसीलिए यह लोग क़समें खा खा कर यक़ीन दिलाते हैं और अल्लाह व उसके रसुल से जंग करते हैं। दर हक़ीक़त यह शैतान की पार्टी के लोग हैं और शैतानी पार्टी ही नुक़सान में है। (19)


(iii) अल्लाह की पार्टी 

जो लोग अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह अल्लाह और उसके रसूल के दुश्मनों से मुहब्बत नहीं करते चाहे वह उनके अपने बाप, भाई, बेटे, ख़ानदान ही क्यों न हो। यह अल्लाह की पार्टी वाले हैं। और अल्लाह की पार्टी वाले ही कामयाब हैं। (22)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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