खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (043) अज़ ज़ुख़रूफ़
सूरह (043) अज़ ज़ुख़रूफ़
(i) उम्मुल किताब क्या है?
वास्तविक किताब, वह किताब जिसमें तमाम अंबिया पर नाज़िल होने वाली किताबें मुकम्मल तौर पर महफ़ूज़ हैं, इसे सूरह 56 अल वाक़िआ में "किताबे मकनून" (छुपी हुई और सुरक्षित) और सूरह 85 अल बुरूज में "लौहे महफ़ूज़" (सुरक्षित तख़्ती) कहा गया है। जिसमें लिखी हुई बातें किसी भी प्रकार मिट नहीं सकतीं, वह हर प्रकार से सुरक्षित है। (4)
(ii) अल्लाह की क़ुदरत
◆ आसमान और ज़मीन की तख़लीक़, ◆ ज़मीन को इंसान की गोद, ◆ ज़मीन और उसमें मुख़्तलिफ़ रास्ते, ◆ आसमान से एक मिक़दार में बारिश, ◆ मुर्दा ज़मीन को दोबारा ज़िंदगी देना, ◆ तमाम मख़लूक़ के जोड़े, ◆ कश्ती, ◆ सवारी के जानवर वग़ैरह (09 से 12)
(iii) सफ़र की दुआ
سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَـٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ
पाक है वह जिसने इसको हमारे कंट्रोल में किया जबकि उस पर क़ाबू पाना हमारे बस में न था। और हमको तो यक़ीनन अपने रब की तरफ़ ही पलट कर जाना है। (13,14) (सही, मुस्लिम हदीस नंबर 1342/ किताबुल हज्ज)
(iv) लड़कियों को अपने लिए ज़िल्लत समझना
कुफ़्फ़ारे मक्का को जब लड़की की पैदाइश की ख़ुशख़बरी सुनाई जाती है तो उनके चेहरे काले पड़ जाते हैं और वह ग़म से पागल होने लगता है। हालांकि यही फ़रिश्तों पर ख़ुदा की बेटी होने का इल्ज़ाम लगाते हैं। (16 से 20)
(भारत में भी लड़की के जन्म को अपने हक़ में ज़िल्लत समझा जाता है यही वजह है कि गर्भपात का अनुपात दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है)
(v) बाप दादा और बुज़ुर्गों की अंधी तक़लीद
कुफ़्फ़ारे मक्का नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दावत का इंकार यही कहते हुए करते थे और जितनी क़ौमें पहले गुज़र चुकी हैं वह भी यही कहती थीं कि إِنَّا وَجَدۡنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٖ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَٰرِهِم مُّقۡتَدُونَ
"हमने बाप दादा को इसी रास्ते पर पाया है। हम तो उन्हीं के नक़्श क़दम पर चलेंगे"(23)
(v) कुफ़्फ़ार की आपत्तियां
यह जादूगर है, क्या क़ुरआन के नुज़ूल के लिए यह यतीम ही मिला था, क्यों न दो बड़े शहरों (मक्का और तायफ़) के दो बड़े बड़े आदमियों पर यह कलाम नाज़िल हुआ। (30, 31)
(vi) काफ़िरों का ऐश व आराम देख कर मोमिन को दुनिया तलब नही करना चाहिए
"अगर यह बात न होती कि सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम कुफ़्फ़ार के घरों की छतें, सीढ़ियाँ, दरवाज़े और गाऊ तकिया तक सोने चांदी का बना देते। नेक लोगों के लिए तो आख़िरत में उनके रब के पास ऐश व आराम होगा। (33 से 35)
(vii) जिगरी दोस्त भी एक दूसरे के दुश्मन
दुनिया में एक दूसरे से कितना ही घनिष्ठ मित्रता क्यों न हो परन्तु क़यामत के दिन शत्रु नज़र आएंगे
الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ
जिगरी दोस्त क़यामत के दिन एक दूसरे के दुशमन होगें अलबत्ता नेक लोगों के दोस्त आपस में दोस्त रहेंगे। (आयत 67)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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