Khulasa e Qur'an - surah 36 | surah yaseen

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (036) यासीन 


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (036) यासीन 


(i) हबीब नज्जार का वाक़िआ 

एक बस्ती वालों ने अपने तीन रसूलों को झुठलाया और क़त्ल के दरपे हुए तो उनकी क़ौम के एक शख़्स हबीब नज्जार ने उन्हें समझाने की कोशिश की और दो बातें रखीं "इन रसूलों की पैरवी कर लो जो तुमसे बदले में कुछ नहीं मांगते" और "हिदायत पर भी हैं" लेकिन क़ौम ने समझने के बजाय उस शख़्स को ही शहीद कर डाला। जन्नत में भी जाकर भी उसकी तमन्ना यही थी कि يَٰلَيۡتَ قَوۡمِي يَعۡلَمُونَ "काश मेरी क़ौम जानती" कि मुझे कैसी कैसी नेअमतें अता की गई हैं। (20 से 27)


(ii) अल्लाह की क़ुदरत के दलाएल

● मुर्दा ज़मीन का बारिश से ज़िंदा हो कर पौधे और दाने निकालना, दुनिया में हर चीज़ का जोड़े जोड़े होना। (33 से 36)

● दिन के उजाले को रात के अंधेरे में तब्दील कर देना, सूरज का अपनी axis पर घूमना और चांद की एक हद (limit) मुक़र्रर करना कि वह अपनी मंज़िल (limit) पर पहुंच कर पुरानी चाल पर लौट आए। फ़लक में हर चीज़ का गरदिश करना और कश्ती का समुद्र में चलना। (37 से 43)

● बड़े बड़े जानवरों को इंसान के कंट्रोल में देना, कुछ पर सवारी तो कुछ को ख़ोराक के लिए मख़सूस करना वगैरह। (71, 72)


(iii) आख़िरत

हश्र के दिन की हौलनाकियां, सूर फूंके जाने का आदेश, नेक व बद को अलग अलग करने का आदेश, मोमिनों के लिए जन्नत और उसकी नेअमतों की ख़ुशख़बरी, मुजरिमों के मुंह पर मुहर लगा कर उनके के हाथ पैर और मुख़्तलिफ़ अंगों की गवाही और उनका इबरत्नाक अंजाम। आयत 51 से 67 तक आख़िरत का ऐसा मंज़र खींचा गया है कि पढ़ते हुए अपनी आंख के सामने सीन चलता हुआ महसूस होता है।


(iv) अल्लाह की शान (कुन फ़ यक़ून)

इंसान को इस बात पर तअज्जुब क्यों है कि उसके मरने के बाद पुरानी हड्डियों में पुनः जान कैसे डाली जाएगी? वह ख़ालिक़ के लिए तो मिसालें बयान करता है और अपनी पैदाइश के मरहले को भूल जाता है, वह आसमान और ज़मीन की तख़लीक़ पर ग़ौर क्यों नहीं करता? क्या उसे नहीं पता कि हरे भरे दरख़्तों से आग कैसे पैदा होती है जिसे वह अपने घर में जलाता है। अल्लाह तो ज़बरदस्त ख़ालिक़ है उसके लिए कोई काम सिरे से मुश्किल ही नहीं है। बल्कि अल्लाह की शान तो यह है कि जब किसी चीज़ को पैदा करना चाहता है तो वह कह देता है कि ''हो जा'' तो (फ़ौरन) हो जाती है। (77 से 82) 


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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