खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (028) अल क़सस
सूरह (028) अल क़सस
(i) मूसा अलैहिस्सलाम का वाक़िआ (तफ़सील से)
आयत 3 से 48 तक मुसलसल मूसा अलैहिस्सलाम का ज़िक्र है। बनी इस्राईल के लड़कों को फ़िरऔन चुन चुन कर क़त्ल करा दिया करता था, ऐसे हालात में मूसा का पैदा होना, मां के ज़रिए दरया में डाला जाना, फ़िरऔन के दरबारियों का ताबूत को निकालना, क़त्ल की कोशिश लेकिन फ़िरऔन की बीवी का बीच मे पड़ कर बचाना और उनकी परवरिश करना, मां का बेटे से मिलना और उजरत पर दूध पिलाना, बालिग़ होना, बनी इस्राईल के एक शख्स की मदद के चक्कर में अनजाने में एक क़िबती का हिलाक हो जाना, अल्लाह से माफ़ी तलब करना, क़त्ल का राज़ खुलने पर मिस्र से भागना, मदयन पहुंचना, वहां एक बुजुर्ग और नेक शख़्स शुऐब की पनाह में आना, वहां एक लड़की से शादी, दस साल शुऐब की ख़िदमत, बीवी के साथ घर वापसी, रास्ते में आग की तलाश में निकलना, और रसूल बनाया जाना, सिफ़ारिश पर बड़े भाई हारून का भी नबी बनाया जाना, मोअजिज़ा अता होना, फ़िरऔन के पास जाना, इस्लाम की दावत, जादूगरों से मुक़ाबला और उनका ईमान लाना, फ़िरऔन का घमंड और सरकशी और उसका दरिया में डुबोया जाना, बनी इस्राईल की ख़लासी वग़ैरह।
(ii) दोहरा सवाब
जो अल्लाह और उसकी किताब पर ईमान लाए, सब्र करे, बुराई के मुक़ाबले में भलाई करे, अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करे , फ़िज़ूल बातों से बचता रहे यह कहते हुए कि तुम्हारा अमल तुम्हारे साथ है और हमारा अमल हमारे साथ। (52 से 54)
(iii) क़ारून का वाक़िआ
क़ारून बनी इस्राईल का ही एक व्यक्ति था, जिसने बग़ावत की। उसे अल्लाह ने इतना ख़ज़ाना और दौलत दे रखा था कि ताक़तवर इंसानों का एक समूह मुश्किल से ही उठा सकता था। लेकिन वह अल्लाह का शुक्र अदा करने के बजाए घमंड में पड़ गया। मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे समझाने की पूरी कोशिश की और उसे नसीहत की أَحۡسِن كَمَآ أَحۡسَنَ ٱللَّهُ إِلَيۡكَ "लोगों के साथ भलाई करो जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ किया है" लेकिन उसने घमंड में मूसा अलैहिस्सलाम की बात न मानी जिसकी वजह से उसे दौलत समेत ज़मीन में धंसा दिया गया। (76 से 81, मुस्तदरक हाकिम 3536)
(iv) कुफ़्फ़ार के सवाल का जवाब
अगर अल्लाह हमेशा के लिए दिन बना देता तो लोग रात का सुकून कैसे हासिल करते और अगर हमेशा के लिए रात बना देता तो यह रोज़ी कैसे तलाश करते? (71, 72)
(v) हिदायत अल्लाह के हाथ में है
नबी का काम सिर्फ़ अल्लाह के दिए हुए पैग़ाम को उसके दूसरे बन्दों तक पहुंचाना है अब जिसकी मर्ज़ी हो ईमान लाए या न लाए, नबी का काम हिदायत देना नहीं है। दरअसल यह आयत अबु तालिब के सिलसिले में नाज़िल हुई जैसा कि सही मुस्लिम हदीस नंबर 132 किताबुल ईमान के तहत हदीस मज़कूर है कि
إِنَّكَ لَا تَهۡدِي مَنۡ أَحۡبَبۡتَ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهۡدِي مَن يَشَآءُۚ وَهُوَ أَعۡلَمُ بِٱلۡمُهۡتَدِينَ
"बेशक तुम जिसे चाहो हिदायत नहीं दे सकते बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और वह हिदायत पाने वालों के बारे में ख़ूब जानता है" (56)
(vi) क़ुरआन को अल्लाह के बंदों तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी
क़ुरआन को अल्लाह के बंदों तक पहुंचाने, उसकी की तालीम देने और उसकी हिदायत के मुताबिक़ दुनिया की इस्लाह (सुधार) करने की ज़िम्मेदारी नबी पर और अब उनके उम्मतियों पर डाली गई है यह क़ुरआन लोगों को आख़िरत के अंजाम से डराता है। (85)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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