खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (033) अल अहज़ाब
सूरह (033) अल अहज़ाब
(i) ज़माना जाहिलियत के तीन ग़लत ख़्यालात की तरदीद
● उनका ख़्याल था कि कुछ लोगों के पास दो दिल होते हैं। यहां बताया गया कि दिल तो बस एक ही होता है उसमें या तो ईमान होगा या कुफ़्र।
● "ज़िहार" के अल्फ़ाज़ जैसे أنتِ علي كظهر أمي، أو كبطن أختي، أو كفخذ بنتي ونحو ذلك.
(तू मुझपर मेरी माँ की पीठ की तरह हराम है। या मेरी बहन के पेट की तरह हराम है। या मेरी बेटी के रान की तरह हराम है) कहने से बीवी हराम नहीं हो जाती लेकिन उसका कफ़्फ़ारा देना पड़ेगा।
● जिसको चाहते थे मुंह बोला बेटा बना लेते थे फिर उसे हक़ीक़ी बेटे के सभी हुक़ूक़ दिए जाते थे यहां बताया गया कि मुंह बोला कभी हक़ीक़ी बेटे की तरह नहीं हो सकता। उसे विरासत में हिस्सा भी नहीं मिलेगा और उससे अपना नसब जोड़ना भी हराम है। (4, 5)
(ii) ग़ज़वा खंदक़ (गज़वा अहज़ाब) का ज़िक्र
ग़ज़वा खंदक़ के मौक़ा पर मुसलमान खंदक़ के अंदर थे और बाहर दुश्मनों ने हर तरफ़ से घेर रखा था। भूखे रहने की नौबत आ गयी। यहूदी क़बीले भी मुसलमानों के दुश्मन हो गए थे। वह मक्का के काफ़िरों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो रहे थे ऐसे हालात का नक़्शा खींचा गया है। "जब वह ऊपर से और नीचे से तुमपर चढ़ आए। जब डर के मारे आँखें पथरा गईं, कलेजे मुँह को आने लगे और तुम लोग अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे। उस वक़्त ईमान लाने वाले ख़ूब आज़माए गए और बुरी तरह हिला मारे गए। (10, 11)
(iii) मुनाफ़ेक़ीन की पहचान
◆ हर मौक़ा पर पीठ दिखाते हैं,
◆ जब मुसीबत और परेशानी का सामना या ख़ौफ़ का माहौल होता है उनपर मारे डर के मौत छाने लगती है। और जब शांतिपूर्ण माहौल हो जाता है तो उनकी ज़बानें कैंची से भी तेज़ चलने लगती हैं।
◆ ग़ज़वा खंदक़ में मुनाफ़ेक़ीन न केवल यह कि मैदान से भागना चाहते थे बल्कि लोगों को मशविरा भी देते फिर रहे थे। (12 से 20)
(iv) उम्महातुल मोमेनीन के लिए सात अहकाम
लेकिन इसके मुख़ातिब सभी औरतें है यह आम (general) हुक्म भी है।
● नज़ाकत (नरमी) के साथ बात न करें।
● बिना अति आवश्यक ज़रूरत के घर से बाहर न निकलें।
● ज़माना जाहिलियत की औरतों की तरह बनाव सिंगार और अपने सतर को ज़ाहिर करते हुए बाहर न निकलें।
● नमाज़ की पाबंदी करें
● ज़कात अदा करें
● अल्लाह और उसके रसुल की इताअत करें
● क़ुरआन की तिलावत किया करें। (34)
(v) जिस के अंदर यह दस सिफ़ात हों उसके लिए जन्नत की ख़ुशख़बरी
2, मोमिन होना
3, फ़रमाबरदारी
4, सच्चाई
5, अल्लाह का ख़ौफ़
6, सदक़ा करना
7, सत्यवादी (रास्तबाज़ी)
8, सब्र
9, शर्मगाह (secret parts) की हिफ़ाज़त
10, अल्लाह का ज़िक्र
(35)
(vi) नबी के फ़ैसले के बाद किसी को कोई इख़्तियार नहीं
किसी मोमिन मर्द या किसी मोमिन औरत के लिए जाएज़ हो नहीं है कि जब अल्लाह और उसके रसूल कोई फ़ैसला कर दें तो उनको अपने उस काम (के करने न करने) का इख़्तियार हो। और जिसने भी अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी की वह यक़ीनन खुली हुई गुमराही में जा पड़ा। (आयत 36)
(vii) ज़ैनब बिन्ते जहश का निकाह
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक जाहिली क़ौमी घमंड को उस वक्त तोड़ा था जब आपने अपनी फुफीज़ाद बहन ज़ैनब बिन्ते जहश का निकाह अपने आज़ाद किये हुए ग़ुलाम ज़ैद बिन हारिसा से करा दिया। लेकिन दोनों में निबाह न हो सका और उनके दरमियान जुदाई हो गई। अब जाहिली दस्तूर के मुताबिक़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से उनका निकाह नहीं हो सकता था क्योंकि वह मुंह बोले बेटे की बीवी बन चुकी थीं। चुनाँचे इस जाहिली तस्व्वुर को भी तोड़ा गया और अल्लाह ने आप को निकाह का हुक्म दिया और आप ने उनसे निकाह कर लिया। (37)
कशफुल महजूब (शैख़ अली हुजैरी) और क़ससुल अंबिया (ग़ुलाम नबी बिन इनायतुल्लाह) में लिखा हुआ है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार ज़ैनब को देख लिया और आप के मन में ख़्याल आया जब ज़ैद को यह पता चला तो उन्होंने ने ज़ैनब को तलाक़ दे दिया। और आपने शादी कर ली (نعوذباللہ من ذالك यह एक इल्ज़ाम है ऐसी बातों से हम अल्लाह की पनाह चाहते हैं) यह मालूम होना चाहिए कि ज़ैनब बिन्ते जहाश कोई और नहीं थीं बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फूफी उमैमा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु अन्हा की बेटी थीं, उनकी पूरी ज़िंदगी आप के सामने गुज़री थी। इसलिए देख कर आशिक़ होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
(viii) मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आख़िरी नबी हैं
مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٖ مِّن رِّجَالِكُمۡ وَلَٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّۧنَۗ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٗا
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम्हारे मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं बल्कि वह अल्लाह के रसूल और आख़िरी नबी हैं और अल्लाह को तमाम चीज़ों का इल्म है। (40) (अब जो भी अपने नबी होने का दावा करे वह झूठा होगा)
(ix) नबी की तारीफ़
● अल्लाह खुद नबी पर दरूद (रहमत) भेजता है
● फ़रिश्ते रहमत की दुआ करते हैं
● ईमान की रौशनी
● गवाह और ख़ुशख़बरी सुनाने वाला
● अल्लाह के अज़ाब से डराने वाला।
● दावत देने वाला और रौशन चिराग़ बनाकर भेजा है। (43 से 47)
(x) नबी पर दरूद व सलाम का हुक्म
إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं तो ऐ ईमान वालो तुम भी दुरूद व सलाम भेजते रहो। (आयत 56)
(xi) इंसान बड़ा ज़ालिम, जाहिल है
إِنَّا عَرَضْنَا الْأَمَانَةَ عَلَى السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَالْجِبَالِ فَأَبَيْنَ أَن يَحْمِلْنَهَا وَأَشْفَقْنَ مِنْهَا وَحَمَلَهَا الْإِنسَانُ ۖ إِنَّهُ كَانَ ظَلُومًا جَهُولًا
बेशक हमने (रोज़े अज़ल) अपनी अमानत को आसमान, ज़मीन और पहाड़ों के सामने पेश किया तो उन्होंने उसका बोझ उठाने से इंकार किया और डर गए और इंसान ने उसे उठा लिया बेशक इंसान (अपने हक़ में) बड़ा ज़ालिम और नादान है। (72)
(xii) कुछ अहम बातें
● ले पालक को अपना नसब देना हराम है। (4, 5)
● नबी मोमिनों पर उनकी जान से ज़्यादा अज़ीज़ हैं और उनकी बीवियां मोमिनों की माएं हैं। (6)
● अल्लाह के रसूल की ज़िंदगी ही लोगों के लिए उसवा ए हसना (role model) है। (21)
● हमबिस्तरी से पहले तलाक़ देने पर कोई इद्दत नहीं है। (49)
● चाचा की बेटी, फूफी की बेटी, मामू की बेटी और ख़ाला की बेटी से शादी कर सकते हैं। (50)
● पिता के घर, बेटों के घर, भाइयों के घर, भतीजों के घर, भांजों के घर और अपनी ससुराल में जाने की इजाज़त दी गई है। (55)
● जो अल्लाह और रसूल को तकलीफ़ या दुख पहुंचाए उनपर दुनिया और आख़िरत दोनों में अल्लाह की लानत और अपमान करने वाला अज़ाब है। (57,58)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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