Khulasa e Qur'an - surah 49 | surah al hujurat

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (049) अल हुजरात


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (049) अल हुजरात 


(i) अल्लाह और उसके रसूल का अदब 

अल्लाह और उसके रसूल (क़ुरआन व हदीस) से आगे न बढ़ें, न अपनी आवाज़ को उनकी आवाज़ से बुलंद की जाय, रसूलुल्लाह के पास अपनी आवाज़ को पस्त रखो (क़ुरआन व हदीस की कोई बात आए तो उस के भी सामने आवाज़ पस्त रखा जाय, सिर्फ़ उसी को तस्लीम किया जाय और उसके मुक़ाबले में हर बात को ठुकरा दिया जाय) (1, 2)


(ii) तहक़ीक़ ज़रूरी है

अगर कोई फ़ासिक़ ख़बर लाये तो कोई क़दम उठाने से पहले उसकी तहक़ीक़ ज़रूर की जाए वरना कहीं ऐसा नुक़सान हो सकता है कि शर्मिंदगी उठानी पड़े। (6)


(iii) सुलह कराना

जब मुसलमानों के दो गिरोह लड़ पड़ें तो उनके दरमियान सुलह की कोशिश की जाय लेकिन अगर बाग़ी गिरोह न माने तो उसके ख़िलाफ़ जंग की जाए यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ पलट आए, सुलह कराते समय अदल व इंसाफ़ का पूरा ख़्याल रहे। (9)


(iv) वह बुराइयां जो इंसान की निजी और इज्तेमाई (सामुहिक) ज़िंदगी में बिगाड़ को जन्म देती हैं

◆ एक दूसरे का मज़ाक़ उड़ाना, 

◆ किसी पर ऐब लगाना, 

◆ बुरे नामों से पुकारना, 

◆ किसी के बारे में बुरा गुमान, 

◆ किसी की जासूसी (टोह में लगना), ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई), ग़ीबत करना अपने मरे हुए भाई के मांस खाने के समान है। (11, 12)


(v) फ़ज़ीलत का मानक केवल तक़वा है 

अल्लाह ने इंसान की तख़लीक़ एक मर्द और एक औरत से की और फिर पहचान की ख़ातिर क़ौमें और बिरादरियां बना दीं वरना अल्लाह के नज़दीक सबसे बेहतर (श्रेष्ठतम) वह है जो सबसे ज़्यादा अल्लाह से मुहब्बत करने वाले हो। (13)


(vi) ईमान और इस्लाम मे फ़र्क़

अगरचे इस्लाम और ईमान एक दूसरे के पर्यायवाची हैं परंतु कहीं जब इस्लाम बोला जाता है तो उसका संबंध इंसान के ज़ाहिरी अमल से होता है, दुनिया में यही मानक बनता है जबकि ईमान का संबंध इंसान के बातिनी (अंतरात्मा) से होता है। आख़िरत में फ़ैसला ईमान की ही बुनियाद पर होगा। (14) 


(vii) ईमान लाना अल्लाह पर एहसान नहीं  

ईमान लाकर कोई अल्लाह पर एहसान नहीं करता बल्कि यह तो अल्लाह का एहसान है कि उसने हिदायत से नवाज़ा। (16, 17)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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