Qayamat ki nishaniyan (series-4): choti nishaniyan (2)

Qayamat ki nishaniyan (series-3): choti nishaniyan (2)


क़यामत की निशानियां सीरीज-4


Table of Contents
क़यामत की छोटी निशानियां (पार्ट 02)


क़यामत की छोटी निशानियां (पार्ट 02)

3. हर घर में इस्लाम दाखिल होगा:

हदीस 01:

 हजरत मिक़दाद बिन अस्वद रज़ि अन्हु से मरवी है कि,

 मैंने नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को यह इरशाद फरमाते हुए सुना: "जमीन पर कोई भी घर या खेमा ऐसा नहीं रहेगा जिसमें अल्लाह दीन इस्लाम दाखिल ना फरमायेगा।" 

इज्जत वाले (के घर) की इज्जत के साथ या जिल्लत वाले के यहां जिल्लत के साथ (यानी ) या तो अल्लाह तआला उन लोगों को इस तरह इज्जत देगा के इन्हें पहले इस्लाम में से कर देगा या उन्हें ज़लील कर देगा और उस (दीन ) के लिए ज़मीं और महकूम बन जायेंगे

[सुनन कुबरा बहिएक़ी 09/181]


हदीस 02:

 हजरत तमीम दारी रज़ि अन्हु फरमाते हैं,

 मैंने अल्लाह के रसूल से सुना: "यह दीन हर उस जगह तक पहुंचेगा जहाँ तक के लेल व नहार की गर्दिश मौजूद है अल्लाह तआला हर (खेमे ) इज्जत वाले (के घर ) की इज्जत के साथ या जिल्लत वाले के यहां जिल्लत के साथ दाखिल फरमा देगा इज़्ज़त पाने वाले मुसलमान बन जाएंगे जबकि जिल्लत पाने वाले काफिर ही रहेंगे।" 

[सुनन कुबरा बहिएक़ी 09/181]


फायदा:

(01) सारी जमीन पर इस्लाम ग़ालिब होना कयामत की एक निशानी है जिसका कायम होना ला माहला ज़रूरी है इसलिए अल्लाह तआला का अपने बंदों से वादा है। 

अल्लाह तआला फरमाता है:

अल्लाह ने वादा किया है तुममें से उन लोगों के साथ जो ईमान लाएँ और अच्छे काम करें कि वो उनको उसी तरह ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाएगा जिस तरह उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों को बना चुका है। उनके लिये उनके उस दीन को मज़बूत बुनियादों पर क़ायम कर देगा जिसे अल्लाह ने उनके लिये पसन्द किया है, और उनकी (मौजूदा) डर की हालत को अमन से बदल देगा। बस वो मेरी बन्दगी करें और मेरे साथ किसी को शरीक न करें। और जो उसके बाद कुफ़्र करे तो ऐसे ही लोग नाफ़रमान हैं।

[सूरह नूर 55]

(02) क़यामत की बताई गई निशानी और वादा ए खुदावंदी की एक क़िस्त दौर ए सहाबा और अहद खेरुल क़ुरून (तीन बेहतरीन ज़माने) मैं गुजर चुकी है। अल्लाह तआला ने मुसलमानों को ज़मीन पर ग़लबा अता फरमाया, दीन इस्लाम को उरूज बख्शना, मिश्र व शाम, रोम और ईरान, अफ्रीका और यूरोप में दूर-दराज तक ममालिक फतह हुए और इस्लामी तर्ज़ ए फ़िक्र और तहज़ीब का नारा आम लहरा। 

(03) खिलाफत ए अर्ज़ी का वादा ईमान व अमल सालेह के साथ मशरूत था जैसे जैसे मुसलमानों की तरफ से ईमान अमल सालेह की शर्त हट गई वैसे-वैसे मशरूत (वादा खिलाफत) भी मिटता चला गया। 

(04) इस्लाम पर अमल पैरा होने में ही दुनिया और आखिरत की इज्जत है। 


4. हर तरफ अमन व अमान होगा:

हदीस 01:

मैं नबी करीम (सल्ल०) की ख़िदमत में हाज़िर था कि एक साहिब आए और आप (सल्ल०) से ग़रीबी और फ़ाक़ा की शिकायत की फिर दूसरे साहिब आए और रास्तों की बद-अमनी की शिकायत की। इस पर नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया : अदी! तुमने मक़ाम हैरा देखा है? (जो कूफ़ा के पास एक बस्ती है) मैंने कहा कि मैंने देखा तो नहीं अलबत्ता उसका नाम मैंने सुना है। आप (सल्ल०) ने फ़रमाया : अगर तुम्हारी ज़िन्दगी कुछ और लम्बी हुई तो तुम देखोगे कि होदज मैं एक औरत अकेली हैरा से सफ़र करेगी और (मक्का पहुँच कर) काबा का तवाफ़ करेगी और अल्लाह के सिवा उसे किसी का भी ख़ौफ़ न होगा। मैंने (ताज्जुब से) अपने दिल में कहा फिर क़बीला तय के उन डाकुओं का क्या होगा जिन्होंने शहरों को तबाह कर दिया है और फ़साद की आग सुलगा रखी है। नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया : अगर तुम कुछ और दिनों तक ज़िन्दा रहे तो किसरा के ख़ज़ाने (तुम पर) खोले जाएँगे। मैं (ताज्जुब में) बोल पड़ा किसरा-बिन-हुर्मुज़ (ईरान का बादशाह) किसरा? आप (सल्ल०) ने फ़रमाया : हाँ किसरा-बिन-हुर्मुज़! और अगर तुम कुछ दिनों तक और ज़िन्दा रहे तो ये भी देखोगे कि एक शख़्स अपने हाथ में सोना चाँदी भर कर निकलेगा उसे किसी ऐसे आदमी की तलाश होगी (जो उसकी ज़कात) क़बूल कर ले लेकिन उसे कोई ऐसा आदमी नहीं मिलेगा जो उसे क़बूल कर ले। अल्लाह तआला से मुलाक़ात का जो दिन मुक़र्रर है उस वक़्त तुममें से हर कोई अल्लाह से इस हाल में मुलाक़ात करेगा कि बीच में कोई तर्जमान न होगा (बल्कि परवरदिगार उस से सीधे तौर पर बातें करेगा) अल्लाह तआला उस से दरयाफ़्त करेगा। क्या मैंने तुम्हारे पास रसूल नहीं भेजे थे जिन्होंने तुम तक मेरा पैग़ाम पहुँचा दिया हो? वो कहा करेगा बेशक तूने भेजा था। अल्लाह तआला दरयाफ़्त फ़रमाएगा क्या मैंने माल और औलाद तुम्हें नहीं दी थी? क्या मैंने उनके ज़रिए तुम्हें फ़ज़ीलत नहीं दी थी? वो जवाब देगा बेशक तूने दिया था। फिर वो अपनी दाहिनी तरफ़ देखेगा तो सिवा जहन्नम के उसे और कुछ नज़र न आएगा फिर वो बाएँ तरफ़ देखेगा तो इधर भी जहन्नम के सिवा और कुछ नज़र नहीं आएगा। अदी (रज़ि०) ने बयान किया कि मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना आप फ़रमा रहे थे कि जहन्नम से डरो भले ही खजूर के एक टुकड़े के ज़रिए हो। अगर किसी को खजूर का एक टुकड़ा भी मुयस्सर न आ सके तो (किसी से) एक अच्छा कलिमा ही कह दे। अदी (रज़ि०) ने बयान किया कि मैंने होदज मैं बैठी हुई एक अकेली औरत को तो ख़ुद देख लिया कि हैरा से सफ़र के लिये निकली और (मक्का पहुँच कर) उसने काबा का तवाफ़ किया और उसे अल्लाह के सिवा और किसी से (डाकू वग़ैरा) का (रास्ते में) ख़ौफ़ नहीं था और मुजाहिदीन की इस जमाअत मैं तो मैं ख़ुद शरीक था जिसने किसरा-बिन-हुर्मुज़ के ख़ज़ाने फ़तह किये। और अगर तुम लोग कुछ दिनों और ज़िन्दा रहे तो वो भी देख लोगे जो नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया कि एक शख़्स अपने हाथ में (ज़कात का सोना चाँदी) भर कर निकलेगा (लेकिन उसे लेने वाला कोई नहीं मिलेगा) मुझसे अब्दुल्लाह -बिन- मुहम्मद ने बयान किया। कहा हम से अबू-आसिम ने बयान किया कहा हमको सअदान-बिन-बिश्र ने ख़बर दी उन से अबू-मुजाहिद ने बयान किया उन से मुहिल्ल-बिन-ख़लीफ़ा ने बयान किया और उन्होंने अदी (रज़ि०) से सुना कि मैं नबी करीम (सल्ल०) की ख़िदमत में हाज़िर था फिर यही हदीस नक़ल की जो ऊपर ज़िक्र हुई।

[बुखारी 3595]


हदीस 02:

हमने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से शिकायत की। आप उस वक़्त अपनी एक चादर पर टेक दिये काबा के साये में बैठे हुए थे। हमने आप (सल्ल०) की ख़िदमत में कहा कि आप हमारे लिये मदद क्यों नहीं तलब फ़रमाते? हमारे लिये अल्लाह से दुआ क्यों नहीं माँगते (हम काफ़िरों की तकलीफ़-देही से तंग आ चुके हैं)? 

आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, ''(ईमान लाने की सज़ा में) तुमसे पहली उम्मतों के लोगों के लिये गढ़ा खोदा जाता और उन्हें उसमें डाल दिया जाता। फिर उनके सिर पर आरा रखकर उनके दो टुकड़े कर दिये जाते फिर भी वो अपने दीन से न फिरते। लोहे के कंघे उनके गोश्त में धँसाकर उनकी हड्डियों और पुट्ठों पर फेरे जाते फिर भी वो अपना ईमान न छोड़ते। अल्लाह की क़सम! ये मामला (इस्लाम) भी कमाल को पहुँचेगा और एक ज़माना आएगा कि एक सवार मक़ामे-सनआ से हज़रे-मौत तक सफ़र करेगा (लेकिन रास्तों के पुर-अम्न होने की वजह से) उसे अल्लाह के सिवा और किसी का डर नहीं होगा। या सिर्फ़ भेड़िये का ख़ौफ़ होगा कि कहीं उसकी बकरियों को न खा जाए लेकिन तुम लोग जल्दी करते हो।"

[सहीह बुखारी 3612]


फायदा:

(01) क़यामत की यें निशानी रावी के ऐतिबार से सहाबा के दौर में हो चुकी है। 

(02) क़यामत की यें निशानी, हर तरफ अमन होगा। 

 

 जुड़े रहे इंशाल्लाह आगे और वजाहत होगी। 


आपका दीनी भाई
मुहम्मद रज़ा

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