आख़िरत के बारे में इनकार करने वालों के नजरिए और उनका रद्द
आख़िरत का इनकार करने वालों का पहला और असल ताज्जुब मौत के बाद की ज़िन्दगी पर नहीं होता है, बल्कि इस पर होता है कि उन्ही की जिंस और क़ौम के एक इंसान ने उठ कर दावा किया था कि मैं ख़ुदा की तरफ़ से तुम्हें ख़बरदार करने के लिये आया हूँ। इस के बाद और ज़्यादा ताज्जुब उन्हें इस पर हुआ कि वो शख़्स उन्हें जिस चीज़ से ख़बरदार कर रहा था, वो ये थी कि तमाम इंसान मरने के बाद नए सिरे से ज़िंदा किये जाएँगे, और उन सब को इकट्ठा करके अल्लाह की अदालत में पेश किया जाएगा, और वहाँ उनके आमाल का हिसाब करने के बाद जज़ा और सज़ा दी जाएगी।
अल्लाह कुरआन में कहता है कि:
"बल्कि इन लोगों को ताज्जुब इस बात पर हुआ कि एक ख़बरदार करनेवाला ख़ुद इन्हीं में से इनके पास आ गया, फिर मुनकिर कहने लगे "ये तो अजीब बात है।"
[कुरआन 50:2]
"क्या जब हम मर जाएँगे और ख़ाक हो जाएँगे (तो दोबारा उठाए जाएँगे)? ये वापसी तो अक़ल में नहीं आती।"
[कुरआन 50: 3]
(हालाँकि) "ज़मीन इनके जिस्म में से जो कुछ खाती है वो सब हमारे इल्म में है और हमारे पास एक किताब है जिसमें सब कुछ महफ़ूज़ है।"
[कुरआन 50:4]
अगर मौत के बाद की जिंदगी इनकार करने वालों की अक़्ल में नहीं समाती तो ये इन की अपनी ही अक़्ल की तंगी है। इस से ये तो लाज़िम नहीं आता कि अल्लाह का इल्म और उसकी क़ुदरत भी तंग हो जाए। ये समझते हैं कि दुनिया की शुरुआत से क़ियामत तक मरने वाले अनगिनत इंसानो के जिस्म के हिस्से, जो ज़मीन में बिखर चुके हैं और आइंदा बिखरते चले जाएँगे, उनको जमा करना किसी तरह मुमकिन नहीं है। लेकिन वाक़िआ ये है के उनमें से हर हर हिस्सा जिस शकल में जहाँ भी है, अल्लाह तआला बराहे-रास्त उसको जानता है, और उससे भी ज़्यादा ये कि उसका पूरा रिकॉर्ड अल्लाह के दफ़्तर में महफ़ूज़ किया जा रहा है, जिससे कोई ज़र्रा भी छूटा हुआ नहीं है। जिस वक़्त अल्लाह का हुक्म होगा उसी वक़्त आनन-फ़ानन उसके फ़रिश्ते इस रिकॉर्ड की तरफ़ रुजू करके एक-एक ज़र्रे को निकाल लाएँगे और तमाम इंसानों के वही जिस्म फिर बना देंगे जिन में रह कर उन्होंने दुनिया की ज़िंदगी में काम किया था।
कहते थे "क्या जब हम मरकर ख़ाक हो जाएँगे और हड्डियों का पंजर रह जाएँगे तो फिर उठाकर खड़े किये जाएँगे? और क्या हमारे वो बाप दादा भी उठाए जाएँगे जो पहले गुज़र चुके हैं?" ऐ नबी (सल्ल०), इन लोगों से कहो, यक़ीनन अगले और पिछले सब, एक दिन ज़रूर जमा किये जानेवाले हैं जिसका वक़्त मुक़र्रर किया जा चुका है।"
[कुरआन 56:48-50]
"जब ज़मीन फटेगी और लोग उसके अन्दर से निकलकर तेज़-तेज़ भागे जा रहे होंगे। ये हश्र हमारे लिये बहुत आसान है।"
[कुरआन 50:44]
यहां अल्लाह ने कुफ़्फ़ार की उस बात का जवाब दिया है जो वो कहते थे के भला ये कैसे हो सकता है के जब हम मर कर ख़ाक हो चुके हों उस वक़्त हमें फिर से ज़िंदा करके उठा खड़ा किया जाए, ये वापसी तो अक़्ल व इमकान से परे है। उनकी इसी बात के जवाब में फ़रमाया गया है के ये हश्र, यानी सब अगले पिछले इंसानों को एक ही वक़्त में ज़िंदा करके जमा कर लेना हमारे लिए बिलकुल आसान है। हमारे लिए ये मालूम करना कुछ मुश्किल नहीं है के किस शख़्स की ख़ाक कहाँ पड़ी है। हमें ये जानने में भी कोई दिक़्क़त नहीं पेश आएगी कि इन बिखरे हुए ज़र्रात में से ज़ैद के ज़र्रात कोन से हैं और बक्र के ज़र्रात कौन-से। इन सबको अलग अलग समेट कर एक एक आदमी का जिस्म फिर से बना देना, और उस जिस्म में उसी शख़्सियत को नए सिरे से पैदा कर देना जो पहले उसमें रह चुकी थीं, हमारे लिए कोई बड़ी मेहनत का काम नहीं है, बल्कि हमारे एक इशारे से ये सब कुछ आनन फ़ानन हो सकता है। वो तमाम इन्सान जो आदम के वक़्त से क़ियामत तक दुनिया में पैदा हुए हैं, हमारे एक हुक्म पर बड़ी आसानी से जमा हो सकते हैं। तुम्हारा छोटा सा दिमाग़ उसे अक़्ल से परे समझता हो तो समझा करे। क़ायनात के पैदा करनेवाले की क़ुदरत से ये कुछ भी दूर नहीं है।
आख़िरत का इनकार करने वालों की एक दलील
“हमारी पहली मौत के सिवा और कुछ नहीं, उसके बाद हम दोबारा उठाए जानेवाले नहीं हैं। अगर तुम सच्चे हो तो उठा लाओ हमारे बाप-दादा को।"
[कुरआन 44:35-36]
दलील का जवाब:-
उनकी दलील ये थी कि हमने कभी मरने के बाद किसी को दोबारा जी उठते नहीं देखा है, इसलिये हम यक़ीन रखते हैं कि मरने के बाद कोई दूसरी ज़िन्दगी नहीं होगी। तुम लोग अगर दावा करते हो कि दूसरी ज़िन्दगी होगी तो हमारे बाप-दादा को क़ब्रों से उठा लाओ, ताकि हमें मरने के बाद की ज़िन्दगी का यक़ीन आ जाए। ये काम तुमने न किया तो हम समझेंगे कि तुम्हारा दावा बेबुनियाद है। ये मानो उनके नज़दीक मौत के बाद की ज़िन्दगी को रद्द करने के लिये बड़ी पक्की दलील थी। हालाँकि सरासर बेमानी थी। आख़िर उनसे ये कहा किसने था कि मरनेवाले दोबारा ज़िंदा होकर इसी दुनिया में वापस आएँगे? और नबी (सल्ल०) या किसी मुसलमान ने ये दावा कब किया था कि हम मुर्दों को ज़िंदा करनेवाले हैं?
जब इनकार करने वालों को कुरआन को साफ साफ आयतें सुनाई जाती हैं जिनमें आख़िरत के इमकान पर मज़बूत अक़ली दलीलें दी गई हैं और जिनमें ये बताया गया है कि उसका होना ठीक हिकमत और इन्साफ़ का तक़ाज़ा है और उसके न होने से दुनिया का ये सारा निज़ाम बे-मतलब हो जाता है। तो इनकर करने वालों के पास कोई दलील इसके सिवा नहीं होती कि उठा लाओ हमारे बाप-दादा को अगर तुम सच्चे हो। इसी बात को कुरआन में अल्लाह ने कहा है:
"और जब हमारी साफ़-साफ़ आयतें इन्हें सुनाई जाती हैं तो इनके पास कोई दलील इसके सिवा नहीं होती कि उठा लाओ हमारे बाप-दादा को अगर तुम सच्चे हो।"
[कुरआन 45:25]
दूसरे अलफ़ाज़ में उनकी इस दलील का मतलब ये था कि जब कोई उनसे ये कहे कि मौत के बाद दूसरी ज़िन्दगी होगी तो उसे ज़रूर क़ब्र से एक मुर्दा उठाकर उनके सामने ले आना चाहिये और अगर ऐसा नहीं किया जाता तो वे ये नहीं मान सकते हैं कि मरे हुए इन्सान किसी वक़्त नए सिरे से ज़िन्दा करके उठाए जानेवाले हैं। हालाँकि ये बात सिरे से किसी ने भी उनसे नहीं कही थी कि इस दुनिया में अलग-अलग तौर पर वक़्त-वक़्त पर मुर्दों को ज़िंदा किया जाता रहेगा, बल्कि जो कुछ भी कहा गया था वो ये था कि क़ियामत के बाद अल्लाह एक साथ तमाम इन्सानों को नए सिरे ज़िन्दा करेगा और उन सबके आमाल का हिसाब लेकर इनाम और सज़ा का फ़ैसला करेगा।
अल्लाह ने आखिरत का इनकार करने वालों की इस माँग का जवाब है कि उठा लाओ हमारे बाप-दादा को अगर तुम सच्चे हो। कुछ इस तरह दिया है कि:
"इन सबके उठाए जाने के लिये तय हो चुका फ़ैसले का दिन है।"
[कुरआन 44:40]
मतलब ये है कि मरने के बाद की ज़िन्दगी कोई तमाशा तो नहीं है कि जहाँ कोई इससे इनकार करे, फ़ौरन एक मुर्दा क़ब्रिस्तान से उठाकर उसके सामने ला खड़ा किया जाए। इसके लिये तो सारे जहानों के रब ने एक वक़्त तय कर दिया है जब तमाम अगलों-पिछलों को वो दोबारा ज़िंदा करके अपनी अदालत में इकट्ठा करेगा और उनके मुक़द्दमों का फ़ैसला करेगा। तुम मानो, चाहे न मानो, ये काम बहरहाल अपने मुक़र्रर वक़्त पर ही होगा। तुम मानोगे तो अपना ही भला करोगे, क्योंकि इस तरह वक़्त से पहले ख़बरदार होकर उस अदालत से कामयाब निकलने की तैयारी कर सकोगे। न मानोगे तो अपना ही नुक़सान करोगे, क्योंकि अपनी सारी उम्र इस ग़लतफ़हमी में खपा दोगे कि बुराई और अच्छाई जो कुछ भी है, बस इसी दुनिया की ज़िन्दगी तक है, मरने के बाद फिर कोई अदालत नहीं होनी है जिसमें हमारे अच्छे या बुरे आमाल का कोई मुस्तक़िल नतीजा निकलना हो।
आख़िरत को कहानी बताने की गलतफहमी
और जिस शख़्स ने अपने माँ-बाप से कहा, “उफ़! तंग कर दिया तुमने, क्या तुम मुझे इससे डराते हो कि मैं मरने के बाद फिर क़ब्र से निकाला जाऊँगा, हालाँकि मुझसे पहले बहुत-सी नस्लें गुज़र चुकी हैं (उनमें से तो कोई उठकर न आया)।” माँ और बाप अल्लाह की दुहाई देकर कहते हैं, “अरे बदनसीब! मान जा, अल्लाह का वादा सच्चा है।” मगर वो कहता है, “ये सब अगले वक़्तों की घिसी-पिटी कहानियाँ हैं।”
[कुरआन 46:17]
"इनकार करनेवाले कहते हैं, क्या बात है कि क़ियामत हमपर नहीं आ रही है! कहो, क़सम है मेरे ग़ैब (छिपी हक़ीक़तों) का इल्म रखनेवाले परवरदिगार की, वो तुमपर आकर रहेगी। उससे ज़र्रा भर भी कोई चीज़ न आसमानों में छिपी है, न ज़मीन में; न ज़र्रे से बड़ी और न उससे छोटी। सब कुछ एक नुमायाँ दफ़्तर में लिखी है।"
[कुरआन 34:3]
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