Maut ke baad zindagi: ek dawa ya yaqeen?

Maut ke baad zindagi: ek dawa ya yaqeen?


मौत के बाद जिंदगी: एक दावा या यकीन?

हर ज़माने में हक़ (सत्य) का इनकार करने वाले लोग दूसरी जिन बुनियादी गुमराही में मुब्तला रहे हैं, और जो आख़िरकार उनकी तबाही का सबब हुई, वह मौत के बाद की ज़िंदगी का इनकार ही थी। अगरचे आख़िरत (मौत के बाद की ज़िंदगी) के किसी इनकार करने वाले के पास ना पहले यह जानने का ज़रिआ था, न आज है, न कभी हो सकता है कि मरने के बाद कोई दूसरी ज़िन्दगी नहीं है। लेकिन हक़ का इनकार करने वाले नादानों ने हमेशा बड़े ज़ोर-शोर के साथ यही दावा किया है कि मरने के बाद कोई जिंदगी नहीं है, हालाँकि पूरी तरह आख़िरत का इनकार कर देने के लिए न कोई अक़ली बुनियाद मौजूद है न इल्मी बुनियाद। हक का इनकार करने वालों के इसी दावे को अल्लाह ने कुरआन में जिक्र किया है कि:


زَعَمَ الَّذِیۡنَ کَفَرُوۡۤا اَنۡ لَّنۡ یُّبۡعَثُوۡا ؕ قُلۡ بَلٰی وَ رَبِّیۡ لَتُبۡعَثُنَّ ثُمَّ لَتُنَبَّؤُنَّ بِمَا عَمِلۡتُمۡ ؕ وَ ذٰلِکَ عَلَی اللّٰہِ یَسِیۡرٌ
इनकार करनेवालों ने बड़े दावे से कहा है कि वो मरने के बाद हरगिज़ दोबारा न उठाए जाएँगे। इनसे कहो "नहीं, मेरे रब की क़सम तुम ज़रूर उठाए जाओगे, फिर ज़रूर तुम्हें बताया जाएगा कि तुमने दुनिया में क्या कुछ किया है, और ऐसा करना अल्लाह के लिये बहुत आसान है।"
[कुरआन 64:7]


यहां अल्लाह ताला ने अपने नबी (सल्ल०) से फ़रमाया है कि अपने रब की क़सम खाकर लोगों से कहो कि ज़रूर ऐसा होकर रहेगा। पहले सुरा-10 यूनुस, आयत-53 में फ़रमाया, वे पूछते हैं क्या सचमुच ये हक़ है? कहो : मेरे रब की क़सम! ये यक़ीनन हक़ है और तुम इतना बल-बूता नहीं रखते कि उसे ज़ाहिर होने से रोक दो। फिर सूरा-34 सबा, आयत-3 में फ़रमाया, इनकार करने वाले कहते हैं : क्या बात है कि क़ियामत हम पर नहीं आ रही है! कहो क़सम है मेरे रब की! वो तुम पर आकर रहेगी।

यहाँ ये सवाल पैदा होता है कि आख़िरत के एक इनकारी के लिये आख़िर इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है आप उसे आख़िरत के आने की ख़बर क़सम खा कर दें या क़सम खाए बिना दें? 

वो जब इस चीज़ को नहीं मानता तो सिर्फ़ इस बुनियाद पर कैसे मान लेगा कि आप क़सम खा कर उससे ये बात कह रहे हैं? 

इसका जवाब ये है कि एक तो अल्लाह के रसूल (सल्ल०) की बात सुनने वाले वो लोग थे जो अपनी निजी जानकारी और तजुर्बे की बुनियाद पर ये बात ख़ूब जानते थे की इस शख़्स ने कभी उम्र भर झूठ नहीं बोला है, इसलिये चाहे ज़बान से नबी (सल्ल०) के ख़िलाफ़ कैसे ही बुहतान गढ़ते रहे हों, अपने दिलों में वो ये सोच तक न सकते थे कि ऐसा सच्चा इनसान कभी ख़ुदा की क़सम खाकर वो बात कह सकता है जिसके सच होने का उसे पूरा यक़ीन न हो। 

दूसरे ये कि आप (सल्ल०) सिर्फ़ आख़िरत का अक़ीदा ही बयान नहीं करते थे, बल्कि उसके लिये बहुत ही मुनासिब दलीलें भी पेश करते थे। मगर जो चीज़ किसी शख़्स के नबी होने और नबी न होने के दरमियान फ़र्क़ करती है, वो ये है की एक ऐसा आदमी जो नबी न हो वो आख़िरत के हक़ में जो मज़बूत-से-मज़बूत दलीलें दे सकता है उनका ज़्यादा-से-ज़्यादा फ़ायदा बस यही हो सकता है कि आख़िरत के न होने के मुक़ाबले में उसका होना ज़्यादा अक़्ल के मुताबिक़ और ज़्यादा मुमकिन मान लिया जाए। 

इसके बर-ख़िलाफ़ नबी का मक़ाम एक फ़ल्सफ़ी (दार्शनिक) के मक़ाम से बढ़कर है। उसकी अस्ल हैसियत ये नहीं है कि अक़्ली दलीलों से वो इस नतीजे पर पहुंचा हो कि आख़िरत होनी चाहिए। बल्कि उसकी अस्ल हैसियत ये है कि वो इस बात का इल्म रखता है कि आख़िरत होगी और यक़ीन के साथ कहता है कि वो ज़रूर होकर रहेगी। इसलिये एक नबी ही क़सम खाकर ये कह सकता है, एक फ़ल्सफ़ी इसपर क़सम नहीं खा सकता। और आख़िरत पर ईमान एक नबी के बयान ही से पैदा हो सकता है, फ़ल्सफ़ी की दलील अपने अन्दर ये क़ुव्वत नहीं रखती कि दूसरा शख़्स तो दूर, फ़ल्सफ़ी ख़ुद भी अपनी दलील की बुनियाद पर इसे अपना ईमानी अक़ीदा बना सके। फ़ल्सफ़ी अगर सचमुच सही सोच रखता हो तो वो होना चाहिए से आगे नहीं बढ़ सकता। है और यक़ीनन है कहना सिर्फ़ एक नबी का काम है।

कसम खाने के बाद आयत में आगे कहा गया है कि:

"फिर ज़रूर तुम्हें बताया जाएगा कि तुमने दुनिया में क्या कुछ किया है" यही वो मक़सद है जिसके लिये इनसान को मरने के बाद दोबारा उठाया जाएगा, और इसी में इस सवाल का जवाब भी है कि ऐसा करने की आख़िर ज़रूरत क्या है।

इस बरहक़ कायनात में जिस किसी को कुफ़्र और ईमान में से किसी एक राह के अपनाने की आज़ादी दी गई हो, और जिसे इस कायनात में बहुत सी चीज़ों के इस्तेमाल करने का इख़्तियार और क़ुव्वत भी दे दी गई हो, और जिसने कुफ़्र या ईमान की राह अपनाकर उम्र भर अपने इख्त़ियार को सही या ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल करके बहुत-सी भलाइयाँ या बहुत-सी बुराइयाँ खुद अपनी ज़िम्मेदारी पर की हों, उसके बारे में ये सोचना बिलकुल बेअक़्ली की बात है कि ये सब कुछ जब वो कर चुके तो आख़िरकार भले की भलाई और बुरे की बुराई, दोनों बे-नतीजा रहें और सिरे से कोई वक़्त ऐसा आए ही नहीं जब इस जानदार के आमाल की जाँच पड़ताल हो। 

जो शख़्स ऐसी बेअक़्ली की बात कहता है वो ज़रूर ही दो बेवक़ूफ़ियों में से एक बेवक़ूफ़ी करता है। या तो वो ये समझता है कि ये कायनात है तो हिकमत के मुताबिक़ बनी हुई, मगर यहाँ इनसान जैसे इख़्तियार रखने वाले शख़्स को ग़ैर-ज़िम्मेदार बना कर छोड़ दिया गया है। या फिर वो ये समझता है कि ये एक अलल-टप बनी हुई कायनात है जिसे बनाने में सिरे से किसी हिकमत वाले की हिकमत काम नहीं कर रही है। पहली सूरत में वो एक दो रुख़ी बात कहता है, क्योंकि कायनात में जिसकी बुनियाद हिकमत पर हो एक इख़्तियार रखने वाली मख़लूक़ (जानदार) का ग़ैर-ज़िम्मेदार होना साफ़-साफ़ इनसाफ़ और हिकमत के ख़िलाफ़ है। 

और दूसरी सूरत में वो इस बात की कोई मुनासिब वजह बयान नहीं कर सकता कि एक अलल-टप बनी हुई बे-हिकमत कायनात में इनसान जैसे अक़्ल रखने वाले जानदार का वुजूद में आना आख़िर कैसे मुमकिन हुआ और उसके ज़ेहन में अदल और इनसाफ़ का तसव्वुर कहां से आ गया? बेअक़्ली से अक़्ल की पैदाइश और बे इनसाफ़ी से इनसाफ़ का तसव्वुर निकल आना एक ऐसी बात है जिसका मानने वाला या तो एक हठधर्म आदमी हो सकता है, या फिर वो जो बहुत ज़्यादा फ़ल्सफ़ा बघारते-बघारते दिमाग़ी मरीज़ बन चुका हो।

और मौत के बाद फिर से जिंदगी देना अल्लाह के लिए बहुत आसान है। ये मौत के बाद की ज़िंदगी पर दूसरी दलील है, पहली दलील आख़िरत के ज़रूरी होने की थी, और ये दलील उसके मुमकिन होने की है। ज़ाहिर है कि जिस ख़ुदा के लिये कायनात का इतना बड़ा निज़ाम बना देना मुश्किल न था और जिसके लिये इस दुनिया में इनसानों को पैदा करना मुश्किल नहीं है, उसके लिये ये बात आख़िर क्यों मुश्किल होगी कि इनसानों को दोबारा पैदा करके अपने सामने हाज़िर करे और उनका हिसाब ले।

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