Eid ul Azha (Eid ul adha) part-4b

Eid ul Azha (Eid ul adha) part-4b


ईदुल अज़हा (किस्त 04 b)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल


ज़िल हिज्जा का पहले अशरे की फ़ज़ीलत:

चाँद नज़र आने के बाद बाल और नाख़ून न तराशा जाय: 

जो व्यक्ति क़ुर्बानी करने का इरादा रखता है उसे चाहिए कि ज़िलहिज्जा का चाँद नज़र आने के बाद अपने बाल और नाख़ून न काटे जबतक कि अपनी क़ुर्बानी न कर ले। और जिस व्यक्ति को क़ुर्बानी करने की सकत न हो, उसके लिए भी बाल और नाख़ून न काटने पर क़ुर्बानी का सवाब है।


عَنْ عُمَرَ بْنِ مُسْلِمِ بْنِ عَمَّارِ بْنِ أُكَيْمَةَ اللَّيْثِيِّ قَالَ سَمِعْتُ سَعِيدَ بْنَ الْمُسَيَّبِ يَقُولُ سَمِعْتُ أُمَّ سَلَمَةَ زَوْجَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ تَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَنْ كَانَ لَهُ ذِبْحٌ يَذْبَحُهُ فَإِذَا أُهِلَّ هِلَالُ ذِي الْحِجَّةِ فَلَا يَأْخُذَنَّ مِنْ شَعْرِهِ وَلَا مِنْ أَظْفَارِهِ شَيْئًا حَتَّى يُضَحِّيَ

उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "जिस के पास ज़बह करने के लिए कोई जानवर हो, और ज़िलहिज्जा का चाँद नज़र आ जाये तो वह क़ुर्बानी से पहले अपने बाल और नाख़ूनों को बिल्कुल न काटे।"

[सही मुस्लिम हदीस नंबर 5121/ किताबुल उज़हिया: जब ज़िलहिज्जा का चाँद नज़र आ जाये]

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 عَنْ عَمْرِو بْنِ مُسْلِمٍ الْجُنْدُعِيِّ أَنَّهُ قَالَ أَخْبَرَنِي ابْنُ الْمُسَيَّبِ أَنَّ أُمَّ سَلَمَةَ زَوْجَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخْبَرَتْهُ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ و قَالَ مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرٍو يَعْنِي ابْنَ عَلْقَمَةَ عَنْ عَمْرِو بْنِ مُسْلِمِ بْنِ عُمَارَةَ بْنِ أُكَيْمَةَ أَنَّهُ قَالَ إِنْ كَانَ قَالَهُ كَذَا قَالَ أَبِي فِي الْحَدِيثِ مَنْ أَرَادَ أَنْ يُضَحِّيَ فَلَا يُقَلِّمْ أَظْفَارًا وَلَا يَحْلِقْ شَيْئًا مِنْ شَعْرِهِ فِي الْعَشْرِ الْأُوَلِ مِنْ ذِي الْحِجَّةِ

(مسند احمد، باقي مسند الأنصار » حديث أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم)

 उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "जब तुम ज़िल हिज्जा चाँद देख लो और तुम में से कोई क़ुर्बानी का इरादा रखता हो तो वह ज़िल हिज्जा के पहले अशरे में अपना नाख़ून और और जिस्म का कोई भी बाल न काटे।"

[मुसनद अहमद; 4663/बाकी मुसनदूल अंसार, हदीस उम्म सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा]

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लेकिन जिन के नाम से क़ुर्बानी न हो वह भी इस पर अमल करें यानी ज़िल हिज्जा का चाँद नज़र आने के बाद अपने नाख़ून और जिस्म के मुख़्तलिफ़ हिस्सों के बाल न काट कर 10 ज़िल हिज्जा को ईद की नमाज़ के बाद काटें तो उन्हें क़ुर्बानी के बराबर सवाब मिले गा।


 ‏‏‏‏‏عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، ‏‏‏‏‏‏أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ لِرَجُلٍ:‏‏‏‏ أُمِرْتُ بِيَوْمِ الْأَضْحَى عِيدًا جَعَلَهُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ لِهَذِهِ الْأُمَّةِ ، ‏‏‏‏‏‏فَقَالَ الرَّجُلُ:‏‏‏‏ أَرَأَيْتَ إِنْ لَمْ أَجِدْ إِلَّا مَنِيحَةً أُنْثَى،‏‏‏‏ أَفَأُضَحِّي بِهَا ؟، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏ لَا، ‏‏‏‏‏‏وَلَكِنْ تَأْخُذُ مِنْ شَعْرِكَ، ‏‏‏‏‏‏وَتُقَلِّمُ أَظْفَارَكَ، ‏‏‏‏‏‏وَتَقُصُّ شَارِبَكَ، ‏‏‏‏‏‏وَتَحْلِقُ عَانَتَكَ، ‏‏‏‏‏‏فَذَلِكَ تَمَامُ أُضْحِيَّتِكَ عِنْدَ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ .

(سنن نسائی، رقم الحدیث 4370/کتاب الضحايا » من لم يجد الأضحية)

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक व्यक्ति से कहा: "मुझे क़ुर्बानी के (दसवीं ज़िलहिज्जा) को ईद मनाने का आदेश दिया गया है, अल्लाह तआला ने उस दिन को उम्मत के लिए ईद का दिन बनाया है", वह शख़्स बोला अगर मेरे पास दूध देने वाली बकरी के इलावा कुछ न हो तो आप का क्या ख़्याल है ? क्या मुझे इसी की क़ुर्बानी करनी चाहिए? आप ने फ़रमाया: "नहीं, बल्कि क़ुर्बानी के दिन तुम अपने बाल, नाख़ून काटो, अपनी मूंछें तराशो और नाफ़ (नाभि) के नीचे बाल साफ़ करो, तो यह अल्लाह के नज़दीक क़ुर्बानी का मुकम्मल बदला हो जायेगा"।

[सुनन निसाई हदीस नंबर 4370/ किताबुज़ ज़हाया: जिस के पास क़ुर्बानी का जानवर न हो]


 ‏‏‏‏‏‏عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، ‏‏‏‏‏‏أَنّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏ أُمِرْتُ بِيَوْمِ الْأَضْحَى عِيدًا جَعَلَهُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ لِهَذِهِ الْأُمَّةِ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ الرَّجُلُ:‏‏‏‏ أَرَأَيْتَ إِنْ لَمْ أَجِدْ إِلَّا أُضْحِيَّةً أُنْثَى، ‏‏‏‏‏‏أَفَأُضَحِّي بِهَا قَالَ:‏‏‏‏ لَا، ‏‏‏‏‏‏وَلَكِنْ تَأْخُذُ مِنْ شَعْرِكَ وَأَظْفَارِكَ وَتَقُصُّ شَارِبَكَ، ‏‏‏‏‏‏وَتَحْلِقُ عَانَتَكَ، ‏‏‏‏‏‏فَتِلْكَ تَمَامُ أُضْحِيَّتِكَ عِنْدَ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ.

(سنن ابی داؤد، 2789/ کتاب الضحايا » ما جاء في إيجاب الأضاحي)

क़ुर्बानी (10 ज़िल हिज्जा) के दिन मुझे ईद मानाने का हुक्म दिया गया है जिसे अल्लाह तआला ने इस उम्मत के लिए मुक़र्रर फ़रमाया है। एक शख़्स कहने लगा अगर मेरे पास फ़ीमेल जानवर के इलावा कोई चीज़ न हो तो क्या उसी की क़ुर्बानी कर दूँ? आप ने फ़रमाया' नहीं, लेकिन उस दिन तुम अपने बाल कटा लो, नाख़ून तराश लो और नाफ़ के नीचे के बाल साफ़ कर लो अल्लाह के नज़दीक यही तेरी तरफ़ से क़ुर्बानी का बदल हो जायेगी।"

[सुनन अबु दाऊद हदीस नंबर 2789/किताबुल उज़हिया, क़ुरबानी के वजूब का बयान]


अरफ़ा (9 ज़िलहिज्जा) के दिन का रोज़ा:

अहादीस में अरफ़ा दिन के रोज़े के सिलसिले में बड़ी फ़ज़ीलत बयान हुई है और इसकी वजह यह है कि इस दिन के महत्व शरीअत में कई ऐतेबार से है, जैसे:

حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، ‏‏‏‏‏‏حَدَّثَنَا وَهْبٌ، ‏‏‏‏‏‏حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ عَلِيٍّ. وحَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، ‏‏‏‏‏‏حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، ‏‏‏‏‏‏عَنْمُوسَى بْنِ عَلِيٍّ، ‏‏‏‏‏‏وَالْإِخْبَارُ فِي حَدِيثِ وَهْبٍ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏ سَمِعْتُ أَبِي، ‏‏‏‏‏‏أَنَّهُ سَمِعَ عُقْبَةَ بْنَ عَامِرٍ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:‏‏‏‏ يَوْمُ عَرَفَةَ وَيَوْمُ النَّحْرِ وَأَيَّامُ التَّشْرِيقِ عِيدُنَا أَهْلَ الْإِسْلَامِ وَهِيَ أَيَّامُ أَكْلٍ وَشُرْبٍ .

अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया: " अरफ़ा का दिन, क़ुर्बानी का दिन, तशरीक़ के तमाम दिन हम मुसलमानों लिए ईद है और यह खाने पीने का दिन है।

[सुनन अबी दाऊद हदीस नंबर 2419/ किताबुस सौम :तशरीक़ के रोज़े का बयान]

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عن عَائِشَة أنَّ رَسُولَ اللهِ ‌صلی ‌اللہ ‌علیہ ‌وآلہ ‌وسلم ‌قَالَ: مَا مِنْ يَوْمٍ أَكْثَرَ مِنْ أَنْ يُعْتِقَ الله فِيهِ عَبْدًا مِنَ النَّارِ مِنْ يَوْمِ عَرَفَةَ وَإِنَّهُ لَيَدْنُو ثُمَّ يُبَاهِى بِهِمُ الْمَلاَئِكَةَ فَيَقُولُ: مَا أَرَادَ هَؤُلاَءِ؟ 

आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से मरवी है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: यौमे अरफ़ा के इलावा ऐसा कोई दिन नहीं जिसमें अल्लाह बड़ी संख्या में नरक से मुक्त करता है। अल्लाह तआला बन्दों की बड़ी तादाद को जहन्नम से आज़ाद करता हो। अल्लाह क़रीब होता है फिर फ़रिश्तों पर फ़ख्र करता है और फ़रमाता है यह और क्या चाहते हैं?

[सही मुस्लिम हदीस नंबर 3288/ किताबुल हज्ज, हज्ज, उमरा और अरफ़ा का बयान, अस सिलसिलतुस सहीहा लिल अलबानी हदीस नंबर 1570/ हज्ज और उम्र का बयान]

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عَنْ أَبِي قَتَادَةَ الْأَنْصَارِيِّ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ سُئِلَ عَنْ صَوْمِهِ؟ قَالَ: فَغَضِبَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ عُمَرُ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ: رَضِينَا بِاللهِ رَبًّا، وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا، وَبِمُحَمَّدٍ رَسُولًا، وَبِبَيْعَتِنَا بَيْعَةً. قَالَ: فَسُئِلَ عَنْ صِيَامِ الدَّهْرِ؟ فَقَالَ: «لَا صَامَ وَلَا أَفْطَرَ - أَوْ مَا صَامَ وَمَا أَفْطَرَ -» قَالَ: فَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمَيْنِ وَإِفْطَارِ يَوْمٍ؟ قَالَ: «وَمَنْ يُطِيقُ ذَلِكَ؟» قَالَ: وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمٍ، وَإِفْطَارِ يَوْمَيْنِ؟ قَالَ: «لَيْتَ أَنَّ اللهَ قَوَّانَا لِذَلِكَ» قَالَ: وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمٍ، وَإِفْطَارِ يَوْمٍ؟ قَالَ: «ذَاكَ صَوْمُ أَخِي دَاوُدَ - عَلَيْهِ السَّلَام -» قَالَ: وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ الِاثْنَيْنِ؟ قَالَ: «ذَاكَ يَوْمٌ وُلِدْتُ فِيهِ، وَيَوْمٌ بُعِثْتُ - أَوْ أُنْزِلَ عَلَيَّ فِيهِ -» قَالَ: فَقَالَ: «صَوْمُ ثَلَاثَةٍ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ، وَرَمَضَانَ إِلَى رَمَضَانَ، صَوْمُ الدَّهْرِ» قَالَ: وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَرَفَةَ؟ فَقَالَ: «يُكَفِّرُ السَّنَةَ الْمَاضِيَةَ وَالْبَاقِيَةَ» قَالَ: وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَاشُورَاءَ؟ فَقَالَ: «يُكَفِّرُ السَّنَةَ الْمَاضِيَةَ» وَفِي هَذَا الْحَدِيثِ مِنْ رِوَايَةِ شُعْبَةَ قَالَ: وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ الِاثْنَيْنِ وَالْخَمِيسِ؟ فَسَكَتْنَا عَنْ ذِكْرِ الْخَمِيسِ لَمَّا نُرَاهُ وَهْمًا

अबु क़तादा अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दहर के रोज़ों के बारे में सवाल किया गया तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नाराज़ हो गए, उस पर उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि हम अल्लाह के रब होने, इस्लाम के दीन होने, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने, और बैअत के तौर पर आप की बैअत पर राज़ी हैं। उसके बाद आप से हमेशा (पूरे साल) रोज़ा रखने के बारे में पूछा गया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "उस व्यक्ति ने रोज़ा रखा न इफ़्तार किया।"

फिर आप से दो दिन रोज़ा रखने और एक दिन छोड़ देने के बारे में पुछा गया। 

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा: "कौन इस की ताक़त रखता है?"

फिर आप से एक दिन रोज़ा रखने और दो दिन छोड़ने के बारे में पुछा गया।

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "काश कि अल्लाह ने हमें इस काम की ताक़त दी होती।" 

फिर आप से एक दिन रोज़ा रखने एक दिन छोड़ने के बारे में सवाल किया गया। 

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "यह मेरे भाई दाऊद अलैहिस्सलाम का रोज़ा है।"

और जब आप से सोमवार का रोज़ा रखने के बारे में सवाल किया गया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "यह दिन है जब मैं पैदा हुआ और जिस दिन मुझे (रसूल बनाकर) भेजा गया। या मुझ पर (कुरआन) नाज़िल किया गया।"

उसके बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "हर महीने के तीन रोज़े और अगले रमज़ान तक रमज़ान के रोज़े ही हमेशा के रोज़े हैं।"

उन्होंने कहा: फिर आप से यौमे अरफ़ा के रोज़े के सिलसिले में पुछा गया। 

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "यह पिछले और अगले साल के गुनाहों (पापों) का कफ़्फ़ारा बन जाता है।"

फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से आशूरा के दिन रोज़ा रखने के बारे में पूछा गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "वह पिछले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है।"

[सही मुस्लिम हदीस नंबर 2747/किताबस सयाम , अरफ़ा के दिन और महीने के तीन दिन के रोज़ों का बयान]

और इस से पहले वाली हदीस में भी है:

وَسُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَرَفَةَ؟ فَقَالَ: «يُكَفِّرُ السَّنَةَ الْمَاضِيَةَ وَالْبَاقِيَةَ»

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अरफ़ा के रोज़ों के बारे में सवाल किया गया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि यह पिछले साल और इस साल के रोज़ों का कफ़्फ़ारा है।

[सही मुस्लिम हदीस नंबर 2746]

अबु दाऊद , इब्ने माजा और मुसनद अहमद में भी यह हदीसें देखी जा सकती हैं)


इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-5" में करेंगे।  


आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही   

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