ईदुल अज़हा (किस्त 02)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल
[क़ुर्बानी का पसेमंज़र (भूमिका)]
ईदुल अज़हा दो लफ्ज़ ईद और अज़हा से मिल कर बना है। अज़हा का अर्थ है "क़ुर्बानी" इसलिए ईदुल अज़हा का मतलब हुआ "क़ुर्बानी की ईद"।
ईद + अज़हा (क़ुर्बानी) = क़ुर्बानी की ईद
---------------------
ईदुल अज़हा क्यों मनाई जाती है इसका इतिहास क्या है, एक नज़र इस पर भी डालना चाहिए। इसे समझने के लिए सब से पहले कुर्बानी कब और किस तरह शुरू हुई, इसे समझना बहुत ज़रूरी है।
क़ुर्बानी इब्राहीम और इस्माईल عليهما السلام की सुन्नत है।
आज से लगभग साढ़े चार हज़ार वर्ष पूर्व इब्राहीम عليه السلام इराक़ के शहर “बाबिल” के एक सम्मानित परिवार में पैदा हुए। आप संदेष्टा (messenger) “नूह” के बेटे “साम” की संतान में से थे। मेहमानों की इज़्ज़त करने वाले थे इसी लिए उनकी उपाधि “अबू-ज़ैफान” (मेहमानों का बाप) पड़ गई थी।
इब्राहीम अलैहिस्सलाम जिस वातावरण में पैदा हुए क़ुरआन ने उस समय की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की ओर संकेत किया है जिस से ज्ञात होता है कि उस समय लोग तीन भागों में बटे हुए थे।
(1) कुछ लोग चंद्रमा एंव सूर्य की पूजा करते थे।
(2) कुछ लोग पत्थर और कंकड़ी से बनाई गई मुर्तियों के सामने झुकते थे।
(3) जबकि कुछ लोग उस समय के शासक “नमरूद” की पूजा करते थे।
ऐसे ही अंधकार वातावरण में एक प्रोहित “आज़र” के घर ईब्राहीम عليه السلام की पैदाईश हुई। उनके पिता “आज़र” लोहार थे, वह लकड़ी की मूर्ति बनाते, उन्हें बेचते और लोगों को उनकी पूजा हेतू आमंत्रित किया करते थे।
समय गुज़रता रहा। इब्राहीम عليه السلام बचपन ही से मूर्तियों को नफ़रत से देखते, उनकी आलोचना करते और सोचते रहते कि यह मूर्तियाँ न खा सकती हैं, न पी सकती हैं, न बोल सकती हैं, न सुन सकती हैं तो आख़िर लोग इनकी पूजा क्यों करते हैं? इन से लाभ की आशा एवं हानि का भय क्यों रखते हैं? यह कैसे लोग हैं जो अपने हाथों से पत्थर तराश कर मूर्ति बनाते हैं और फिर कहते हैं कि यह हमारे माबूद (पूज्य) हैं।
---------------------
जब अल्लाह ने इब्राहीम عليه السلام को अपने क़बीले की ओर संदेष्टा बनाकर भेजा तो सब से पहले उन्होंने आपने अपने पिता को समझाया क़ुरआन ने इसकी वज़ाहत की है:
إِذۡ قَالَ لِأَبِيهِ يَـٰٓأَبَتِ لِمَ تَعۡبُدُ مَا لَا يَسۡمَعُ وَلَا يُبۡصِرُ وَلَا يُغۡنِى عَنكَ شَيۡـًٔا (٤٢) يَـٰٓأَبَتِ إِنِّى قَدۡ جَآءَنِى مِنَ ٱلۡعِلۡمِ مَا لَمۡ يَأۡتِكَ فَٱتَّبِعۡنِىٓ أَهۡدِكَ صِرَٲطًا سَوِيًّا (٤٣) يَـٰٓأَبَتِ لَا تَعۡبُدِ ٱلشَّيۡطَـٰنَۖ إِنَّ ٱلشَّيۡطَـٰنَ كَانَ لِلرَّحۡمَـٰنِ عَصِيًّا (٤٤) يَـٰٓأَبَتِ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يَمَسَّكَ عَذَابٌ مِّنَ ٱلرَّحۡمَـٰنِ فَتَكُونَ لِلشَّيۡطَـٰنِ وَلِيًّا (٤٥)
(سورة ١٩ مريم آیت 42 تا 45)
“पिता जी! आप उन चीज़ों की इबादत (उपासना) क्यों करते हैं, जो न सुनती हैं, न देखती हैं, और न आपका कोई काम बना सकती हैं? पिता जी! मेरे पास एक ऐसा ज्ञान आया है जो आपके पास नहीं आया, आप मेरी बात मानें मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊंगा। पिता जी! आप शैतान की पूजा न करें शैतान तो मेहरबान अल्लाह का नाफ़रमान (अवज्ञाकारी) है। पिता जी! मुझे डर है कि कहीं आप मेहरबान अल्लाह के अज़ाब (प्रकोप) में (ग्रस्त) न हो जाएं।”
[सूरह 19 मरयम, आयत 42-45]
परन्तु उनके पिता ने एक न सुनी और उन्हें झटकते हुए जवाब दिया:
قَالَ أَرَاغِبٌ أَنتَ عَنۡ ءَالِهَتِى يَـٰٓإِبۡرَٲهِيمُۖ لَىِٕن لَّمۡ تَنتَهِ لَأَرۡجُمَنَّكَۖ وَٱهۡجُرۡنِى مَلِيًّا (٤٦)
(سورة ١٩ مريم)
“हे इब्राहीम! यदि तू अपने इस काम से न रुका तो मैं तुझे पत्थर से मार मार कर बर्बाद कर दूंगा…..बस यही कहता हूं कि तू हमेशा के लिए मुझ से अलग हो जा”।
[सूरह 19 मरयम आयत 46]
जब आपको अपने पिता से निराशाजनक उत्तर मिला तो अपने समुदाय के चंद्रमा और सूर्य की पूजा करने वालों को निहायत हिकमत से समझाया:
فَلَمَّا جَنَّ عَلَيۡهِ ٱلَّيۡلُ رَءَا كَوۡكَبًاۖ قَالَ هَـٰذَا رَبِّىۖ فَلَمَّآ أَفَلَ قَالَ لَآ أُحِبُّ ٱلۡأَفِلِينَ (٧٦) فَلَمَّا رَءَا ٱلۡقَمَرَ بَازِغًا قَالَ هَـٰذَا رَبِّىۖ فَلَمَّآ أَفَلَ قَالَ لَىِٕن لَّمۡ يَہۡدِنِى رَبِّى لَأَڪُونَنَّ مِنَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلضَّآلِّينَ (٧٧) فَلَمَّا رَءَا ٱلشَّمۡسَ بَازِغَةً قَالَ هَـٰذَا رَبِّى هَـٰذَآ أَڪۡبَرُۖ فَلَمَّآ أَفَلَتۡ قَالَ يَـٰقَوۡمِ إِنِّى بَرِىٓءٌ مِّمَّا تُشۡرِكُونَ (٧٨)
(سورة 6 الانعام الايه 76--78)
जब रात का अंधकार छा गया तो आपने सब के समक्ष एक सितारे को देखकर कहा कि यह मेरा रब है। परन्तु जब वह डूब गया तो सुबह होते ही कहने लगेः “मैं डूबने वाले की पूजा नहीं कर सकता”। दूसरी रात जब चंद्रमा को चमकते देखा तो क़बीले के लोगों से कहने लगेः “यह मेरा रब है”। जब वह भी डूब गया तो कहने लगेः “यदि मेरे रब ने मेरा मार्गदर्शन (रहनुमाई) न किया तो मैं गुमराह लोगों में से हो जाऊंगा”। फिर जब सूर्य को चमकते हुए देखा तो समुदाय के लोगों से कहने लगे यह मेरा रब है , यह सब से बड़ा है. जब वह् भी डूब गया तो कहा ऐ मेरे क़बीले (समुदाय) के लोगो! जो शिर्क तुम कर रहे हो मैं उस से अलग और बेज़ार हूँ।
[सूरह 06 अल अनआम आयत 76 से 78]
ऐसी शैली मात्र इसलिए अपनाई ताकि क़बीले के लोगों को विश्वास दिला सकें कि आख़िर ऐसी चीज़ों की पूजा से क्या लाभ जो छुपती हों, विदित होती हों, निकलती हों, डूबती हों। पहली रात लोग न समझ सके तो दूसरी रात चंद्रमा को देख कर समझाना चाहा लेकिन फिर भी न समझे तो सुबह में जब सूर्य को निकलते देखा तो कहाः “यह मेरा रब है….यह महान भी है”। फिर जब वह भी डूब गया तो आपनी वार्ता समाप्त करते हुए कहा:
إِنِّى وَجَّهۡتُ وَجۡهِىَ لِلَّذِى فَطَرَ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضَ حَنِيفًاۖ وَمَآ أَنَا۟ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ (٧٩)
(سورة 6 الانعام الايه 79 )
"मैंने तो यकसु (एकाग्र) हो कर अपना रुख उस सत्ता (अल्लाह) की ओर कर लिया जिसने आकाश एवं पृथ्वी की रचना की है और मैं कदापि मुशरेकीन (बहुदेववादियों) में से नहीं हूं।"
[सूरः6 अल अनआम आयत 79]
---------------------
फिर इब्राहीम عليه السلام ने मूर्ति की पूजा करने वालों को समझाते हुए कहाः
إِذۡ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦ مَا هَـٰذِهِ ٱلتَّمَاثِيلُ ٱلَّتِىٓ أَنتُمۡ لَهَا عَـٰكِفُونَ
(سورة 21 الانبياء )
"जब उन्होंने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा ये मूर्तियां जिनकी तुम लोग मुजाविरी करते हो आख़िर क्या (बला) है?"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 52]
इब्राहीम عليه السلام ने यह भी कहा, "यह मात्र लकड़ी और पत्थर की मूर्तियाँ हैं, यह लाभ अथवा हानि की मालिक नहीं, यह तुमको रोज़ी देने का अधिकार नहीं रखते, केवल तुम अल्लाह से ही रोज़ी माँगो, उसी की इबादत करो, और उसी का शुक्रिया अदा करो। यदि तुम मेरी बात नहीं मानते और मुझे झुठलाते हो तो तुम से पहले भी लोग अपने संदेष्टाओं को झुठला चुके हैं।"
◼ क़ौम ने इब्राहीम عليه السلام की एक बात न मानी और बस… यही रट लगाते रहे:
قَالُواْ وَجَدۡنَآ ءَابَآءَنَا لَهَا عَـٰبِدِينَ
(سورة 21 الانبياء)
“आख़िर हम इनकी पूजा कैसे छोंड़ दें जबकि हमने अपने पूर्वजों (बाप दादा) को उनकी पूजा करते हुए पाया है?….”
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 53]
◼ इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उनको संतोष-जनक उत्तर देते हुए कहाः
قَالَ لَقَدۡ كُنتُمۡ أَنتُمۡ وَءَابَآؤُڪُمۡ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ (٥٤)
(سورة ٢١ الانبياء )
“तुम भी अंधकार में हो और तुम्हारे बाप दादा भी खुले अंधकार में पड़े थे”। अर्थात हमारी आपत्ति जो तुम पर है वही तुम्हारे पूर्वजों पर है।
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 54]
यदि एक गुमराही में तुम्हारे पूर्वज ग्रस्त हों और तुम भी उसमें ग्रस्त हो जाओ तो वह भलाई बनने से रही। मैं कहता हूं कि तुम और तुम्हारे पूर्वज सत्य मार्ग से भटक गए हो।
अब तो उनके कान खड़े हो गए क्योंकि उन्हों ने अपने बुद्धिमानों का अपमान होते देखा औऱ अपने पूर्वजों के प्रति अप्रिय शब्द सुने तो घबरा गए और कहने लगेः
قَالُوٓاْ أَجِئۡتَنَا بِٱلۡحَقِّ أَمۡ أَنتَ مِنَ ٱللَّـٰعِبِينَ (٥٥)
(سورة ٢١ الانبياء )
“इब्राहीम! क्या वास्तव में तुम ठीक कह रहे हो या मज़ाक कर रहे हो, हमने ऐसी बात कभी नहीं सुनी?
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 55]
◼ अब आपको अल्लाह के परिचय का शुभ अवसर मिला आपने कहाः
قَالَ بَل رَّبُّكُمۡ رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ ٱلَّذِى فَطَرَهُنَّ وَأَنَا۟ عَلَىٰ ذَٲلِكُم مِّنَ ٱلشَّـٰهِدِينَ (٥٦)
(سورة ٢١ الانبياء )
"इबराहीम ने कहा आसमान व ज़मीन का मालिक रब ही तुम्हारा रब है जिसने उनको पैदा किया और मैं खुद इस बात का तुम्हारे सामने गवाह हूँ।"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 56]
◼ अब ईब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने दिल में यह ठान ली कि:
وَتَٱللَّهِ لَأَڪِيدَنَّ أَصۡنَـٰمَكُم بَعۡدَ أَن تُوَلُّواْ مُدۡبِرِينَ (٥٧)
(سورة ٢١ الانبياء )
"उनकी मुर्तियों का कुछ न कुछ अवश्य इलाज किया जाए। आपने सोचा कि उनके त्योहार का दिन निर्धारित है।"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 57]
فَقَالَ إِنِّى سَقِيمٌ (٨٩) فَتَوَلَّوۡاْ عَنۡهُ مُدۡبِرِينَ (٩٠) فَرَاغَ إِلَىٰٓ ءَالِهَتِہِمۡ فَقَالَ أَلَا تَأۡكُلُونَ (٩١) مَا لَكُمۡ لَا تَنطِقُونَ (٩٢) فَرَاغَ عَلَيۡہِمۡ ضَرۡبَۢا بِٱلۡيَمِينِ (٩٣) فَأَقۡبَلُوٓاْ إِلَيۡهِ يَزِفُّونَ (٩٤)
(سورة 37 الصافات)
“मेरी तबियत कुछ ठीक सी नहीं। जब सब लोग त्योहार मनाने के लिए निकल गए फिर तो इबराहीम चुपके से उनके बुतों की तरफ़ मुतावज्जह हुए और (कुल्हाड़ी तान के) कहा तुम्हारे सामने इतने चढ़ाव रखे हैं।
आख़िर तुम खाते क्यों नहीं। अरे तुम्हें क्या हो गया है कि तुम बोलते तक नहीं। फिर दाहिने हाथ से मारना शुरू किया और प्रत्येक मूर्तियों को टूकड़े टूकड़े कर दिया।"
[सूरह 37 अस साफ्फ़ात आयत 89 से 94]
और
فَجَعَلَهُمۡ جُذَٲذًا إِلَّا ڪَبِيرًا لَّهُمۡ لَعَلَّهُمۡ إِلَيۡهِ يَرۡجِعُونَ (٥٨)
(سورة 21 الانبياء )
"मात्र बड़ी मूर्ति को रहने दिया ताकि उनके मन मस्तिष्क में यह ख्याल पैदा हो कि शायद बड़ी मूर्ति ने ही छोटी मूर्तियों को नष्ट कर दिया है।"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 58]
---------------------
किसने हमारी मूर्तियों का अपमान किया?
जब लोग त्योहार से लोट कर आए तो यह देख कर सख्त तआज्जुब में पड़ गए कि सारी छोटी मूर्तियां मुंह के बल गिरी पड़ी हैं। उनके पैरों से तो ज़मीन खिसक गई और कहने लगे:
قَالُواْ مَن فَعَلَ هَـٰذَا بِـَٔالِهَتِنَآ إِنَّهُ ۥ لَمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ (٥٩) قَالُواْ سَمِعۡنَا فَتًى يَذۡكُرُهُمۡ يُقَالُ لَهُ ۥۤ إِبۡرَٲهِيمُ (٦٠)
(سورة 21 الانبياء )
"यह कौन ज़ालिम था जिसने हमारी मूर्तियों का अपमान किया? कुछ लोगों ने कहा कि हमने इब्राहीम को इन बुतों के प्रति अपशब्द बोलते सुना है।"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 59, 60]
◼ क़बीले के लोगों ने पारस्परिक परामर्श के बाद यह निर्णय लिया कि:
قَالُواْ فَأۡتُواْ بِهِۦ عَلَىٰٓ أَعۡيُنِ ٱلنَّاسِ لَعَلَّهُمۡ يَشۡهَدُونَ (٦١)
قَالُوٓاْ ءَأَنتَ فَعَلۡتَ هَـٰذَا بِـَٔالِهَتِنَا يَـٰٓإِبۡرَٲهِيمُ (٦٢) قَالَ بَلۡ فَعَلَهُ ۥ ڪَبِيرُهُمۡ هَـٰذَا فَسۡـَٔلُوهُمۡ إِن ڪَانُواْ يَنطِقُونَ (٦٣)
(سورة ٢١ الانبياء )
इब्राहीम को सभी के सामने बुला कर उसे सज़ा दी जाए।
अतः जब सब लोग आ गए तो इब्राहीम (जो अपराधी के रूप में वहाँ उपस्थित थे) से पूछा गयाः ऐ इब्राहिम हमारे बुतों के साथ यह अपमानजनक व्यवहार किसने किया है ?
उस पर इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहाः “बल्कि यह काम इस बड़ी मूर्ति ने किया है, तुम अपने इन बूतों से ही पूछ लो,यदि यह बोलते हों।"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 61 से 63]
मक़सद यह था कि लोग स्वयं समझ लें कि यह पत्थर क्या बोलेंगे, और जब वह इतने विवश हैं तो वह भला माबूद कैसे हो सकते हैं।
इस ठोस उत्तर ने उन्हें थोड़ी देर के लिए हिला कर रख दिया, निराशाजनक शैली में कहने लगे कि हमने स्वयं ग़लती की, अपने माबूदों के पास सुरक्षा-दल रखे बिना त्योहार मानाने चले गए। फिर चिंतन मनन के पश्चात यह बात बनाई:
فَرَجَعُوٓاْ إِلَىٰٓ أَنفُسِهِمۡ فَقَالُوٓاْ إِنَّكُمۡ أَنتُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ (٦٤) ثُمَّ نُكِسُواْ عَلَىٰ رُءُوسِهِمۡ لَقَدۡ عَلِمۡتَ مَا هَـٰٓؤُلَآءِ يَنطِقُونَ (٦٥)
(سورة 21 الانبياء )
“तुम जो यह कहते हो कि हम उन से पूछ लें…. तो क्या तुम्हें पता नहीं कि वह बोलते नहीं हैं?….”
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 64, 65]
◼ अब इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपने संदेश के परिचय का शुभ अवसर मिल गया, अति दयालू होने के बावजूद तनिक ठोस स्वर में क़ौम को संबोधित कियाः
قَالَ أَفَتَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُڪُمۡ شَيۡـًٔا وَلَا يَضُرُّكُمۡ (٦٦) أُفٍّ لَّكُمۡ وَلِمَا تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِۖ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ (٦٧)
(سورة 21 الانبياء )
“खेद है कि तुम उनकी पूजा करते हो जो न तुम्हें कुछ लाभ पहुंचा सकें, न हानि। धिक्कार है तुम पर और तुम्हारे उन देवताओं पर जिनकी तुम अल्लाह को छोड़ कर पूजा करते हो, यह तो गूंगे और बहरे हैं, बोलने तक की क्षमता से वंचित हैं तो तुम्हारी सहायता कैसे करेंगे, क्या तुम कुछ भी बुद्धि नहीं रखते?”
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 66, 67]
इतनी हिकमत से समझाने के बावजूद क़ौम के लोगों पर कोई प्रभाव न पड़ा।
इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-3" में करेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
0 टिप्पणियाँ
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।