ईदुल अज़हा (किस्त 03)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल
[क़ुरबानी का पसेमंज़र (भूमिका)]
आग में जला डालने की योजनाः
जब एक व्यक्ति दलीलों से लाजवाब हो जाता है तो भलाई उसे आकर्षित कर लती है या बुराई उस पर अधिकार जमा लेती है। यहाँ इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ौम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनके दुर्भाग्य ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने आपस में मशविरा किया:
قَالُواْ حَرِّقُوهُ وَٱنصُرُوٓاْ ءَالِهَتَكُمۡ إِن ڪُنتُمۡ فَـٰعِلِينَ
(سورة 21 الانبياء أية ٦٨)
"इसे (इब्राहीम) को जला दो और अपने माबुदों की मदद करो अगर तुम कर सको।"
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 68]
और फिर लकड़ियाँ इकट्ठी की गईं, पृथ्वी में एक गहरा कुवां खोदा गया, लकड़ियों से उसे भर दिया गया। फिर उसमें आग लगा दी गई। और आसमान से बातें कर रही आग में ईब्राहीम عليه السلام को डाल दिया गया। जिस समय आपको आग में डाला गया आपकी ज़ुबान से मात्र यह शब्द निकले कि:
“अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वह उत्तम सहायक है।” उसी समय अल्लाह की ओर से आग को आदेश मिला कि,
قُلۡنَا يَـٰنَارُ كُونِى بَرۡدًا وَسَلَـٰمًا عَلَىٰٓ إِبۡرَٲهِيمَ
(سورة 21 الانبياء أية ٦٩)
“हे आग! ठण्डी हो जा और सलामती बन जा इब्राहीम पर।”
[सूरह 21 अल अंबिया आयत 69]
हर तऱफ़ से आग की लिपट (अग्निशिखा) निकल रही थी परन्तु आग ने आपको छुआ तक नहीं और वह अहानिकारक बन कर रह गया।
सम्राट (नमरूद) को दावतः
आग से सुरक्षित निकलने के बाद आप का चर्चा हर तरफ़ हो चूका था। अल्लाह का संदेश भी तमाम लोगों तक पहुंच गया था। केवल वहाँ के सम्राट नमरूद तक न पहुंच सका था। अतः आप इसी उद्देश्य से वहां के शासक “नमरूद” के पास गए जो स्वयं को ख़ुदा कहा करता था। उसके मन मस्तिष्क में अहंकार और घमण्ड कूट कूट कर भरा हुआ था। उसने जब ईब्राहीम अलैहिस्सलाम से अल्लाह के अस्तित्व पर प्रमाण मांगा तो आपने कहा:
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِى حَآجَّ إِبۡرَٲهِـۧمَ فِى رَبِّهِۦۤ أَنۡ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلۡمُلۡكَ إِذۡ قَالَ إِبۡرَٲهِـۧمُ رَبِّىَ ٱلَّذِى يُحۡىِۦ وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا۟ أُحۡىِۦ وَأُمِيتُۖ قَالَ إِبۡرَٲهِـۧمُ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَأۡتِى بِٱلشَّمۡسِ مِنَ ٱلۡمَشۡرِقِ فَأۡتِ بِہَا مِنَ ٱلۡمَغۡرِبِ فَبُهِتَ ٱلَّذِى كَفَرَۗ وَٱللَّهُ لَا يَہۡدِى ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ (٢٥٨)
“मेरा प्रभू वह है जिसके अधिकार में जीवन और मृत्यु है।” उसने कहाः ज़िन्दगी और मौत मेरे अधिकार में हैं
(फिर उसने दो व्यक्तियों को बूलाया जिसमें से एक का खून वैध था उसे मार दिया और दूसरे को छोड़ दिया फिर कहाः“देखा! मैं जीवन औऱ मृत्यु पर अधिकार रखता हूं ना?)
"जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उसकी ढिठाई देखी तो उसके समक्ष ऐसा प्रमाण पेश कर दिया जिस का जवाब वह कभी भी न दे सकता था और न क़यामत तक कोई दे पायेगा। आप ने कहाः अच्छा! मेरा परवरदिगार तो सूर्य को पूरब से निकालता है तू ज़रा उसे पश्चिम से निकाल कर दिखा” वह काफ़िर हैरान हो कर बगलें झांकने लगा।
[सूरह अल बक़रह आयत 258]
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हिजरत (देश-त्याग) का निर्णयः
अब इब्राहीम अलैहिस्सलाम का चर्चा पूरे देश में हो चुका था, लोग उनके चमत्कार और आग से सुरक्षित निकलने के प्रति बातें करने लगे थे, सम्राट के साथ उनका व्यवहार और उसे विवश करने का मआमिला प्रचलित होने लगा था। इधर इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के संदेश को फैलाने में प्रयत्नशील थे। रोज़ाना उनके विरोध (मुख़ालिफ़त) में इज़ाफ़ा ही होता जा रहा था। केवल एक महिला और एक पुरुष ने ही उनके संदेश को स्वीकार किया था। महिला का नाम सारा था जो उनकी पत्नी थीं और पुरुष उनके भतीजे लूत अलैहिस्सलाम थे जो बाद में अल्लाह के संदेष्टा नियुक्त किए गए। जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम के समक्ष यह विदित हो गया कि अल्लाह के संदेश को कोई अपनाने वाला नहीं रहा तो देश-त्याग का निर्णय कर लिया। परन्तु देश-त्याग से पूर्व अपने पिता को इस्लाम का संदेश एक बार फिर सुनाया लेकिन पिता तो कट्टर मुशरिक था, वह कब बेटे की बात मानता।
इस प्रकार आप उन से प्यार भरे शैली में बात करने के बाद लूत और अपनी पत्नी सारा को साथ लिए वहाँ से निकल गए। शाम, हर्रान से होते हुए फ़लिस्तीन पहुंचे, फिर मिस्र गए।
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मिस्र में चमत्कारिक घटनाः
मिस्र में पहुंचने के पश्चात एक चमत्कारिक घटना पेश आई, जिसका ख़ुलासा यह है कि जब आप मिस्र पहुंचे तो वहाँ का सम्राट बड़ा अत्याचारी था। किसी ने सम्राट को सूचना दी कि एक यात्री के साथ बड़ी सुन्दर महिला है और वह इस समय हमारे देश में है। सम्राट ने तुरन्त सैनिक भेजा कि वह सारा रज़ी अल्लाहु अन्हा को उसके पास हाज़िर करे। हज़रत सारा वहाँ से चलीं, और इधर इब्राहीम अलैहिस्सलाम नमाज़ के लिए खड़े हो गए। जब सारा को अत्याचारी महाराजा ने देखा और उनकी ओर लपका तो तुरन्त अल्लाह के प्रकोप (अज़ाब) में ग्रस्त हो गया। हाथ, पैर ऐंठ गए। भयभीत होकर विन्ती करने लगाः हे पवित्र महिला! अल्लाह से प्रार्थना कर कि वह मुझे क्षमा कर दे, मैं वचन देता हूं कि फिर तुझे हाथ न लगाऊंगा। आपने प्रार्थना की, उसी समय वह अच्छा हो गया। परन्तु अच्छा होते ही उसने फिर उनकी ओर हाथ बढ़ायाः वही प्रकोप फिर आ पहुंचा, और यह पहली बार से अधिक कठोर था। फिर उसने विन्ती की और सारा की प्रार्थना से ठीक हो गया। तीन बार ऐसा ही हुआ। तीसरी बार छूटते ही उस ने अपने सैनिक को आदेश दिया कि तू इस महिला को यहाँ से निकाल और हाजिरा (जो सम्राट की सेविका थी) को इसकी सेवा के लिए साथ कर दे, यह कोई इंसान नहीं बल्कि पवित्र-आत्मा है। उसी समय सारा वहाँ से निकाल दी गईं और हाजिरा उनके समर्पित की गईं। ईधर इब्राहीम अलैहिस्सलाम उनकी आहट पाते ही नमाज़ से फ़ारिग़ हुए और पूछा कि कहोः क्या गुज़री? कहा कि अल्लाह ने उस अत्याचारी के प्रतारण को उसी पर लौटा दिया और हाजिरा मेरी सेवा के लिए आ गईं। [ब हवाला: सही बुख़ारी- किताबुल अंबिया]
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इस्माईल की पैदाइशः
इस प्रकार तबलीग़, सवाल व जवाब तथा आज़माइश और परीक्षाओं में इब्राहीम की आयु 80 वर्ष की हो गई। अब तक इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कोई संतान न हुई थी, हृदय में संतान की इच्छा हचकोले खा रही थीं। अतः सारा के अनुरोध पर आपने हाजिरा से विवाह कर लिया। फिर अल्लाह से प्रार्थाना की कि:
رَبِّ هَبۡ لِى مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ (١٠٠)
(سورة 37 الصافات )
"हे अल्लाहू! तू मुझे एक नेक बेटा प्रदान कर।"
[सूरह 37 अस साफ्फ़ात आयत 100]
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ क़ुबूल हो गई और हाजिरा अलैहिस्सलाम के गर्भ से इस्माईल अलैहिस्सलाम पैदा हुए।
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हाजरा और इस्माईल मक्के में:
बुढ़ापे में औलाद पा कर इब्राहीम अलैहिस्सलाम का हृदय प्रसन्नता से खिल उठा परन्तु अल्लाह की तऱफ़ से अज़माइशें अभी और बाक़ी थीं। इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आदेश मिला कि अपनी पत्नी हाजिरा और अपने प्यारे बेटे इस्माईल को मक्का के रेगिस्तान (मरुस्थल) में छोड़ आएं। आदेशानुसार बिना किसी संकोच के अपने पुत्र इस्माईल और अपनी पत्नी हाजिरा के साथ मक्का के रेगिस्तान में पहुंच गए। खानपान के लिए कुछ खुजूर और जल वहाँ रख दिया और लौटने के लिए मुड़े। पत्नी हाजिरा तेज़ी से उनके पीछे आईं और बोलीः इब्राहीम! आप इस रेगिस्तान में हमें छोड़ कर कहाँ जा रहे हैं? कोई उत्तर नहीं मिल रहा है, बिल्कुल चुप हैं, चलते जा रहे हैं और यह पूछती जा रही हैं। अंततः ध्यान आता है कि शायद अल्लाह का आदेश हो, पूछती हैं “क्या आपको अल्लाह का आदेश मिला है?” उत्तर मिलता हैः हाँ। विश्वसनीय (अक़ीदत मंद) पत्नी यह सुनते ही बोल उठती हैं “जब अल्लाह का आदेश है तो वह अवश्य हमारी सुरक्षा करेगा” इब्राहीम अलैहिस्सलाम चले यहाँ तक कि एक पहाड़ की ओट में आ कर खड़े हुए, अपना दोनों हाथ आसमान की ओर उठाया और अल्लाह से प्रार्थना कीः
رَّبَّنَآ إِنِّىٓ أَسۡكَنتُ مِن ذُرِّيَّتِى بِوَادٍ غَيۡرِ ذِى زَرۡعٍ عِندَ بَيۡتِكَ ٱلۡمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱجۡعَلۡ أَفۡـِٔدَةً مِّنَ ٱلنَّاسِ تَہۡوِىٓ إِلَيۡہِمۡ وَٱرۡزُقۡهُم مِّنَ ٱلثَّمَرَٲتِ لَعَلَّهُمۡ يَشۡكُرُونَ (٣٧)
(سورة 14 ابراهيم )
"ऐ हमारेे रब मैने तेरे मुअज़िज़ (इज्ज़त वाले) घर (काबे) के पास एक बे खेती के (वीरान) बियाबान (मक्का) में अपने बीवी बच्चो को (लाकर) बसाया है ताकि ऐ हमारे रब ये लोग यहाँ नमाज़ पढ़ा करें तू लोगों के दिलों को उनकी तरफ़ माएल कर (ताकि वह यहाँ आकर आबाद हों) और उन्हें तरह तरह के फलों से रोज़ी अता कर ताकि ये लोग (तेरा) शुक्र अदा करें।"
[सूरह 14 इब्राहीम आयत 37]
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ज़मज़म का जारी होना:
जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम मक्का से लौट गए तो हाजिरा अलैहिस्सलाम अपने दूध पीते बच्चे के साथ निर्जल स्थान को ठिकाना बनाया, दो दिन के बाद खान-पान की सामग्री समप्त हो गयी, माँ का स्तन भी सूखने की नौबत आ गयी, हाजिरा और इस्माईल अलैहिस्सलाम प्यास से विकल हैं, अति कठोर और गंभीर परिस्थिति है। प्यास से इस्माईल तड़प रहे हैं, माँ हाजिरा जल की खोज में इधर उधर दौड़ लगा रही है। कभी तेज़ी से सफ़ा पहाड़ पर चढ़ती हैं कि शायद कोई कुवाँ, मानव, अथवा यात्रीदल दिखाई दे परन्तु कुछ नज़र नहीं आता। सफ़ा से उतर कर मर्वा पहाड़ तक दौड़ती हुई जाती हैं, मर्वा पर चढ़ती हैं कि शायद कोई दिखाई दे परंतु दूर दूर तक किसी का पता नही हैं….थक हार कर बच्चे के पास आती हैं, बच्चा प्यास की सख़्ती से तड़प रहा है। व्याकुलता की स्थिति में तेज़ी से सफ़ा की ओर आती हैं. फिर मर्वा की ओर दौड़ती हैं, इस प्रकार जाते और लौटते हुए सात चक्कर काट लेती हैं।
हाजिरा की इसी यादगार (स्मृतिचिन्ह) को हज्ज तथा उमरा में सफ़ा और मर्वा का सात चक्कर लगा कर ताज़ा किया जाता है। तात्पर्य यह कि सातवीं बार हाजिरा अलैहिस्सलाम व्यकुल, थकी हारी और निराशाजनक स्थिति में बच्चे के पास बैठ जाती हैं। रोते रोते और प्यास की कठोरता से आवाज़ बैठी जा रही थी। इसी स्थिति में अल्लाह की रहमत जोश में आती है, इस्माईल रोते हुए पृथ्वी पर पैर पटखते हैं तो पैर के नीचे से ज़मज़म का चश्मा (स्रोत) जारी हो जाता है। इस प्रकार माँ और बेटा दोनों मृत्यु के मुंह से निकल आते हैं।
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इस्माईल की क़ुर्बानी:
जब इस्माईल अलैहिस्सलाम थोडा बड़े हुए और चलना फिरना सीख गए और “फ़र्रा” के अनुसार जब 13 वर्ष के हो गए तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम को एक बहुत ही सख़्त आज़माइश से गुज़रना पड़ा। ख़्वाब में आदेश दिया गया कि आप अपने प्यारे बच्चे इस्माईल को अल्लाह के नाम पर क़ुर्बान कर दें।
कितनी इच्छाओं के बाद बच्चा पैदा हुआ था, औलाद आँखों की ठंढक, जिगर का टुकड़ा और बढ़ापे की लाठी होती है। परन्तु इधर अल्लाह का आदेश था… अपने बच्चे के पास आये और कहा जैसा कि क़ुरआन में है:
فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ ٱلسَّعۡىَ قَالَ يَـٰبُنَىَّ إِنِّىٓ أَرَىٰ فِى ٱلۡمَنَامِ أَنِّىٓ أَذۡبَحُكَ فَٱنظُرۡ مَاذَا تَرَىٰۚ
(ِسورة ٣٧ الصافات)
“जब बच्चा दौड़ने के क़ाबिल हो गया तो इब्राहीम ने बेटे से कहा बेटा मैंने ख़्वाब देखा है कि मैं तुझे ज़बह कर रहा हूं? अब तू बता तेरा क्या विचार है….?"
[सूरह 37 अस साफ्फ़ात,आयत 102]
बेटा भी कौन था फ़रमांबरदार बाप का फ़रमांबरदार बेटा तुरन्त उत्तर देता हैः
قَالَ يَـٰٓأَبَتِ ٱفۡعَلۡ مَا تُؤۡمَرُۖ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
(ِسورة ٣٧ الصافات)
"ऐ मेरे वालिद जो कुछ आपको आदेश दिया जा रहा है उसे कर डालिए, आप इन शा अल्लाह मुझे सब्र करने वालों में से पाएंगे।"
[सूरह 37 अस साफ्फ़ात: 102]
इस्माईल की इसी फ़रमाँबरदारी को अल्लामा इक़बाल ने यूँ कहा हैं:
वह फैज़ाने नज़र था या कि मकतब की करामत थी,
सिखाये किसने इस्माईल को आदाबे फ़र्ज़नदी।
फिर वह समय आता है कि मिना की ऐतिहासिक रेगिस्तानी धरती पर,
فَلَمَّآ أَسۡلَمَا وَتَلَّهُ ۥ لِلۡجَبِينِ (١٠٣)
(ِسورة ٣٧ الصافات)
"इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्र इस्माईल को पेशानी के बल लिटाया (और छुरी चला दी)।"
[सूरह 37 अस साफ्फ़ात आयत 103]
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की छुरी इस्माईल की गर्दन पर बराबर चल रही थी लेकिन छुरी काट नहीं रही थी क्योंकि अगर इब्राहीम को आदेश मिला था कि अपने पुत्र को ज़बह करो तो छुरी को भी आदेश था कि तुम कदापि न काटना। छुरी भी तो अल्लाह आदेश के अधीन है.वह अपना प्रभाव दिखाए तो कैसे…?)
अल्लाह की हिकमत को समझना सरल नहीं, अतः अल्लाह ने अपनी हिकमत का रहस्य खोलते हुए आकाशीय दूत जिब्रील अलैहिस्सलाम के माध्यम से एक मेंढा भेज दिया और इस्माईल के बदले उस मेंढे को ज़बह करा कर फ़रमायाः
قَدۡ صَدَّقۡتَ ٱلرُّءۡيَآۚ إِنَّا كَذَٲلِكَ نَجۡزِى ٱلۡمُحۡسِنِينَ إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلۡبَلَـٰٓؤُاْ ٱلۡمُبِينُ وَفَدَيۡنَـٰهُ بِذِبۡحٍ عَظِيمٍ وَتَرَكۡنَا عَلَيۡهِ فِى ٱلۡأَخِرِينَ سَلَـٰمٌ عَلَىٰٓ إِبۡرَٲهِيمَ كَذَٲلِكَ نَجۡزِى ٱلۡمُحۡسِنِينَ
(ِسورة ٣٧ الصافات)
"हे इब्राहीम! तूने वास्तव में ख़्वाब सच कर दिखाया, हम नेक लोगों को ऐसा ही बदला देते हैं, हक़ीक़त में यह खुली हुई आज़माइश थी और हमने एक बड़ा ज़बीहा उस के बदले में दिया और हम ने उन की यादगार पिछलों में बाक़ी रखा, सलाम हो इब्राहिम पर, हम नेक लोगों को इसी तरह बदला देते हैं।"
[सूरह 37 अस साफ्फ़ात, आयत 105-110]
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क़ुरबानी की यादगारः
यही वह इब्राहीमी यादगार है जिसको सम्पूर्ण संसार के मुसलमान हर वर्ष ईदुल अज़हा (ईदे-क़ुर्बाँ) के अवसर पर जानवर की क़ुर्बानी की शक्ल में ताज़ा करते हैं।
इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-4" में करेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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