ईदुल अज़हा (किस्त 04 a)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल
ज़िल हिज्जा का पहले अशरे की फ़ज़ीलत:
ज़िल हिज्जा का पहला अशरा बरकत के लिहाज़ से सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि अल्लाह के नज़दीक इस की बड़ी अहमियत है। यह दस मुबारक दिन है। ये अच्छे कर्मों के दिन हैं, बुरे कामों से बचने के दिन हैं, बुलंद दर्जात हासिल करने के दिन हैं, तरह तरह के नेकियाँ कमाने के दिन हैं। अल्लाह ने इनकी क़सम खाई है और वह अहम चीज़ों की ही क़सम खाता है।
وَٱلۡفَجۡرِ (١) وَلَيَالٍ عَشۡرٍ (٢) وَّ الشَّفۡعِ وَ الۡوَتۡرِ ۙ (۳)
"क़सम है फ़ज्र की और क़सम है दस रातों की और क़सम है जुफ़्त (even) और ताक़ (odd) की।"
यहाँ फ़ज्र से मुराद सुबह है अली, इब्ने अब्बास, इकरमा, मुजाहिद और सुद्दी रिज़्वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन का यही राय है लेकिन मसरूक़ और मुहम्मद बिन काब ने इस से ख़ासतौर पर कुर्बानी के दिन की सुबह मुराद लिया है जो ज़िलहिज्जा के पहले अशरे की आख़िरी रात होती है। यह भी कहा गया है कि इस से मुराद ज़िलहिज्जा के शुरू के सभी दस दिन हैं जैसा कि हदीस में है। [तफ़सीर इब्ने कसीर, तफ़सीर सूरह 89 अल फ़ज्र, आयत 1 से 3]
حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ الْحُبَابِ حَدَّثَنَا عَيَّاشُ بْنُ عُقْبَةَ حَدَّثَنِي خَيْرُ بْنُ نُعَيْمٍ عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ عَنْ جَابِرٍ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ الْعَشْرَ عَشْرُ الْأَضْحَى وَالْوَتْرَ يَوْمُ عَرَفَةَ وَالشَّفْعَ يَوْمُ النَّحْرِ
(مسند احمد رقم الحدیث 8828/ باقي مسند المكثرين » - مسند جابر بن عبد الله رضي الله تعالى عنه)
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा रिवायत करते हैं कि, "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया बेशक यहाँ 10 से मुराद ज़िलहिज्जा के 10 दिन ही हैं और वतर से मुराद अरफ़ा का दिन व शफ़अ से मुराद क़ुर्बानी का दिन है।"
[मुस्नद अहमद.8828 /बाकी मुसनदुल मुकसेरीन, मुस्नद जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अंहुमा]
लेकिन यह हदीस ज़ईफ़ है क्योंकि रावी अबु ज़ुबैर की जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि से समाअत साबित नहीं है।
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حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَرْعَرَةَ، قَالَ: حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سُلَيْمَانَ، عَنْ مُسْلِمٍ الْبَطِينِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، أَنَّهُ قَالَ: ""مَا الْعَمَلُ فِي أَيَّامٍ الْعَشْرِ أَفْضَلَ مِنْهَا فِي هَذِهِ، قَالُوا: وَلَا الْجِهَادُ، قَالَ: وَلَا الْجِهَادُ، إِلَّا رَجُلٌ خَرَجَ يُخَاطِرُ بِنَفْسِهِ وَمَالِهِ فَلَمْ يَرْجِعْ بِشَيْءٍ"".
(صحیح بخاری 969/ كتاب الجمعة » فضل العمل في أيام التشريق)
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, " इन दिनों के अमल से ज़्यादा किसी दिन के अमल में फ़ज़ीलत नहीं" लोगों ने पूछा क्या जिहाद में भी नहीं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "हाँ, जिहाद में भी नहीं, मगर वह अपने जान व माल को ख़तरे में डाल कर निकला और वापस आया तो सब कुछ भी खो दिया और वापस आया तो साथ में कुछ न लाया। यानि सब कुछ अल्लाह के रास्ते में क़ुर्बान कर दिया)।"
[सही बुख़ारी : हदीस नम्बर 969/ किताबुल जुमा अय्यामे तशरीक़ की फ़ज़ीलत के बयान में]
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حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا الْأَعْمَشُ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، وَمُجَاهِدٍ، وَمُسْلِمٍ الْبَطِينِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: مَا مِنْ أَيَّامٍ الْعَمَلُ الصَّالِحُ فِيهَا أَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنْ هَذِهِ الْأَيَّامِ يَعْنِي أَيَّامَ الْعَشْرِ. قَالُوا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، وَلَا الْجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ؟ قَالَ: وَلَا الْجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ، إِلَّا رَجُلٌ خَرَجَ بِنَفْسِهِ وَمَالِهِ فَلَمْ يَرْجِعْ مِنْ ذَلِكَ بِشَيْءٍ .
(سنن ابی داؤد حدیث 2438 و 2439)
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, " इन दिनों यानि अशरा ज़िल हिज्जा का नेक अमल अल्लाह के नज़दीक तमाम दिनों के आमाल से ज़्यादा पसंद है।" लोगों ने पूछा ऐ अल्लाह क्र रसूल, क्या जिहाद से भी ज़्यादा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "हाँ, जिहाद में भी नहीं, मगर वह अपने जान व माल को ख़तरे में डाल कर निकला और वापस कुछ न लाया।"
[सुनन अबु दाऊद हदीस नंबर 2438 व 2439 / किताबुस सौम अशरा ए ज़िलहिज्जा के रोज़े के बयान में]
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ज़िल हिज्जा के 9 रोज़े:
ज़िल हिज्जा के पहले अशरे (यानि 1 से 9 तारीख़) के 9 रोज़े।
أَخْبَرَنِي زَكَرِيَّا بْنُ يَحْيَى، قَالَ: حَدَّثَنَا شَيْبَانُ، قَالَ: حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنِ الْحُرِّ بْنِ صَيَّاحٍ، عَنْ هُنَيْدَةَ بْنِ خَالِدٍ، عَنِ امْرَأَتِهِ، قَالَتْ: حَدَّثَتْنِي بَعْضُ نِسَاءِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَصُومُ يَوْمَ عَاشُورَاءَ، وَتِسْعًا مِنْ ذِي الْحِجَّةِ، وَثَلَاثَةَ أَيَّامٍ مِنَ الشَّهْرِ أَوَّلَ اثْنَيْنِ مِنَ الشَّهْرِ وَخَمِيسَيْنِ .
हुनैज़ा बिन ख़ालिद अपनी बीवी से और वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की किसी बीवी से रिवायत करती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आशूरा के दिन, ज़िलहिज्जा नौ दिनों में, हर महीने तीन दिनों में यानी: माह पहले सोमवार को और पहले और दूसरे जुमेरात को रोज़ रखते थे।
[सुनन निसाई हदीस नंबर 2374/ किताबुस सयाम, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रोज़े का बयान.. 2419 और सुनन अबु दाऊद हदीस 2437 में भी देखा जा सकता है।]
इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-4b" में करेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
2 टिप्पणियाँ
Subha allah allah is tabliq ko kabul farmaiye ameen
जवाब देंहटाएंBeshak
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।