Eid ul Azha (Eid ul adha) part-9

Eid ul Azha (part-9) Introduction, history,  matters & compulsory  works


ईदुल अज़हा (किस्त 9), परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल 


ग़ैर मुस्लिमों को क़ुर्बानी का गोश्त देना कैसा है?

ग़ैर-मुस्लिम को क़ुर्बानी का गोश्त देना जायज़ है, और यदि ग़ैर-मुस्लिम रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त या ग़रीब हो तो विशेष रूप से उन्हें देना ज़रूरी है।


इस की दलील क़ुरआन की यह आयत है:


هَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ

अल्लाह तुम्हें इस से नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उन के साथ न्याय करो, जिन्होंने तुम से धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसन्द करता है।

[सूरह 60 अल मुमतहिना आयत 08]


क़ुर्बानी के गोश्त के बारे में क़ुरआन की यह आयत भी अहम है:

فَکُلُوۡا مِنۡہَا وَ اَطۡعِمُوا الۡبَآئِسَ الۡفَقِیۡرَ 

 फिर उस में से स्वयं भी खाओ और तंगहाल मुहताज को भी खिलाओ।"

[सूरह 22 अल हज्ज, आयत 28]


 وَٱلۡبُدۡنَ جَعَلۡنَٰهَا لَكُم مِّن شَعَٰٓئِرِ ٱللَّهِ لَكُمۡ فِيهَا خَيۡرٞۖ فَٱذۡكُرُواْ ٱسۡمَ ٱللَّهِ عَلَيۡهَا صَوَآفَّۖ فَإِذَا وَجَبَتۡ جُنُوبُهَا فَكُلُواْ مِنۡهَا وَأَطۡعِمُواْ ٱلۡقَانِعَ وَٱلۡمُعۡتَرَّۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرۡنَٰهَا لَكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ 

और क़ुर्बानी के ऊँटों को हमने तुम्हारे लिये अल्लाह के ‘शआइर’ (प्रतीक) में शामिल किया है, तुम्हारे लिये उनमें भलाई है तो उन्हें खड़ा करके उनपर अल्लाह का नाम लो, और जब उनकी पीठें ज़मीन पर टिक जाएँ तो उनमें से खाओ और न माँगने वाले निर्धन और माँगने वाले (दोनों) को खिलाओ। इन जानवरों को हमने इस तरह तुम्हारे मातहत (अधीन) किया है, ताकि तुम शुक्रिया अदा करो।

[सूरह 22 अल हज्ज आयत 36]


और हदीस में बड़ी वज़ाहत के साथ इसका ज़िक्र है:

عَنْ مُجَاهِدٍ، أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَمْرٍو ذُبِحَتْ لَهُ شَاةٌ فِي أَهْلِهِ، ‏‏‏‏‏‏فَلَمَّا جَاءَ قَالَ:‏‏‏‏ أَهْدَيْتُمْ لِجَارِنَا الْيَهُودِيِّ ؟ أَهْدَيْتُمْ لِجَارِنَا الْيَهُودِيِّ ؟ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ:‏‏‏‏ مَا زَالَ جِبْرِيلُ يُوصِينِي بِالْجَارِ حَتَّى ظَنَنْتُ أَنَّهُ سَيُوَرِّثُهُ 

मुजाहिद से रिवायत है कि अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हुमा के घर में एक बकरी ज़बह की गयी, जब वह आए, तो कहा: क्या तुमने हमारे यहूदी पड़ोसी को भी भेजा है? क्या तुमने हमारे यहूदी पड़ोसी को भी भेजा है? फिर कहा: मैंने अल्लाह के रसुल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना है कि : "जिब्रील मुझे लगातार (continue) पड़ोसी के बारे में कहते रहे, यहाँ तक कि मुझे महसूस होने लगा कि वह इसे वारिस बना देंगे"

[सुनन तिर्मिज़ी हदीस नंबर 1943, सुनन अबु दाऊद हदीस नंबर 5152/किताबुल बिर वस सिला, पड़ोसी के हुक़ूक़ का बयान]

और क़ुरबानी का गोश्त ग़ैर मुस्लिमों को देना भी इसी एहसान में शामिल है जिस की अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इजाज़त दी है।


इब्ने कुदामा रहमतुल्लाह अलैहि के ख़्याल में:

"यह भी जायज़ है कि क़ुर्बानी के गोश्त से काफ़िर को भी खिलाया जाय क्योंकि यह नफ़्ली सदक़ा है इसलिए यह ज़िम्मी और क़ैदी को भी खिलाना जायज़ है जैसे कि दीगर सदक़ात उन्हें दिए जा सकते हैं।"

[अल मुग़ना ले इब्ने कुदामा 9/450]


शैख़ इब्न बाज़ के ख्याल में:

"ऐसा काफ़िर जिन से हमारी लड़ाई नहीं है, मिसाल के तौर पर जिसने हमारे पास पनाह ले रखी हो या उसके साथ हमारा मुआहिदा हो तो उसे क़ुर्बानी का गोश्त और सदक़ा दिया जा सकता है"

[मजमूअ फ़तावा इब्ने बाज़ 18/48]


आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही  

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