Nikah (part 17): Shauhar (husband) ke huqooq

Nikah (part 17): Shauhar (husband) ke huqooq


नेक और बेहतररीन बीवी

निकाह एक नेमत है और शौहर और बीवी एक गाड़ी के दो पहिए हैं एक के बगैर दूसरा अधूरा है। एक अच्छी जिन्दगी गुजारने के लिए, दीन और दुनियां दोनों बेहतर हो इसके लिए सिर्फ़ ये ज़रूरी नहीं की निकाह कर लिया जाय बल्कि एक अच्छी जिन्दगी और अखिरत की बेहतरी के लिए नेक शौहर और बीवी का मिलना बेहद खूबसूरत ऐहसास है। अगर दोनों में से किसी एक में भी थोड़ी भी खराबी आई फिर दुनियां में अजीयतों का सबब और आखिरत भी बर्बादी तय है। इस आर्टिकल में हम नेक बीवी की सिफात को कुरान वा हदीस की रोशनी में समझेंगे।

हदीस में आता है कि,

"औरत अपने शौहर के घर वालों और उसके बच्चों की निगहबान है और उससे उनके बारे में (रोज़े महशर) सवाल होगा!" [सहीह बुख़ारी : 7138]

निकाह के बाद एक लड़की की नई जिन्दगी की शुरुआत होती है नई नवेली दुल्हन, नए लोग, नई दहलीज का नया माहौल अजीब सी कैफियत तारी होती है दिल और दिमाग़ में तूफ़ान उमड़ रहा होता है। एक तरफ़ अपने हमसफर में अपने ख्वाबों की ताबीर को मुकम्मल करने की आरज़ू तो दूसरी तरफ़ डर, खौफ और झिझक। 

बाबुल का घर छोड़ते ही अपने शौहर के घर को अपना बनाने की धुन सवार होना, हर दर्द तकलीफ़ को पलकों की नमी में छिपा लेना। अपनी पैदाइश के बाद होश संभालने से लेकर ससुराल जानें तक यही सुनने को मिलता है। ढंग से रहो पराए घर जाना है, छोटी सी गलती पर भी लंबी चौड़ी नसीहत का सामना करना पड़ता है, सीखो कुछ पराया धन हो, "कब ढंग आयेगा इसे पराए घर जाना है।"

दूसरी तरफ जिस घर में अपने तमाम रिश्ते नाते सखियां-सहेलियां छोड़ कर आई, रोज़ एक ना एक चीज़ के लिए ताने सुनने पड़ते हैं, "पराए घर से आई है, इसे कैसे पता होगा?" 

डर और झिझक इतनी समेटे कि छोटी से छोटी चीजों को हाथ लगाने से डर जाती है कहीं कोई घुड़क न बैठे, "अपने बाप के घर से लाई है", कहीं कुछ बिगड़ जाए तो कहते हैं, "तेरी मां ने कुछ सिखाया नहीं क्या?"

जहां 20 साल तक बड़े नाज़ और दुलार से पली और जहां सब कुछ छोड़ कर आई उसे बार बार पराएपन का एहसास दिलाना, किसी चीज़ को तोड़ कर बिखेर देने जैसा है। फिर उसका असली घर कौन सा है वो जहां उसने अपना बचपन से जवानी गुजारी या फिर वो जिसके लिए सारा कुछ बलिदान किया?

नए घर में क़दम रखते ही फिर नई नसीहतें। 

एक 20-22 साल की लड़की से 40 साल के एक्सपीरियंस की उम्मीद करना हर घर की कहानी है। एक तरफ शौहर के घर वालों की फरमायिशों को पूरा करना दूसरी तरफ़ शौहर की खिदमत करना ये ऐसा ही है जैसे लोहे के चने चबाना। दौड़ भाग भरी जिन्दगी सारी एनर्जी तो खुशामद में बर्बाद हो जाती है, बर्रे सगीर इंडिया, पाकिस्तान और बंग्लादेश में एक बहु से ऐसे काम लिया जाता है जैसे वो बहु नहीं नौकरानी है।

ऐसे में एक सवाल तो हर औरत के मन में उठता है क्या इस्लाम में शौहर के वालदेन और घर के बाकी मेंबर की खिदमत की जिम्मेदारी बहु के जि़म्मे है?

कुरान में कहीं भी एक औरत के लिए शौहर के मां-बाप की खिदमत की बात नहीं आई है, हां मां बाप के खिदमत के हवाले से बार बार ताकीद की गई है।

आइए इसे हदीस की रोशनी में समझते हैं जैसा कि सहीह बुख़ारी की हदीस है:

एक सहाबी रसूलुल्लाह (ﷺ) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा कि या रसूलुल्लाह! मेरे अच्छे सुलूक का सबसे ज़्यादा हक़दार कौन है? 

फ़रमाया कि तुम्हारी माँ है।

पूछा उसके बाद कौन है? 

फ़रमाया कि तुम्हारी माँ है।

उन्होंने फिर पूछा उसके बाद कौन?

नबी करीम (ﷺ) ने फ़रमाया कि तुम्हारी माँ है।

उन्होंने पूछा उसके बाद कौन है?

नबी करीम (ﷺ) ने फ़रमाया कि फिर तुम्हारा बाप है।

[सहीह बुख़ारी 5971]

इस हदीस से पता चला कि वालदेन की खिदमत और जिम्मेदारी औलाद के जिम्मे है न की बहु के जिम्मे और सास-ससुर का बीवी पर हक़ के हवाले से उलेमा हज़रात दो राय रखते हैं जिसमें से एक मुकम्मल और बेहतर है जिसको ज़्यादातर उलेमा क़ुबूल करते हैं,

1. पहला ये कि बीवी सास ससुर की उतनी ख़िदमत करे जितना कि मुआशारे में ज़रूरी हो। शौहर के वालदेन की खिदमत उतनी करे कि जितना अदब के लिहाज़ से लाज़िम हो। अगर कोई औरत अपने शौहर के वालदेन की खिदमत करती है तो ये उसकी अच्छी परवरिश और दीनदारी की अलामत है और अगर न करे तो शौहर रौब न जताए, बुरा भला न बोले, उस पर ज़बरजस्ती अपने वालदेन की जिम्मेदारी न थोपे जैसा की मुआशारे में देखने को मिलता है मर्द हज़रात अपने पूरे घर की जिम्मेदारी बीवी पर थोप देते हैं यहां तक कि ननद और उनके बच्चो की भी। अब बेचारी बीवी शौहर को खुश करने की ग़रज़ से दिन भर पिसती रहती है। 

2. दूसरी बात कि इस्लाम में बीवी का सास ससुर की ख़िदमत करना बीवी का हक़ नहीं है। जो की ज़्यादा दुरुस्त है।हां, अगर किसी के सास ससुर आदत और अख़लाक़ में अच्छे हों फिर औरत सवाब की नियत से उनकी खिदमत करे ये बेहतर है और सवाब का काम भी है। सास कभी मां होने की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती इसलिए सास को सास ही रहने दें। उसे अपनी मां बनाने की कोशिश न करें, उसकी खिदमत इस लिय करें कि वो आप के शौहर की जन्नत है।


इसी तरह सास को चाहिए कि वो बहू को बेटी बनाने की कोशिश न करे क्यों कि बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। हां, उसका ख्याल इस तरह रखें कि उसे कभी परायापन का एहसास ना हो, उसे इसलिए खुश रखें कि वो आप के बेटे के दिल का सुकुन और आप के खानदान के वजूद को आगे बढ़ाने का ज़रिया है। 

अल्लाह बेहतर अजर देने वाला है इस्लाम जानवरों, चरिंदे, परिंदों से रहम दिली और मुहब्बत को पसंद करता है फिर सास ससुर आप के शौहर के मां बाप हैं, कलमे के शरीक हैं, और अक्सर देखा जाता है कि बीवी की खुश अखलाकी और अपने वालदेन की खिदमत करते देख शौहर खुश होता है इसलिए समझदारी और नर्मी का मुज़ाहिरा करें। अल्लाह रोज़ ए महशर इसका बेहतरीन अजर अता करेगा। अल्लाह तआला को ना जाने कब कौनसा आपका अमल या नेकी पसन्द आ जाए और अल्लाह आपकी मग़फ़िरत कर दे! 

सहाबियात की मिसाल हमारे सामने है बिना किसी ग़रज़ के अपने सास ससुर के कपड़े धोती, उनको खिलाती पिलाती, ना उन्होंने कभी इसके जानिब सवाल किये ना ही बुरा जाना बस वो अपने सास ससुर की ख़िदमत ऐसे ही करती जैसे कोई अपने सगे माँ बाप की किया करतीं। मगर अफ़सोस 

आज के हालात जो भी हैं ये सिर्फ़ दीन से दूरी का सबब है। औरतों का अपने शौहर को अलग लेकर रहना, बूढ़े सास ससुर को अकेला छोड़ देना कोई फ़ख़्र और बहादुरी की बात नहीं, बल्कि दीन से आशनाई ना होना है। 

अल्लाह ऐसी औरतो को हिदायत अता करे और सास ससुर को भी थोड़ा रहमदिली अता करे ताकि एक नन्हीं सी जान जो अपना सब कुछ कुर्बान कर शौहर के घर आई है वो सुकून महसूस कर सके।


नेक बीवी की सिफत

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया :

"कुवारियों से निकाह करो जो शीरी ज़ुबान, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली और थोड़ी चीज़ों में खुश राज़ी रहने वाली होती है।" [इब्न माजा 1861] 


1. शीरी ज़ुबान:

नेक बीवी की सिफत बयान करते हुए हदीस में बताया गया है कि मीठी ज़ुबान में बात करने वाली, मुहब्बत से मीठे अल्फाज से शौहर को खुश करने और दिल बहलाने वाली होती है। 

जब शौहर दिन भर मेहनत मजदूरी कर के थक हार कर घर आए तो बीवी उसे मुस्कुरा कर मीठे अल्फाज़ से उसका इस्तेकबाल करे। चाय, पानी पेश करे न की शिकायतों का पिटारा खोल के बैठ जाय। जैसा की आज के मुआशरे में देखा जाता है औरतें छोटी छोटी बातों को लेकर शौहर के आते ही शूरू हो जाती हैं। दो चार बातों को सौ तरह से परोस रही होती हैं फिर नतीज़ा ये होता है कि घर का माहौल खराब हो जाता है, रोज़ रोज़ कलह शूरू और फिर बात तलाक़ तक पहुंच जाती है। अल्लाह ने मर्द को क़व्वाम बनाया है कमाने की जिम्मेदारी मर्द की है। मर्द घर नहीं बनाता मर्द छत मुहैया कराता है मगर घर औरत बनाती है आज जरूरत है औरत को सब्र से काम लेने की अल्लाह का तकवा इख्तियार करने की। 


2. ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली:

नेक और बेहतरीन बीवी वो है जो ज्यादा बच्चे पैदा करे उनकी बेहतर तरीके से परवरिश करे।


3. थोड़ी चीज़ों पर राज़ी रहने वाली:

नेक बीवी सब्र करने वाली और थोड़ी चीज़ों में खुश रहने वाली होती है शौहर जो लाकर दे दे खुश हो जाती है।

रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा गया कौन सी औरत बेहतर है? 

आप ﷺ ने फ़रमाया: "वो जो अपने शौहर को ख़ुश कर दे जब वो उसे देखे और जब उसे हुक्म दे तो वो उसकी इताअत करे और अपने माल और जान में शौहर की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा काम न करे जो उसे नापसन्द हो।" [मिश्कात 3272] 


4. नेक और बेहतरीन शौहर की सिफत:

इस्लामी शरीअत में एक औरत का हक़ सिर्फ़ नान नफ़्क़ा (रोटी, कपड़ा, मकान) तक ही सीमित है बल्कि यह उसका हक़ है कि उसका शौहर उसके साथ प्यार व मोहब्बत का इज़हार करे, उससे मीठी गुफ़्तगू करे, जिस्म और माल के साथ-साथ उसकी नफ़्सयाती ज़रूरतों का भी ख़्याल करे, उसके जज़्बातों की कद्र करे।

शरीअत-ए-इस्लामीया ने मर्द पर वाजिब क़रार दिया है कि वो औरत की माली व जिन्सी ज़रूरत के साथ-साथ उसकी नफ़्सयाती, रूहानी ज़रूरतों का भी ख़्याल करे, उससे अच्छे से बात करे, लगावट (आशिक़ाना) मुज़ाहिरा करे, मोहब्बत का इज़हार करे।

जैसा कि अल्लाह पाक ने फ़रमाया:

وَ مـِنۡ اٰیـٰتِہٖۤ اَنۡ خَلَـقَ لَـکـُمۡ مـِّنۡ اَنۡفـُسِکُمۡ اَزۡوَاجًـا لِّتَسـۡکُنُوۡۤا اِلَیۡـہَا وَ جَعـَلَ بَـیۡنَکُمۡ مـَّوَدَّۃً وَّ رَحۡـمَۃً ؕ اِنَّ فـِیۡ ذٰلِـکَ لَاٰیٰـتٍ لِّـقَوۡمٍ یَّـتَفَکـَّرُوۡنَ 

"और यह भी उस की निशानियों में से है कि उस ने तुम्हारी ही सहजाति से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किए, ताकि तुम उस के पास शान्ति प्राप्त करो। और उस ने तुम्हारे बीच प्रेंम और दयालुता पैदा की। और निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सोच-विचार करते हैं।" [सूरह रूम 21]

नोट: उपर्युक्त आयत से वाजेह होता है कि शादीशुदा ज़िंन्दगी का एक मक़सद जहाँ इज़्ज़त व शहवत की हिफ़ाज़त और नस्ल-ए-इनसानी को बचाती है, वहीं इसका मक़सद मियाँ बीवी के बीच मोहब्बत व उल्फ़त और नफ़्सयाती ज़रूरतों को पूरा करना भी है।

इसीलिए अल्लाह तआला ने क़ुरआन में मर्दों को ख़ास ज़ोर दिया है कि अपनी बीवीयों के साथ भले तरीक़े से ज़िन्दगी गुज़ारो। [सूरह निसा 19]


आज उम्मत के मर्द और औरत दोनों को सब्र करने, अल्लाह का खौफ रखते हुए एक दुसरे के हुक़ूक़ अदा करने और अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए उस पर अमल करने की बेहद जरुरत है। अल्लाह से दुआ गो हूं कि हम मुसलमानो को हक़ पर चलने की तौफीक अता फरमाए।

आमीन

निकाह की फजीलत की अगली कड़ी में "मर्द को चार निकाह की इजाज़त क्यों?" पर बात होगी "इंशा अल्लाह"

तब तक दुआओं में याद रखें।


आपकी दीनी बहन
फ़िरोज़ा

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