ईदुल अज़हा (किस्त 08)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल
[मय्यत की जानिब से क़ुर्बानी]
मय्यत की तरफ़ से क़ुर्बानी किये जाने की 3 शक्लें हैं:
(1) अपनी क़ुर्बानी में ज़िंदा शख़्स के साथ ही मय्यत को भी शरीक कर लिया जाय। यानी कोई व्यक्ति अपने और अपने परिवार की जानिब से क़ुर्बानी करे और उसमें ज़िंदा और मय्यत की तरफ़ से क़ुर्बानी की नीयत भी कर ले इसकी दलील नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वह अमल है।
وَكَانَ يُضَحِّي بِالشَّاةِ الْوَاحِدَةِ عَنْ جَمِيعِ أَهْلِهِ
(صحيح بخاري كتاب الأحكام » بيعة الصغير)
तमाम घर वालों की तरफ़ से एक बकरी की क़ुर्बानी करते थे।
[सही बुख़ारी 7210/ किताबुल अहकाम, बच्चों की बैअत]
عُمَارَةُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَال: سَمِعْتُ عَطَاءَ بْنَ يَسَارٍ، يَقُولُ: سَأَلْتُ أَبَا أَيُّوبَ الْأَنْصَارِيَّ: كَيْفَ كَانَتِ الضَّحَايَا عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ؟ فَقَالَ: كَانَ الرَّجُلُ يُضَحِّي بِالشَّاةِ عَنْهُ، وَعَنْ أَهْلِ بَيْتِهِ، فَيَأْكُلُونَ، وَيُطْعِمُونَ. حَتَّى تَبَاهَى النَّاسُ فَصَارَتْ كَمَا تَرَى
(سنن ترمذي كتاب الأضاحي عن رسول الله » ما جاء أن الشاة الواحدة تجزي عن أهل البيت)
अता बिन यसार कहते हैं कि मैंने अबु अय्यूब अंसारी से सुना कि "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने में एक शख़्स अपने और अपने परिवार की तरफ़ से एक बकरी की क़ुर्बानी करता था। चुनाचे उस का गोश्त ख़ुद भी खाते और लोगों को भी खिलाते थे यहां तक कि लोग फ़ख्र करने लगे और ऐसा हो गया है जैसा कि तुम देख रहे हो।
[सुनन तिर्मिज़ी 1505/ किताबुल अज़ाहि एक बकरी पूरे घर वालों की तरफ़ से काफ़ी होगी का बयान]
(2) मय्यत की जानिब से उन की वसीयत पर अमल करते हुए क़ुर्बानी करे यह क़ुर्बानी वाजिब है अगर मय्यत ने वक़्फ़ वगैरह की कोई ऐसी जायदाद छोड़ी हो जिससे इतनी आमदनी आती हो। नहीं तो फिर यह मय्यत के छोड़े हुए मॉल के 1/3 से ही होगी क्योंकि तरके में से 1/3 से ज़्यादा की वसीयत नहीं की जा सकती।
(3) मय्यत की तरफ़ से अलग से क़ुर्बानी करना। जैसे वालिद की तरफ़ से अलग, और वालिदा की तरफ़ से अलग क़ुर्बानी की जाए। इस सिलसिले में इख़्तेलाफ़ है:
(i) जो लोग इसे जाएज़ ठहराते हैं उन्होंने इस क़ुर्बानी को सदक़ा पर क़यास किया है। और वह दलील भी पेश करते हैं :
عَنْ حَنَشٍ قَالَ رَأَيْتُ عَلِيًّا يُضَحِّي بِكَبْشَيْنِ فَقُلْتُ لَهُ مَا هَذَا فَقَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَوْصَانِي أَنْ أُضَحِّيَ عَنْهُ فَأَنَا أُضَحِّي عَنْهُ
(سنن ابی داؤد رقم الحدیث 2790/کتاب الضحايا » الأضحية عن الميت)
हनश कहते हैं कि मैंने अली रज़ी अल्लाहु अन्हु को दो मेंढे क़ुर्बानी करते देखा तो मैंने पूछा ऐसा क्यों?
तो उन्होंने जवाब दिया, "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे वसीयत फरमाई है कि मैं उन की तरफ़ से क़ुर्बानी किया करूं चुनाँचे मैं ऐसा ही करता हूँ।"
[सुनन अब दाऊद हदीस नंबर 2790/ किताबुज़ ज़हाया, मय्यत की तरफ़ से क़ुर्बानी का बयान]
लेकिन यह रिवायत सख़्त "ज़ईफ़" है क्योंकि इस के रावी अबुल हसना मजहूल रावी हैं और हनश के बारे में भी उलमाए मुहद्देसिन में इख़्तेलाफ़ है।
इस हदीस को अगर कुछ देर के लिए सही भी तस्लीम कर लिया जाए तो यह वसीयत की कटेगरी में आएगी।
(ii) अलग अलग क़ुर्बानी करने के सिलसिले में दूसरी दलील में यह हदीस पेश की जाती है:
وَعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ إِذَا أَرَادَ أَنْ يُضَحِّيَ اشْتَرَى كَبْشَيْنِ عَظِيمَيْنِ سَمِينَيْنِ أَقْرَنَيْنِ أَمْلَحَيْنِ مَوْجُوءَيْنِ فَذَبَحَ أَحَدَهُمَا عَنْ أُمَّتِهِ لِمَنْ شَهِدَ لِلَّهِ بِالتَّوْحِيدِ وَشَهِدَ لَهُ بِالْبَلَاغِ وَذَبَحَ الْآخَرَ عَنْ مُحَمَّدٍ وَعَنْ آلِ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ
(سنن ابن ماجة كتاب الأضاحي » أضاحي رسول الله صلى الله عليه وسلم)
अबु हुरैरह रज़ी अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब क़ुर्बानी का इरादा फ़रमाते तो बड़े मोटे, सींग वाले, चितकबरे ख़सी किये हुए मेंढे ख़रीदते इन में से एक उम्मत के उन लोगों की तरफ़ से ज़बह करते जो अल्लाह की तौहीद और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रिसालत की गवाही देते हैं और दूसरा मुहम्मद और आले मुहम्मद की तरफ़ से ज़बह करते।
[सुनन इब्ने माजा हदीस नंबर 3122/ किताबुल अज़ाहि, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ुर्बानी]
इस हदीस में जो उम्मत की तरफ़ से एक मेंढा क़ुर्बानी करने को अलग से क़ुर्बानी करने की दलील बनाई गई है तो यह वाज़ेह होना चाहिए कि यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एक मख़सूस अमल था और उन्हीं के लिए ख़ास था क्योंकि अगर यह आम (general) अमल होता तो सहाबा ए किराम ज़रूर इस अमल को करते लेकिन आसार में हमें ऐसा कोई अमल नज़र नहीं आता। न तो खिलाफ़ते राशिदा में और न उनके बहुत बाद।
अगर इस अमल को आम भी मान लिया जाय तो भी इसे अलग से क़ुर्बानी के लिए दलील नहीं बनाया जा सकता क्योंकि हदीस यह बताती है उम्मत की तरफ़ से एक ही मेंढे की क़ुर्बानी दी थी और इस पर सभी का इत्तेफ़ाक़ है कि मेंढे में भी बकरी की तरह एक हिस्से की ही गुंजाइश होती है। बल्कि इस से तो यही पता चलता है कि पूरे परिवार की तरफ़ से एक ही क़ुर्बानी काफ़ी होगी।
(iii) मय्यत की जानिब से अलग से क़ुर्बानी करने की तीसरी दलील यह दी जाती है कि यह क़ुर्बानी बतौर सदक़ा है लेकिन यह क़यास किस बुनियाद पर किया गया है वजह समझ में नहीं आती। क़ुर्बानी को सदक़ा कहना कहाँ तक दुरुस्त है फिर अगर उसे सदक़ा मान भी लिया जाय तो कई सवाल खड़े होते है:
(i) सदक़ा का गोश्त क्या घर वालों के लिये जाएज़ होगा?
(ii) अगर यह सदक़ा है तो फिर ईदुल अज़हा के मौके पर ही क्यों? साल के दूसरे 11 महीनों में क्यों नहीं?
इमाम तिर्मिज़ी ने अपनी सुनन में अब्दुल्लाह बिन मुबारक अलैहिर रहमा का क़ौल नक़ल किया है:
قَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ أَحَبُّ إِلَيَّ أَنْ يُتَصَدَّقَ عَنْهُ وَلَا يُضَحَّى عَنْهُ وَإِنْ ضَحَّى فَلَا يَأْكُلُ مِنْهَا شَيْئًا وَيَتَصَدَّقُ بِهَا كُلِّهَا
(سنن ترمذی، کتاب الأضاحي عن رسول الله » ما جاء في الأضحية عن الميت)
मुझे यह चीज़ ज़्यादा पसन्द है कि मय्यत की तरफ़ से सदक़ा ए जारिया कर दिया जाय। क़ुर्बानी न की जाय। और अगर किसी ने उस की तरफ़ क़ुर्बानी कर दी तो उस में से कुछ न खाए बल्कि सब कुछ सदक़ा कर दे।
[सुनन तिर्मिज़ी हदीस 1495 के तहत/ किताबुल अज़ाहि]
इस क़ौल का मतलब तो यही है कि मय्यत की जानिब से अलग से क़ुर्बानी नहीं करनी चाहिए और अगर किसी ने मय्यत की तरफ़ से क़ुर्बानी की तो वह मसनून क़ुर्बानी नहीं होगी जिसको अमीर गरीब सब खा सकें बल्कि एक सदक़ा है और सदक़ा सिर्फ़ फ़क़ीर और मिस्कीन के लिए है, मालदारों के लिए जाएज़ नहीं है इस लिए उस में से कुछ न खाए बल्कि तमाम को सदक़ा कर दे।
सुन्नत में कोई ऐसा सुबूत नहीं मिलता कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कभी किस मय्यत की तरफ़ से कोई क़ुर्बानी की हो। चचा हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब (जो आप को बहुत अज़ीज़ थे) की तरफ़ से भी कोई क़ुर्बानी नहीं की, 3 अज़ीज़ बेटियां ज़ैनब, रुक़य्या, उम्मे कुलसूम रज़ी अल्लाहु अन्हुन्ना का इंतेक़ाल आप की ज़िंदगी में ही हुआ, आप ने उनकी जानिब से भी कभी कोई क़ुर्बानी नहीं की। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की 2 बीवियां (ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद और उम्मुल मसाकीन ज़ैनब बिन्ते ख़ुज़ैमा रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) आप की ज़िंदगी में ही इंतेक़ाल कर गयी थीं। ख़दीजा रज़ी अल्लाहु अन्हा का ज़िक्र तो आप दूसरी उम्माहतुल मोमेनीन के सामने भी करते थे ख़ुद आईशा रज़ी अल्लाहु अन्हा कहती है कि *मुझे रश्क होने लगता था* लेकिन उनकी जानिब से भी अलग से कभी किसी क़ुर्बानी का सुबूत नही मिलता।
किसी सहाबी से भी ऐसा अमल नहीं मिलता कि किसी ने भी मय्यत की तरफ़ से अलग से क़ुर्बानी की हो।
नोट:
(i) कहीं कहीं रिवाज यह है कि जो घर का मुखिया होता है वह अपने नाम से क़ुर्बानी नहीं करता बल्कि मय्यत की जानिब से क़ुर्बानी करता है तो वाज़ेह रहे कि यह किसी की तरफ़ से क़ुर्बानी नहीं होती।
(ii) अक्सर ऐसा होता है कि ज़िंदा की तरफ़ से एक जबकि मय्यत की तरफ़ से कई क़ुरबानी होती है। मिसाल के तौर पर एक व्यक्ति के 4 पुत्र हैं और चारों पुत्र अपने मरहूम वालिद की तरफ़ से क़ुर्बानी करते है तो बेटों के नाम से तो एक ही क़ुर्बानी होती है जबकि मय्यत की जानिब से चार क़ुर्बानी हो जाएगी।
नबी करीम ﷺ अपने सारे घर वालों की तरफ़ से एक बकरी की कुर्बानी करते थे।
और सहीह मुस्लिम में अम्मा आयशा (रज़ी०) की हदीस में है कि वो फरमाती हैं:
एक ही दुम्बा बड़े बड़े सिघों वाला मंगवाया, और ये दुआ पढ़ कर उसे ज़िबाह किया "....." ए अल्लाह इसे मुहम्मद और आल ए मुहम्मद, और उम्मत ए मुहम्मद की तरफ़ से क़ुबूल फरमा।
سَأَلْتُ أَبَا أَيُّوبَ الأَنْصَارِيَّ: كَيْفَ كَانَتِ الضَّحَايَا عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ- فَقَالَ: كَانَ
الرَّجُلُ يُضَحِّي بِالشَّاةِ عَنْهُ وَعَنْ أَهْلِ بَيْتِهِ، فَيَأْكُلُونَ وَيُطْعِمُونَ حَتَّى تَبَاهَى النَّاسُ، فَصَارَتْ كَمَا تَرَى.
وقال الترمذي :هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَعُمَارَةُ بْنُ عَبْدِ اللهِ مَدِينِيٌّ، وَقَدْ رَوَى عَنْهُ مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ وَالعَمَلُ عَلَى هَذَا عِنْدَ بَعْضِ أَهْلِ العِلْمِ، وَهُوَ قَوْلُ أَحْمَدَ، وَإِسْحَاقَ، وَاحْتَجَّا بِحَدِيثِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ ضَحَّى بِكَبْشٍ
तर्जुमा: अता बिन यासिर कहते हैं, मैं ने जनाब अबु अय्यूब अंसारी (रज़ी०) से पूछा, नबी करीम ﷺ के मुबारक दौर में कुरबानियां किस तरह करते थे? उन्होंने बताया कि हर आदमी एक बकरी अपनी और अपने सारे घर वालों की तरफ़ कुर्बानी करता था, और सब उसी को ख़ुद भी खाते और दूसरों को भी खिलाते लेकिन बाद में लोगों ने फख्र वा नामूद का मुज़ाहिरा शुरु कर दिया, और अब जो सुरत है वो तुम देख रहे हो। (तिरमिज़ी 1505 हसन सही)
इन वाज़ेह अहदीस के मुताबिक़ एक घर वालों की तरफ़ से एक ही बकरी कुर्बानी में काफ़ी है।
घर में जितने भी मुस्लिम, मुक़ीम साहबे इस्तेताअत आक़िल, बालिग़, आज़ाद मर्द व औरत होंगे सभी के नाम से अलग अलग क़ुर्बानी करना चाहे तो कर सकते हैं। यहां तक कि अगर शौहर और बीवी दोनों साहबे इस्तेताअत हों तो वो दोनो भी अगर चाहे तो अपनी अलग अलग क़ुर्बानी कर सकते हैं।
واللہ اعلم بالتوفیق
इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-9" में करेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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