ईदुल अज़हा (किस्त 01)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल
कुछ क़ुर्बानी के बारे में
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ مَنْ كَانَ لَهُ سَعَةٌ وَلَمْ يُضَحِّ فَلَا يَقْرَبَنَّ مُصَلَّانَا
سنن ابن ماجة، كتاب الأضاحي » - الأضاحي واجبة هي أم لا
"जो व्यक्ति ताक़त रखने के बावजूद क़ुर्बानी ना करे वह हमारी ईदगाह के क़रीब भी न आये"
[सुनन इब्ने माजा, हदीस नंबर 3123 /किताबुल अज़ाही, क़ुरबानी वाजिब है या नहीं का बयान]
बा जाहिर हदीस से साबित हो रहा है कुर्बानी वाजिब है लेकिन कुर्बानी वाजिब नहीं सुन्नते मुअक्कादह है।
आइये दलील देखें,
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
"जब दस (ज़ुल-हिज्जा) शुरू हो जाए और तुम में से कोई शख़्स क़ुरबानी करने का *इरादा* रखता हो वो अपने बालों और नाख़ुनों को न काटे।"
[सहीह मुस्लिम 1977]
अगर क़ुरबानी वाज़िब होती तो यहाँ नबी अलैहिस्सलाम का यें कहना के क़ुरबानी का इरादा रखता हो वाज़ेह हुआ की क़ुरबानी वाज़िब नहीं वरना इरादा हो तो करें का क्या मतलब हैं।
"हज़रत अबू बक्र और हज़रत उम्र रज़िअल्लाहु अन्हुमा इस्तातात होने के भी क़ुरबानी ना करते।"
[सुनन कुबरा बहिएक़ी 09/265 7/198 सनद हसन]
नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया,
"आज (ईदुल-अज़हा को) दिन की शुरू हम नमाज़ (ईद) से करेंगे फिर वापस आ कर क़ुरबानी करेंगे जो इस तरह करेगा वो हमारी सुन्नत के मुताबिक़ करेगा, लेकिन जो शख़्स (नमाज़ ईद से) पहले ज़बह करेगा तो उसकी हैसियत सिर्फ़ गोश्त की होगी जो उसने अपने घर वालों के लिये तैयार कर लिया है।"
[सहीह बुखारी 5545]
इसमें वाज़ेह है कि क़ुरबानी सुन्नत ए मुवक़्क़दा है।
हज़रत अबू मसूद बद्री अंसारी रज़ि अन्हु कहते हैं:
"मैं तो क़ुरबानी तर्क करने का इरादा करता हूँ इस डर से के हतमी (हमेशा) और वाज़िब ना समझ लिया जाए हालांकि में तो सबसे बढ़ कर आसानी से क़ुरबानी कर सकता हूँ।"
[सुनन कुबरा बहिएक़ी 09/265 सनद सहीह]
लिहाज़ा पाता चला क़ुरबानी वाजिब नहीं।
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क़ुर्बानी का जानवर तंदुरुस्त, मोटा ताज़ा और ऐसा हो कि उस को देख कर तबियत ख़ुश हो जाय हदीस में जो रिवायत है उस से क़ुर्बानी के जानवर का भली भांति अंदाज़ा लगाया जा सकता है:
عَنْ عَائِشَةَ أَوْ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ إِذَا أَرَادَ أَنْ يُضَحِّيَ اشْتَرَى كَبْشَيْنِ عَظِيمَيْنِ سَمِينَيْنِ أَمْلَحَيْنِ أَقْرَنَيْنِ مَوْجُوأَيْنِ فَيَذْبَحُ أَحَدَهُمَا عَنْ أُمَّتِهِ مِمَّنْ شَهِدَ بِالتَّوْحِيدِ وَشَهِدَ لَهُ بِالْبَلَاغِ وَذَبَحَ الْآخَرَ عَنْ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَآلِ مُحَمَّدٍ
(مسند احمد ،باقي مسند الأنصار » باقي المسند السابق/ سنن ابنِ ماجہ، کتاب الأضاحي » أضاحي رسول الله صلى الله عليه وسلم
आएशा और अबु हुरैरह रज़ी अल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि, "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो मोटे, ताज़े, सींगों वाले, चितकबरे, और ख़सी किये हुए दुंबों की क़ुर्बानी करते थे। एक दुंबा अपनी उम्मत की (तौहीद और आप की रिसालत की गवाही देने वालों) की तरफ़ से। और दूसरा अपनी और अपनी आल की तरफ़ से करते।"
[सुनन इब्ने माजा हदीस 3122/ किताबुल अज़ाहि, अज़ाहि रासुलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम--- मुसनद अहमद, हदीस 4681 (इस्लाम 360) व 26367 (असल किताब)/ बाक़ी मुसनद अल अंसार, अल मुसनद अस साबिक़]
किन जानवरों की क़ुर्बानी नहीं होगी और जानवर ख़रीदते वक़्त किन बातों को ध्यान देना चाहिए:
عَنْ عَلِيٍّ قَالَ أَمَرَنَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْ نَسْتَشْرِفَ الْعَيْنَ وَالْأُذُنَ
(سنن ابن ماجة رقم الحديث3143/ كتاب الأضاحي » ما يكره أن يضحى به)
"अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें हुक्म दिया कि (क़ुर्बानी के जानवर की) आंख और कान के ग़ौर से देखें यानी वह सही सलामत हैं या नहीं।"
[सुनन इब्ने माजा हदीस नंबर 3143/किताबुल आज़ाहि, जिनकी क़ुर्बानी से मना किया गया है सुनन अबी दाऊद 2804]
عَنْ عُبَيْدِ بْنِ فَيْرُوزَ قَالَ سَأَلْتُ الْبَرَاءَ بْنَ عَازِبٍ مَا لَا يَجُوزُ فِي الْأَضَاحِيِّ فَقَالَ قَامَ فِينَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَصَابِعِي أَقْصَرُ مِنْ أَصَابِعِهِ وَأَنَامِلِي أَقْصَرُ مِنْ أَنَامِلِهِ فَقَالَ أَرْبَعٌ لَا تَجُوزُ فِي الْأَضَاحِيِّ فَقَالَ الْعَوْرَاءُ بَيِّنٌ عَوَرُهَا وَالْمَرِيضَةُ بَيِّنٌ مَرَضُهَا وَالْعَرْجَاءُ بَيِّنٌ ظَلْعُهَا وَالْكَسِيرُ الَّتِي لَا تَنْقَى قَالَ قُلْتُ فَإِنِّي أَكْرَهُ أَنْ يَكُونَ فِي السِّنِّ نَقْصٌ قَالَ مَا كَرِهْتَ فَدَعْهُ وَلَا تُحَرِّمْهُ عَلَى أَحَدٍ قَالَ أَبُو دَاوُد لَيْسَ لَهَا مُخٌّ
(الضحايا » - ما يكره من الضحايا)
उबैद बिन फ़िरोज़ कहते हैं कि मैंने बरा बिन आज़िब रज़ी अल्लाहु अन्हुमा से पूछा कि किस तरह के जानवर की क़ुर्बानी दुरुस्त नहीं है?
तो आप ने फ़रमाया अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे दरमियान खड़े हुए, मेरी उंगलियां और उनके पोर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उंगलियों और पोर छोटी हैं, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चार उंगलियों से इशारा किया और फ़रमाया: 4 तरह के जानवरों की क़ुर्बानी जाएज़ नहीं हैं।
(1) الْعَوْرَاءُ
काना जिस का कानापन ज़ाहिर हो।
(2) وَالْمَرِيضَةُ
बीमार जिसकी बीमारी ज़ाहिर हो।
(3) وَالْعَرْجَاءُ
लंगड़ा जिस का लंगड़ापन ज़ाहिर हो।
(4) وَالْكَسِيرُ الَّتِي لَا تَنْقَى أو العجفاء
दुबला कमज़ोर जानवर जिस की हड्डियों में गूदा न हो।
मैंने कहा मुझे वह जानवर भी बुरा लगता है जिस के दांत में कमी हो। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, "जो तुम्हें नापसंद हो उस को छोड़ दो लेकिन किसी और पर इस को हराम न करो।"
अबु दाऊद कहते हैं لا تنقى से मुराद यह है कि उस की हड्डी में गूदा न हो।
[सुनन अबु दाऊद हदीस नंबर 2802/ किताबुज़ ज़हाया क़ुर्बानी में मकरूहात का बयान]
इमाम तिर्मिज़ी इस हदीस को नक़ल करने के बाद कहते हैं وَالْعَمَلُ عَلَى هَذَا الْحَدِيثِ عِنْدَ أَهْلِ الْعِلْمِ कि इसी पर अहले इल्म का अमल है।
[सुनन तिर्मिज़ी हदीस नंबर 1497 अल आज़ाहि अन रसुलिल्लाह]
عَنْ عَلِيٍّ قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْ يُضَحَّى بِمُقَابَلَةٍ أَوْ مُدَابَرَةٍ أَوْ شَرْقَاءَ أَوْ خَرْقَاءَ أَوْ جَدْعَاءَ .
(سنن ابن ماجة رقم الحديث 3142/ كتاب الأضاحي » ما يكره أن يضحى به)
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसे जानवर की क़ुर्बानी से मना किया है-
(1) مُقَابَلَةٍ
जिस का कान आगे से कटा हो।
(2) مُدَابَرَةٍ
जिसका कान आगे या पीछे से कटा हो।
(3) شَرْقَاءَ
जिस बकरी का कान लंबाई में चीरे हुए हों।
(4) خَرْقَاءَ
जिस के कान गोलाई में फटे हुए हों।
(5) جَدْعَاءَ
जिस का कोई उज़व (body part) कटा हुआ हो।
[सुनन इब्ने माजा हदीस नंबर 3142/किताबुल आज़ाहि, जिनकी क़ुर्बानी से मना किया गया है]
عَنْ قَتَادَةَ أَنَّهُ ذَكَرَ أَنَّهُ سَمِعَ جُرَيَّ بْنَ كُلَيْبٍ يُحَدِّثُ أَنَّهُ سَمِعَ عَلِيًّا يُحَدِّثُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَهَى أَنْ يُضَحَّى بِأَعْضَبِ الْقَرْنِ وَالْأُذُنِ
(سنن ابن ماجة رقم الحديث 3145/ كتاب الأضاحي » ما يكره أن يضحى به)
क़तादह से रिवायत है कि उनसे जुरई बिन कुलैब ने बयान किया कि मैंने अली रज़ी अल्लाहु अन्हु को यह कहते हुए सुना कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने "टूटी सींग" और "कान कटे" जानवर की कुर्बानी से रोका है।
[सुनन इब्ने माजा हदीस नंबर 3145/किताबुल आज़ाहि, जिनकी क़ुर्बानी से मना किया गया है]
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عَنْ جَابِرٍ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَا تَذْبَحُوا إِلَّا مُسِنَّةً إِلَّا أَنْ يَعْسُرَ عَلَيْكُمْ فَتَذْبَحُوا جَذَعَةً مِنْ الضَّأْنِ
(صحيح مسلم رقم الحديث 5082/كتاب الأضاحي » سن الأضحية)
जाबिर रज़ी अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि, "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया सिर्फ़ 2 दांत वाले जानवर की क़ुर्बानी करो, हां अगर दुशवार हो तो एक साल का दुंबा ज़बह करो।"
[सही मुस्लिम हदीस नंबर 5082/ किताबुल आज़ाहि, क़ुर्बानी के जानवर की उम्र]
जानवरों के अगले दो दांत आम तौर पर 14 महीने के बाद ही आते हैं इसलिए ख़रीदते वक़्त दांतों का ज़रूर ध्यान रखना चाहिए अलबत्ता अगर जानवर घर का है तो एक वर्ष होने पर उसकी क़ुर्बानी की जा सकती है जैसे अगर किसी के घर बक़रईद के दिन पैदा हुआ है तो वह अगले साल बकरईद पर क़ुर्बानी के लायक़ हो जाएगा लेकिन दूसरे का ऐतेबार न होगा।
इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-2" में करेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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