Allah ka wada aur hauz e kausar | Mahvish Ki Kahani

Haldi, mehendi, sanchak, manjha jaisi bidat shadi me gumrahi


अल्लाह का वादा और हौज कौसर

"क्या बात है माहविश! तुम रो रही हो?

हुमेरा खाला ने घबराहट के आलम मे माहविश के आंसु पोछते हुए कहा

वो बस अभी-अभी तिलावत ख़तम करके उठी थी माथे पर दाग़ ए सुजूद उन के चेहरे पर पुर कशिश हो रहा था...

हुमेरा खाला को देखकर माहविश मजीद रोने लगी

(कुछ दिन पहले ही माहविश का रस्म हुआ था अब कुछ दिन बाद उसकी शादी थी)

अब हुमेरा खाला की बेचैनी बढ़ने लगी तरह-तरह के ख्याल उनके जहन मे गर्दिश कर रहे थे कि कही माहविश किसी और से.....

नहीं!

ऐसा नहीं हो सकता... अगर ऐसा होता तो माहविश पहले ही बता देती...

(माहविश बहुत सुलझी हुई लड़की थी खुश मिजाज खुश अख़लाक़ अपने नबीﷺ  अपने रब से मोहब्बत करने वाली)

हुमेरा खाला ने उस लम्हे भर के ख्याल से निकलते हुए कहा माहविश साफ-साफ बता क्या बात है?

क्या तुम इस रिश्ते से खुश नहीं हो?

तुम्हारी जिंदगी का कितना खूबसूरत दिन आने वाला है, सब मेहमान आएंगे तरह-तरह की रस्मे होंगी, अहद किये जाएंगे, मिठाई बटवाई जाएगी फिर कुछ दिन बाद तुम्हारी शादी भी तो है अभी तुम्हे हल्दी भी लगनी हैं मांजा भी देना है....

बस बस!!

बस कीजिये खाला

माहविश दहाड़े मार कर रोने लगी...

___________

आज माहविश का मांजा था 

माहविश की अम्मी ने क़ुरान खानी का इंतजाम भी कर लिया था। सब घर वाले तैयारियों मे मगन थे.....

___________


"मैं अप्पी की शादी में यह लहंगा पहनूँगी...

बाजिगा ने अपनी अम्मी फरज़ाना और बहन सायमा की तरफ मुतवज्जु होकर बड़ी खुशी से कहा

" आप को पता है अम्मी मैने और सायमा अप्पी ने जीजू के जूते छुपाने की पूरी प्लेनिंग कर ली है और हाँ जब जीजू की ऊँगली पकड़ने जायँगे तब खूब पैसे वसूल कर लेंगे जीजाजी से!

बाजिगा बड़ी खुशी से अपनी अम्मी से कह रही थी 

सायमा, बाजिगा की मंझली बहन थी

...दोनो ताली मार कर हंस रहे थे कि इतने मे...

डोर बेल बजी

माहविश की अम्मी ने दरवाजा खोला

सामने एक आदमी पार्सल लाया था

सायमा ने बड़ी जुस्तजू से पूछा

ये क्या है अम्मी ?

अम्मी फरजाना बड़े अदब से उसे सीने से लगाकर ला रही थी

अब बाजिगा भी मुताजस होने लगी थी

फरज़ाना ने उसे लकर मेहराब मे बड़े आराम से रखा 

सायमा ने दोबारा पूछा... ये क्या है अम्मी बताएं न ?

बाजिग ने बात को मजीद दोहराया...दोनो का जवाब देते हुए उस ने कहा ये क़ुरान पाक है।

ये मैंने खुसूस माहविश के लिए मंगवाया है। जब वो रुख़सत होगी तो उस के सर पर इसे रखा जायेगा और उसके नीचे से वो रुख़सत होगी।

ये हमारे यहा का रिवाज है बेटा। 

दोनो बहने एक-दूसरे को हैरत से देख रही थी...

क्या महूस अप्पी इतनी मनहूस है कि उनकी नहूसत इस तरह क़ुरान से निकली जाएगी अभी हम ये बात महूस अप्पी से बता कर आते है।

बाजिगा ने मसखरे अंदाज मे कहा और दोनो जोर-जोर से हँसने लगी थी।

___________

मेरी आख़िरत बर्बाद हो रही है हुमेरा खाला!... माहविश ने रोते हुए कहा

हुमेरा खाला ने शफ़क़त से माहविश के सर पर हाथ रखते हुए पूछा "पूरी बात बताओ माहविश..क्या हुआ तुम्हे? क्यू ऐसा कह रही हो?

वो बहुत मुताजस थी

"जीब्रइल अल० जन्नत मे जाने से पहले ही मेरे सामने दीवार खड़ी कर देंगे मेरे वजु से चमकते हुए हाथ पैर भी मेरे काम न आएंगे"

मुझे हौज कौसर से मेहरूम कर दिया जायेगा.... ये कहते हुए माहविश फूट-फूट कर रोने लगी

खाला जान समझ गयी कि माहविश क्या कहना चाहती है

खाला जान! आज कल की इन रस्मो रीवाज ने सुन्नत नवबीﷺ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। इन खुराफ़ातो ने दीन मे नई-नई चीजें शामिल कर दी । हर तरफ बीदत ही बिदअत नजर आती है अक्सरियत उस की शिकार है खाला!

और मेरे घर वाले भी उसमे अपना रोल अदा करते है। ये लोग क्यो नहीं समझते ?.. "क्या इन्होने कही से इस बात की सनद हासिल की है बल्कि ये लोग अपने बाप दादा की अंधी पैरवी करते है"

जब उनसे कहो तो कहते हैं कि सब यही करते हैं और हमारे बाप दादा ने भी किया... यही तो खुदा कहता है और 

जब उन्हें खुदा की तरफ बुलाया जाता है तो कहते हैं

قالوا بل وجدنا آباءنا"

"हमने अपने बाप दादा को इसी तरीके पर पाया" 

उसकी आंखों से आंसू इस तरह रवा थे जैसे तस्वीह के दाने बिखर रहे हो। हुमेरा खाला बड़ी अजीजी से माहविश की बातें सुन रही थी

"मुझे डर है कि कहीं मुझे भी हौज कौसर से मेहरूम न कर दिया जाये!"

अब वो मजीद रोने लगी..

मुझे अपने नबी ﷺ से मिलना है। मुझे उनसे हौज कौसर पीना है खाला .. मैं इन सब बातो से बेजार हूँ इन सब इन सब रिवाजों इन सब बिदअतो से बेजार हूँ जो मेरे नबीﷺ की शरीयत के खिलाफ हो।         

माहविश अपने आंसु पोंछकर कह रही थी.....

जिस क़ुरान को खुदा ने ھدا للناس कहा उस क़ुरान को लोगो ने नहुसत निकलने का ज़रिया बना दिया। 

काश ये लोग जानते...!

इन रस्मो रीवाज ने इन बिदअत ने दीन को खूब पमाल किया है।                                           

मेहरम, ना मेहरम तक के फ़र्क़ को ख़तम कर दिया

माहविश की आँखें रोते रोते सूज गयी थी 

इधर बाजीगा और सायमा, माहविश के पास अपनी चुड़िया बताने आयी थी माहविश और हुमैरा खाला की बात सुनते हुए वही रूम के बाहर खड़ी हो गयी।

मैं कोशिश कर कर के थक चुकी हुँ खाला जान लेकिन.....

वो अब सिसकियां लेने लगी थी

तुम जानती हो माहविश! जब तुम बुराई देखो तो उसे हाथ से रोको और जब ये न कर सको तो जुबान से रोको और ये भी न कर सको तो दिल मे बुरा जानो ये सब से कम दर्जे का ईमान है। (अल मुस्लिम)

हदीस का मफहूम पेश करते हुए हुमैरा खाला ने कहा  तूने तो हाथ से भी रोका और जुबान से भी... और तुम जानती हो तुम पर पैगाम पहुंचा देने के अलावा कोई जिम्मेदारी नहीं है - 

وَمَا عَلَيْنَآ إِلَّا ٱلْبَلَٰغُ ٱلْمُبِينُ

माहविश को हुमैरा खाला की बातो से तसल्ली हो रही थी.....

वो बड़ी गौर से हुमैरा खाला की बातों को सिमाअत फरमा रही थी

आपﷺ ने अपनी पूरी जिंदगी को क़ुरान का मुसदाक व तर्जुमान बना कर रखा था

एक बेहतरीन दीन इस्लाम एक बेहतरीन शरीयत क़ायम की। मुश्किलात को ख़तम कर सहूलते फराहम की इतना ही नहीं रात-रात सजदो मे अपनी उम्मत के लिए रोये 

हाय कि यही उम्मत ने बड़ा जुल्म किया उनकी शरीयत मे मुदखलत करके।

ये कहते हुए अब हुमैरा खाला की आँखों मे आंसु आने लगे थे..

नबी ﷺ ने तो ऐसे लोगो पर लानत की है जो बिदअतो को पनाह दे (सहीह मुस्लिम)

नहीं खाला जान !!

मैं हरगिज ऐसा नहीं होने दूँगी

मैं खुद को अपने घरवालो को जहन्नुम का हिस्सेदार नहीं बनने दूँगी

खुदा का इरशाद भी तो है न 

"बचाओ अपने आप को अपने अहल ओ अयाल को जहन्नुम की आग से"

मैं आखिरी दम तक इन खुराफाती बिदअतो को ख़तम करने की कोशिश करूंगी......माहविश ने पुर अजम लहजे मे कहा।

तुम जानती हो माहविश जो राह तुमने इख्तियार की है उसके जरिये खुदा ने तुम्हे अपनी तरफ आने का रास्ता खोल दिया है...

हाँ माहविश अल्लाह ताला फरमाता है...

"जो हमारी राह मे जद्दो जहद करेगा हम जरूर उन्हे अपने रास्ते की तरफ हिदायत देंगे"

माहविश अब बहुत खुश हो रही थी

उस के कल्ब पर जैसे सकीनत नाजिल कर दी गयी हो...

वो मुतअय्यिन थी बहुत मुतअय्यिन 

लेकिन खाला....सवालिया नजरों से देखते हुए खाला से कहा

बाजीगा और सायमा मेरी दोनो प्यारी बहने मेरी शादी को लेकर बहुत खुश है उन्होंने शादी से दूल्हे की ऊँगली पकड़ने वाली रसम की तैयारी भी कर ली है। अब उन्हे कैसे समझाये कि वो न मेहरम है और उनके लिए ये गुनाह है शरीह गुनाह....

उन के लिए तो वो पर्दा है हत्ता की निगाहो का पर्दा है (अल नूर)

खुदा उन सब से बहुत नाराज होता है।

मैं कहूँगी तो मेरी बातों का गलत मतलब न निकाल ले ये लोग...!

माहविश की बातें सुनते हुए हुमैरा खाला की नजर उन दोनो पर पड़ी जो गर्दन झुकाये कान लगाये बातें सुन रही थी बस क्या था हुमैरा खाला को मौका मिल गया हक़ की नसीहत करने का 

माहविश अपनी बात ख़तम कर चुकी थी तब हुमैरा खाला ने जरा जोर की आवाज़ मे कहा "हमे तो बस कोशिश करनी है माहविश 

وَ اللّٰهُ یَهْدِیْ مَنْ یَّشَآءُ

"और अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है।"

बाजीगा और सायमा उनकी सारी बातें सुन रही थी बल्कि अल्लाह उन्हे सुना रहा था.....

हुमैरा खाला ने मजीद अपनी बात बढ़ाते हुए कहा


   أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوْا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الحق وَلا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أوتُوا الْكِتَبَ مِنْ قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمْ الْآمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ وَكَثِيرٌ مُنْهُمْ فُسِقُونَ...

 "क्या ईमान लाने वालो के लिए अभी वो वक़्त नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह के जिक्र से पिघले और उसके नाजिल करदा हक़ के आगे झुके और वो उन लोगो कि तरह न हो जाये जिन्हे पहले किताब दी गयी थी, फिर एक लम्बी मुद्दत उन पर गुजर गयी तो उन के दिल सख्त हो गये और आज उन मे से अक्सर फासिक बने हुए हैं?" (अल्हदीद)

बस ये सुनना था सायमा और बाजीगा सहम गयी और रोने लगी और कमरे मे दाखिल हुई 

उन गुनाहो से तौबा की जिसे वो मामूली बल्कि गुनाह ही नहीं समझ रही थी कहा कि "अप्पी जान हम अजम करते है कि अपने नबी ﷺ के साथ वफादारी करेंगे और हरगिज उन खुराफ़ात बिदअतो मे शिरकत नहीं करेंगे न हिस्सा लेंगे।

या अल्लाह हमे माफ़ कर दे...दोनो ने रोते हुए कहा

आह! क्या था? ख़ुदा की हिदायत ख़ुदा की नसीहत

अब तीनों बहनों ने अपनी अम्मी और घरवालो को समझाया और बताया कि इन सब से बाज आ जाये और नबीﷺ  की शरियत पर जुल्म न कीजिए

हुमैरा खाला ने उन सब का साथ दिया...

घरवालो ने उन सब से बेजारी जाहिर की लेकिन उन्होंने निकाह के मौके पर की जाने वाली वि‌द्अतो में शामिल होने से ही मना कर दिया 

माहविश ने साफ इंकार कर दिया कि वो इन बिदअतो मे शरीक नही होगी और न  ही ससुराल की तरफ से की जाने वाली किसी खुराफात का हिस्सा बनेगी !"

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तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है माहविश! क्या तुम हमे सब के सामने रूसवा करना चाहती हो, सब तैयारियाँ हो चुकी है, संचक मेहदी हल्दी मांजा.... अरे भई ये सब हमारे बड़े करते आ रहे हैं! ये सब तरीके तो खुशियाँ मनाने के हैं

"फरजाना ने गज़बनाक हो कर कहा"

लेकिन हमारे नबीﷺ ने तो ऐसा नही किया था न अम्मी?  निकाह तो फातिमा र.अ. का भी हुआ था जैनब र. अ. का भी। उन्होने ने भी खुशियाँ मनाई थी लेकिन इस तरह  नहीं... ये सब फिजूल खर्ची है और अल्लाह त'आला कहता है कि "फ़िज़ूल खर्ची करने वाले शैतान के भाई  है" - (सूरह बनी इस्राईल )

हां तो कौन सा हराम कमाई से कर रहे हैं हलाल पैसा है तुम्हारे बाप का... औलाद पर ही तो खर्च कर रहे हैं...  उसके वालिद असद ने जरा तैश मे कहा...

हलाल कमाई है तो इसे एतेदाल मे खर्च करने को कहा गया है अब्बा! और मुझे इन सब की जरूरत नहीं है काश ये पैसा उन गरीबो पर खर्च किया जाये तो दस गरीब घराने छेह माह तक आराम से खा सकते है!

फिर अल्लाह कहता है "एक खजूर भी मेरी राह मे दोगे तो उसे अहद पहाड़ के बराबर कर दूंगा" ये लाखों का फ़िजूल खर्च मैं अपनी ज़ात के लिए बर्दाश्त नहीं करूंगी। मुझे हौज कौसर से मेहरूम नहीं होना...

मुझे अपने नबी ﷺ से बेवफाई नहीं करनी अब्बा! वो अब

फूट- फूटकर रोने लगी थी...... 


"और अब्बा हम अमीर है तो आराम से सब इंतज़ाम कर लेते है....  लेकिन मुआशरे अक्सरियत बड़ी जालिम है इन सब रस्मो को देखकर एक गरीब बेटी का बाप और कर्ज़ो तले दफ़न हो जाता है... बाजीगा ने अपनी बात रखते हुए कहा 

माहविश के वालिदेन हथियार डाले किसी गहरी सोच मे जा चुके थे...

दूल्हे वाले ये रिश्ता तोड़ देंगे माहविश! फिर हम लोगो को क्या मुँह दिखाएंगे ?... माहविश की माँ ने एक नमदीदा हो कर कहा

और अल्लाह और उसका रसूल हम से रिश्ता तोड़ दे तो फिर हमारा क्या होगा अम्मी? फिर तो आप और अब्बा भी मेरे काम नहीं आएंगे न मेरा ससुराल? फिर मैं अपने खुदा और रसूल को क्या मुँह दिखाउंगी और आप?

माहविश की बात पर एक अजीब सा सन्नाटा छा चुका था.....

ठीक हैं हम तुम्हारे ससुराल वालो से बात करेंगे। माहविश की बात पर असद साहब ने एक ठंडी आह भर कर कहा था....

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ये आप क्या कह रही हैं ??

सारी तैयारी हो चुकी हैं 

फैज़ की माँ रजिया को थोड़ा कम सुनाई देता था इसी बात का फायदा उठाकर वो मजीद कहर जदा आवाज मे कहने लगी हालांकि वो सुन चुकी थी और समझ भी गयी कि फरज़ाना क्या कहना चाहती हैं 

अरे भाई.....

सजावट का समान आ चुका हैं अरे बच्चों ने फटाखे भी लाकर रखे हैं कि फैज़ की शादी मे धूम मचायेंगे अभी तो डीजे वालो को ऑर्डर दिया हैं आने का ।

वीडियो शूटिंग भी तो होनी हैं आखिरी शादी हैं घर की... यादगार रहेगी.....

और आप कह रही हैं कि सादगी से शादी होगी?

अरे भाई दो ही तो बेटे हैं हमारे... और हमारे भी तो अरमान हैं अरमान!!!

"शादी तो बड़ी धूम-धाम और रस्मों रीवाज से होगी.... हाँ!

माहविश की होने वाली रज़िया बड़े ही फ़ख्र और रुआब से कह रही बस


"हाँ बहन जी मैं समझ रही हूँ लेकिन हमारी बेटी माहविश अपनी बात पर अटल हैं वो अपनी और हमारी आख़िरत के भले के लिए ही कह रही हैं और वैसे भी सादगी से शादी होगी तो ये भी तो एक मिसाल बनेगी और आप का ही नाम होगा"..... माहविश की माँ ने लालच दे कर एक आखिरी कोशिश की बस

 

दोनो मे मुसलसल बहस चल रही थी यहां फैज़ के वालिद हाजी फ़ारूक़ स्पीकर पर रखे फोन की सारी बातें सुन चुके थे। रज़िया को कम सुनाई देने का एक फायदा ये भी तो था.....


वो क़द्रे मुतासिर हुए.... उन्होंने घर मे सब को जमा किया और अपना आखिरी फैसला सुनाते हुए कहा - "निकाह सुन्नत तरीके से ही होगा और वो सारा पैसा जो इन रस्मो रिवाजों मे लगने वाला था जिन का शरीयत मे कोई दखल नहीं उन्हे गरीबो मे तक़सीम कर दिया जाये।


अब इतनी फयाजी भी ठीक नहीं हैं जी! वैसे भी हम गरीबों मे सदका खैरात तो करते ही रहते हैं.....

बीबी रज़िया ने खफा अंदाज़ मे कहा.....


हाँ लेकिन हम ये सब क्यू करते हैं ताकि हमारे बच्चे खुश रह सके ये रस्मो रीवाज की खुशी वक़्ति हैं लेकिन فِي سَبِيلِ ٱللَّٰهِ इस मौके पर किया गया इंफ़ाक़ बहुत बड़ा होगा हम से और हमारे बच्चों से बलाये टलेंगी उन सब गरीबों की दुआओं से _!

फ़ारूक़ साहब ने बीबी रज़िया को बेटे की जान का लालच दिया था 


" बच्चों की खुशी की बात हैं तो फिर ठीक हैं.... रज़िया ने किसी गहरी सोच से निकलते हुए कहा था..... इन सब से बढ़कर तो कुछ नहीं हैं मेरे लिए ... वो ज्यादा खुश तो नहीं थी लेकिन राज़ी हो गयी थी"

___________


माहविश की अपने नबी ﷺ से मुहब्बत अपने दीन से मुहब्बत ने उसे निकाह से पांच दिन पहले ये रिस्क लेने को मजबूर कर दिया था

आखिर क्या था ?

ये अल्लाह की राह मे जद्दो जहद कर रही थी अपने नबी ﷺ  की शरीयत मे जुल्म होने से रोक रशी थी...... 


पस अल्लाह ने भी अपना वादा पूरा किया और उन की मदद की उन के दिल नरम कर दिये बेशक अल्लाह अपने वादे का पक्का हैं 

अब घर वाले भी बाज़ आ चुके थे 

अब निकाह भी बड़ी सादगी से किये गया.....

खजूर बटवाए गये और पैसा गरीबों मे तक़सीम करके उन की दुआएँ ली गयी।

माहविश और फैज़ एक पुर सुकून जिंदगी गुज़ार रहे थे । अल्लाह ने उन के दिल अपनी रज़ा से मुत्मइन कर दिये थे.....

__________


यही होता हैं जब अल्लाह के दीन की मदद की जाती हैं तो अल्लाह उस की मदद करते हैं......


अतिउल्लाह व अतियुल रसूल

-आलिया खान हाफिज़ नज़रुल्लाह खान, अर्धापुर


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