Shab e qadr ki ahmiyat and fazilat

Jo koi shab e qadr mein apne imaan ka jayeza lete huye ibadat kare uske pichle tamam gunah maaf kar diye jayenge


शबे क़द्र की अहमियत और फ़ज़ीलत



بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ

"जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ अपना जायज़ा लेते हुए रखा उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ कर दिए गए और जो कोई ईमान के साथ अपना जायज़ा लेते हुए लैलतुल कद्र में इबादत करे उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं"

 (सही बुख़ारी 35/ किताबुल-ईमान, 1901/ किताबुस सौम ईमान और एहतेसाब के साथ रोज़ा रखने का बयान, जामें तिर्मिज़ी 683/, अबवाबुस सौम्, मिश्कातुल मसाबीह 1958/ किताबुस सौम)


जिस प्रकार रोज़ा केवल भूख-प्यास से रुके रहने का नाम नहीं है, बल्कि तमाम फ़ुज़ूल कामों, झूठ, चुग़ली, ग़ीबत, मज़ाक़ उड़ाना, वादा ख़िलाफ़ी, किसी को दुख पहुँचाना, अपशब्द बकना, किसी का हक़ मारना, क़र्ज़ के लेन-देन में बेईमानी, धोखाधड़ी, व्यापार में झूठी क़सम, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के हुक़ूक़ अदा न करना जैसी बुराईयों को छोड़ देना ज़रूरी है वरना, रोज़ा रखने वाले को भूख और प्यास के इलावा कुछ हासिल नहीं होगा। ऐसे व्यक्ति की भूखे-प्यासे रहने से अल्लाह को कोई मतलब नहीं।

مَنْ لَمْ يَدَعْ قَوْلَ الزُّورِ وَالْعَمَلَ بِهِ فَلَيْسَ لِلَّهِ حَاجَةٌ فِي أَنْ يَدَعَ طَعَامَهُ وَشَرَابَهُ

"जो झूठ बोलना और उसपर अमल करना न छोड़े अल्लाह को उसके भूखे-प्यासे रहने से कोई मतलब नहीं" (सही बुख़ारी 1903)


इसी प्रकार शबे क़द्र भी केवल रात भर जागने की रात नहीं, यह अपने गुनाहों से सच्ची तौबा की रात है अल्लाह से एक वादा करने और उससे संबंध मज़बूत करने की रात है। हदीस में बयान हो चुका है कि जो इस रात में ईमान के साथ अपने तमाम आमाल का जायज़ा लेते हुए रात जाग कर गुज़ारे तो उसके पिछले तमाम गुनाह बख़्श दिए जाते हैं। यहां शब्द एहतेसाब पर गहराई से विचार करने की ज़रूरत है इसलिए कि शबे क़द्र में जागने वाला व्यक्ति ज़रा अपने पूरे साल के अमल बल्कि ज़िंदगी के प्रत्येक क्षण का जायज़ा ले कि उसने कितने गुनाह किये हैं, माल हलाल कमाया है या हराम, अगर हलाल माल कमाया है तो क्या उस से अल्लाह तआला और उसके बंदों का हक़ अदा किया है या नहीं, उसे हलाल जगह ख़र्च किया है या हराम जगह। जायज़ जगह माल इस्तेमाल हुआ है या फ़ुज़ूल कामों में दौलत बर्बाद हुई है। उसने अपनी प्रोपर्टी कहीं सिर्फ़ बेटों में तक़सीम करके और बेटियों को विरासत से महरूम कर के अल्लाह की मुक़द्दस किताब क़ुरआन मजीद का मज़ाक़ तो नहीं उड़ाया है। माता -पिता के आज्ञा का पालन किया है या नाफ़रमानी, उनके हुक़ूक़, अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों के हुक़ूक़ अदा किये हैं या नहीं, औरत ने बीवी के रूप में शौहर के और मर्द ने शौहर के रूप में बीवी के कितने हुक़ूक़ अदा किए हैं, हाकिम ने अपनी जनता के साथ, सेठ ने अपने मज़दूरों के साथ, मैनेजर ने अपने मातहतों के साथ, कारख़ाने के मालिकों ने अपने वर्करों के साथ, दुकानदारों ने अपने ग्राहकों के साथ कैसा बर्ताव किया है क्योंकि अल्लाह ने प्रत्येक व्यक्ति को ज़िम्मेदार बनाया है

أَلَا كُلُّكُمْ رَاعٍ وَكُلُّكُمْ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ فَالْإِمَامُ الَّذِي عَلَى النَّاسِ رَاعٍ وَهُوَ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ وَالرَّجُلُ رَاعٍ عَلَى أَهْلِ بَيْتِهِ وَهُوَ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ وَالْمَرْأَةُ رَاعِيَةٌ عَلَى أَهْلِ بَيْتِ زَوْجِهَا وَوَلَدِهِ وَهِيَ مَسْئُولَةٌ عَنْهُمْ وَعَبْدُ الرَّجُلِ رَاعٍ عَلَى مَالِ سَيِّدِهِ وَهُوَ مَسْئُولٌ عَنْهُ أَلَا فَكُلُّكُمْ رَاعٍ وَكُلُّكُمْ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "सावधान हो जाओ! तुममें हर व्यक्ति ज़िम्मेदार है और तुम से अपने अधीनस्थों (मातहतों) के बारे में पूछताछ की जाएगी। इमाम लोगों पर ज़िम्मेदार है उससे उसके मातहतों के बारे में पूछा जाएगा। मर्द अपने घर वालों पर ज़िम्मेदार है उस से उनके बारे में सवाल होगा। औरत अपने शौहर के घर वालों और उसके बच्चों की ज़िम्मेदार है उस से उनके बारे में पूछताछ होगी और किसी व्यक्ति का ग़ुलाम अपने सरदार के माल का ज़िम्मेदार है उस से उसके बारे में सवाल होगा। होशियार! तुम में से प्रत्येक व्यक्ति ज़िम्मेदार है और तमाम से उनके मातहतों के बारे में ज़रूर पूछा जाएगा।

 (सही बुख़ारी 7138/किताबुल-अहकाम)


इस सवाल को हल करने में एक इंसान कितना कामयाब हुए इसका जायज़ा लेना ही एहतेसाब है, बच्चों और बच्चीयों की इस्लामी तरबियत में माता-पिता ने कितना हिस्सा लिया । उन्होंने यह कैसी तरबियत की कि उनके बच्चे नमाज़ से दूर, इस्लामी तालीमात और अख़लाक़ से दूर और इस्लामी आदाब व उसूल से नावाक़िफ़ हैं। क़ुरआन जिसका इस रात से विशेष संबंध है इस किताब में क्या है उन्हें पता ही नहीं बल्कि माता-पिता को ख़ुद भी मालूम नहीं। उन्होंने औलाद के अंदर इस्लामी पहचान पैदा करने के बजाय उन्हें दुनिया की चका चौंध और उसकी रंगीनी के सपने दिखाए, लड़कियों की तालीम कैसे की कि वह दूसरे के चंगुल में फंस कर न केवल पाकदामनी और इज़्ज़त गंवा रही हैं बल्कि अपना दीन धर्म भी छोड़ रही हैं। ज़ुल्म व ज़्यादती, झूठ, चुग़ली, ग़ीबत, बुरा भला कहना, गाली-गलौज, वादा ख़िलाफ़ी, दूसरे के अधिकारों का हनन और तमाम फ़ुज़ूल और बेकार कामों से तौबा करना और एक नए इरादे के साथ अपने तअल्लुक़ात को अल्लाह के साथ मज़बूत करने, उसके आदेशों का पालन करने और उसके रसूल के बताए हुए रास्ते पर चलने का अहद करने की ज़रूरत है वरना अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

 رُبَّ صَائِمٍ لَيْسَ لَهُ مِنْ صِيَامِهِ إِلَّا الْجُوعُ وَرُبَّ قَائِمٍ لَيْسَ لَهُ مِنْ قِيَامِهِ إِلَّا السَّهَرُ

"कुछ रोज़ेदारों को रोज़े से भूख और प्यास के सिवा कुछ नहीं मिलता और कुछ क़याम करने (जागने वालों) को रात भर जागने के सिवा कुछ नहीं मिलता"

(सुनन इब्ने माजा 1690/ किताबुस सयाम, ग़ीबत के बारे में)

 

इस रात में जाग कर लंबी लंबी दुआओं से कुछ हासिल नहीं होगा अगर दिल तौबा करने और गुनाहों को छोडने पर आमादा नहीं। इसलिए दुआ के साथ साथ ख़ालिस नीयत और सच्ची तौबा की ज़रूरत है वरना

होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क ए इश्क़ की

दिल चाहता न हो तो दुआ में असर कहां
जब एक व्यक्ति तन्हाई में बैठ कर अपने रब से लौ लगाता है, अपने गुनाहों पर पछताता है और अपनी ग़लतियों पर शर्मिंदा होता है, अल्लाह से माफ़ी तलब करता है, उसकी हम्द व सना (प्रशंसा) करता है तो अल्लाह तआला उसे अपनी रज़ा का सर्टिफ़िकेट प्रदान करता है।

एक हदीस में है

وَرَجُلٌ ذَكَرَ اللَّهَ خَالِيًا فَفَاضَتْ عَيْنَاهُ

"वह इंसान जिसने तन्हाई में अल्लाह का ज़िक्र किया और उसकी आंखों से आंसू बह निकले वह क़यामत के दिन अल्लाह के साये में होगा"

(सही बुख़ारी 660/ किताबुल अज़ान , जो मस्जिद में नमाज़ के इंतेज़ार में बैठे)


अल्लाह तबारक व तआला से दुआ है कि हमारी ग़लतियों को माफ़ कर दे, हमारे गुनाहों को बख़्श दे। जबतक ज़िंदा रखे इस्लाम पर ज़िंदा रखे और अंत ईमान पर हो।

रब्बना आतिना फ़िद दुनिया हसना व फ़िल आख़िरति हसना व क़िना अज़ाबन नार



आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही 

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