इतिकाफ और उसकी फज़ीलत
1. इतिकाफ (I'tikaf) क्या है?
इतिकाफ एक अहम इबादत है जिसमें मुसलमान अल्लाह की रज़ा और क़रीबी हासिल करने के लिए कुछ समय के लिए दुनियावी मशरूफियात (व्यस्तताओं) को छोड़कर मस्जिद में कयाम (रुकता) करता है।
2. इतिकाफ की का माना :
अरबी में "इतिकाफ" का मतलब "रुक जाना" या "किसी जगह ठहर जाना" है। शरई मानो में, इतिकाफ रमज़ान के आखिरी अशरे (दस दिनों) में मस्जिद में कयाम करके इबादत, ज़िक्र, दुआ और इस्तग़फ़ार में मसरूफ़ रहने को कहते हैं।
3. इतिकाफ की शरीअत में अहमियत:
i. सुननत-ए-मुअक्कदा अलल-किफाया: रमज़ान के आखिरी अशरे का इतिकाफ सुननत-ए-मुअक्कदा अलल-किफाया है, यानी अगर मोहल्ले में कोई भी इतिकाफ कर ले, तो सबकी तरफ़ से सुन्नत अदा हो जाएगी, वरना सभी गुनाहगार होंगे।
हज़रत आयशा (रज़ि.अन्हा) फ़रमाती हैं,
"रसूलुल्लाह ﷺ रमज़ान के आखिरी अशरे में इतिकाफ किया करते थे, यहाँ तक कि अल्लाह ने आपको वफ़ात दी। फिर आपके बाद आपकी अज्वाज-ए-मुतह्हरात (पाक बीवियाँ) भी इतिकाफ किया करती थीं।" [सहीह बुख़ारी: 2026, सहीह मुस्लिम: 1172]
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
"और जब हमने इब्राहीम और इस्माईल से कहा कि मेरे घर को तवाफ़ करने वालों, इतिकाफ करने वालों और रुकू-सज्दा करने वालों के लिए पाक रखो।" [सूरत अल-बक़रा: 125]
"और तुम अपनी बीवियों से मुबाशरत (संबंध) न करो, जब तुम मस्जिदों में इतिकाफ में हो।" [सूरत अल-बक़रा: 187]
इससे यह साबित होता है कि इतिकाफ एक अहम इबादत है, जो पहले अंबिया (नबी) के ज़माने में भी मौजूद थी और इस्लाम में भी इसे जारी रखा गया।
ii. वाजिब:अगर किसी ने मन्नत (नज़र) मानी कि मैं अल्लाह के लिए इतिकाफ करूँगा, तो उस पर इतिकाफ करना वाजिब हो जाता है।
iii. नफ़्ली: रमज़ान के अलावा साल के किसी भी दिन इतिकाफ किया जा सकता है, यह एक मुस्तहब (पसंदीदा) और नफ़्ल इबादत है।
4. इतिकाफ की फज़ीलत:
i. नबी करीम ﷺ रमज़ान के आखिरी अशरे (दस दिनों) में हमेशा इतिकाफ फ़रमाते थे।
हज़रत आयशा (रज़ि.अन्हा) फ़रमाती हैं:
"नबी करीम ﷺ रमज़ान के आखिरी दस दिनों में इतिकाफ फ़रमाया करते थे, यहाँ तक कि अल्लाह ने आपको वफ़ात दी।" [सहीह बुख़ारी: 2026, सहीह मुस्लिम: 1172]
ii. इतिकाफ करने वाला पूरी तरह से इबादत में मसरूफ़ हो जाता है और दुनियावी मामलों से कटकर अल्लाह की क़ुरबत (नजदीकी) हासिल करता है।
iii. यह रातों में इबादत करने और शब-ए-क़द्र को तलाश करने का बेहतरीन मौक़ा होता है।
iv. इतिकाफ करने वाले को दो इबादतों का सवाब मिलता है।
हज़रत इब्न अब्बास (रज़ि.अन्हु) फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जो शख्स अल्लाह की रज़ा के लिए एक दिन का इतिकाफ करता है, अल्लाह उसके और जहन्नम के बीच तीन खंदकों (खाइयों) का फ़ासला कर देता है, और हर खंदक का फ़ासला मशरिक (पूर्व) और मगरिब (पश्चिम) के बराबर होता है।" [तबरानी, अल-मुजाम अल-औसत: 7945, सहीह अल-जामिअ: 5269]
6. इतिकाफ की क़िस्में:
इतिकाफ की तीन क़िस्में हैं:
- सुन्नत-ए-मुअक्कदा
- वाजिब इतिकाफ
- नफ़्ली इतिकाफ
i. सुन्नत-ए-मुअक्कदा: रमज़ान के आखिरी अशरे में किया जाने वाला इतिकाफ। (सहीह बुख़ारी: 2026)
ii. वाजिब इतिकाफ:अगर किसी ने मन्नत (नज़र) मानी हो कि मैं इतिकाफ करूँगा, तो उस पर इतिकाफ वाजिब हो जाएगा। (मुस्नद अहमद: 24846)
iii. नफ़्ली इतिकाफ: रमज़ान या किसी भी समय कुछ घंटों या दिनों के लिए मस्जिद में ठहरकर किया जाने वाला इतिकाफ।
7. इतिकाफ के बुनियादी उसूल:
i. मस्जिद में क़याम (रुकना): मर्दों और औरतों के लिए ज़रूरी है कि वे मस्जिद में ही इतिकाफ करें। (सूरत अल-बक़रा: 187)
ii. रोज़ा रखना: इतिकाफ के साथ रोज़ा रखना अफ़ज़ल (बेहतर) है। (सहीह बुख़ारी: 2025)
iii. बिला ज़रूरत मस्जिद से बाहर न जाना: सिर्फ ज़रूरी कामों (वुज़ू, ग़ुस्ल, तहारत) के लिए ही बाहर जाना जायज़ है, वरना बाहर जाने से इतिकाफ टूट जाता है। (इब्न माजा: 1776)
iv. इबादत में मसरूफ़ रहना: इतिकाफ के दौरान क़ुरआन की तिलावत, नमाज़, दुआ, ज़िक्र और इस्तिग़फ़ार में समय बिताना चाहिए।
8. इतिकाफ के अहकाम व शराइत:
i. मुसलमान होना: गैर-मुस्लिम पर इतिकाफ नहीं है।
ii. अक़लमंद (समझदार) होना: पागल या नाबालिग बच्चे पर इतिकाफ फ़र्ज़ नहीं।
iii. मस्जिद में क़याम (ठहरना): मर्दों और औरतों के लिए मस्जिद में इतिकाफ करना ज़रूरी है।
iv. रमज़ान के आखिरी अशरे का मुकम्मल होना: सुन्नत इतिकाफ 20 रमज़ान की मग़रिब से शुरू होकर 30 रमज़ान की मग़रिब तक जारी रहता है।
v. रोज़ा रखना: रोज़ा इतिकाफ के लिए ज़रूरी है (वाजिब इतिकाफ में)।
vi. बिला ज़रूरत मस्जिद से बाहर न जाना: सिर्फ़ ज़रूरी कामों (वुज़ू, ग़ुस्ल, तहारत) के लिए ही मस्जिद से बाहर जाना जायज़ है।
9. शब-ए-क़द्र और इतिकाफ:
इतिकाफ करने वाले को शब-ए-क़द्र के फ़ज़ाइल (सवाब) का भी अज्र मिलता है।
क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
"इस रात (शब-ए-क़द्र) की इबादत हज़ार महीनों से बेहतर है।" [सूरत अल-क़द्र: 3]
यही वजह है कि नबी करीम ﷺ रमज़ान के आखिरी अशरे में इतिकाफ फ़रमाते ताकि शब-ए-क़द्र को हासिल कर सकें।
10. इतिकाफ के फायदे:
- अल्लाह की क़ुरबत (नजदीकी) नसीब होती है।
- दुनियावी मशरूफियात (व्यस्तताओं) से दूर होकर इबादत का मौक़ा मिलता है।
- गुनाहों की मग़फिरत (क्षमा) का बेहतरीन ज़रिया है।
- शब-ए-क़द्र को पाने का मौक़ा मिलता है, जो हज़ार महीनों से बेहतर है।
- दिल को पाकीज़गी और सुकून हासिल होता है।
11. इतिकाफ के दौरान क्या करना चाहिए?
- ज्यादा से ज्यादा इबादत करें।
- क़ुरआन की तिलावत करें।
- ज़िक्र व अज़कार और दुरूद शरीफ का विर्द करें।
- अल्लाह से दुआ और इस्तिग़फ़ार करें।
- नफ़्ली नमाज़ें (तहज्जुद, इशराक, चाश्त) अदा करें।
- शब-ए-क़द्र की तलाश में ज्यादा इबादत करें।
11. इतिकाफ के दौरान क्या नहीं करना चाहिए?
- फ़ुज़ूल बातों में वक़्त जाया (बर्बाद) करना।
- बिला ज़रुरत मोबाइल का इस्तेमाल करना।
- सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना और पोस्ट शेयर करते रहना।
- मस्जिद के आदाब का ख़्यालन रखना।
अल्लाह हमें इतिकाफ़ की अज़मत (महत्त्व) को समझने और इसे अदा करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
आमीन!
By Islamic Theology
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