नमाज़ की अहमियत (नमाज़ रिज़्क़ में बरकत)
हम इस अहम टुकड़े को दो हिस्सों में बाटेंगे-
- (01) नमाज़ रिज़्क़ में बरकत
- (02) नमाज़ के ज़रिये मदद
रिज़्क़ के लुगवी माना "अता" के हैं चाहे वो दुनिया भी अता हो उखरवी (आख़िरत) अरबी लफ्ज़ में रिज़्क़ अल्लाह की अता करदा चीज़ को कहा जाता हैं। माल, इल्म, ताकत, वक़्त, अनाज, सब नेमतें रिज़्क़ में शामिल हैं गरज हर वह चीज जिससे इंसान को किसी ना किसी तरह से फायदा पहुंचता हो वो रिज़्क़ है। रिज़्क़ का एक मानी नसीब भी है, जो गिज़ा पेट में जाये उसको भी रिज़्क़ कहते हैं।
अल्लाह का इरशाद ए पाक है:
हम लोग रिज़्क़ सिर्फ खाने की चीज़ो को कहते है हालांकि ऐसा नहीं हैं बल्कि रिज़्क़ अल्लाह तआला की दी हुई हर नेमत को कहते हैं चाहे वो सेहत हो, इल्म हो, अख़लाक़ हो, अमल हो, नेक बीवी और औलाद हो, माल हो, दिली इत्मीनान हो, या फिर अमन की नेमत हो अल्लाह तआला की बेशुमार नेमतों में से हर नेमत पर रिज़्क़ का इतलाक़ (एप्लीकेशन) होता है।
अल्लाह का इरशाद ए पाक है:
क़ुरआन मजीद और रोज़ी की कसरत
कुरान मजीद ने कुछ हुकुम ऐसे जिक्र किए हैं जो खुद इंसानी तरतीब के लिए तामीरी दर्स की हैसियत रखते हैं। एक जगह पर अल्लाह इरशाद फरमाते है :
[सूरह इब्राहिम 07]
और नमाज भी एक बहुत बड़ी अल्लाह की नेमत है क्या अल्लाह की नेमत (नमाज़) को अदा करेंगे तो अल्लाह ताला हमें रिज़्क़ नहीं देगा??
एक और दूसरे जगह पर अल्लाह फरमाता है :
एक हदीस और मुलाहिज़ा फरमा लें:
[सहीह बुखारी 3208]
मज़कूरा (Given Above) हदीस से ये पता चला है की अल्लाह तआला ने हमारा रिज़क माँ के पेट में ही लिख दिया जाता है। लेकिन ये बात ज़रूर है जो नमाज़ नहीं पढ़ेगा रिज़्क़ उसको भी दिया जायेगा लेकिन जो अल्लाह के फरामीन को पूरा करते हुए काम को अंजाम दे तो वो अफ़ज़ल हो जाता है और हलाल भी।
मसलन एक इंसान की तकदीर में अल्लाह ने 1 लाख रुपये लिखें हैं की ये अपनी ज़िन्दगी में 1 लाख ही कमायेगा क्यूंकि इसकी तकदीर में एक लाख ही लिखें हैं लेकिन वो इंसान उस पैसे को हराम बना ले और वक़्त से पहले एक लाख पा ले तो वो हराम हो जायेगा हालांकि वो एक लाख उसको मिलने ही मिलने थे।
अल्लाह तआला फरमाता हैं :-
आयत में अल्लाह ने वाज़ेह किया हैं नमाज़ पढ़ने से अल्लाह को कोई रोज़ी नहीं मिलती बल्कि अल्लाह खुद तुम्हे रोज़ी अता करता हैं बस तुम अल्लाह के एहकाम को पूरा करते जाओ।
हदीस मुलाहिज़ा फरमायें:
हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-मसऊद (रज़ि०) से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया:
मैंने तुम्हारे नबी ﷺ से सुना, आप फ़रमा रहे थे,
वाज़ेह हुआ की जो अपने आपको आख़िरत की फ़िक्र में ढाल लेता है अल्लाह तआला उसकी सारी कंफ्यूजन दूर कर देता है। जब अल्लाह के सामने वो नमाज़ में अपना माथा रगड़ता हैं अल्लाह गवारा नहीं करता की में अपने बन्दे को खाली हाथ भेजूं।
अल्लाह इरशाद फरमाता हैं:
"और जो अल्लाह से डरे और उसके रास्ते में निकले अल्लाह ऐसी जगह से रोज़ी देगा जहाँ से उसका ग़ुमान भी ना हो।"
[सूरह तलाक़ 02-03]
नमाज़ के ज़रिये से मदद
जब बंदा अपनी पूरी ताकत लगा देता है आखिर में आकर थक जाता है, अपने आपको कमज़ोर महसूस करने लगता है, उसका दुनिया से यक़ीन उठ जाता है, कहीं उसको रास्ता नज़र नहीं आता, थक हार कर उसके पास एक ही रास्ता बचता है की क्यों ना सबसे मांग लिया अब अल्लाह से मांग लिया जाए वो बंदा अल्लाह के सामने अपनी परेशानी रखता है और मेरा अल्लाह तो वो अल्लाह हैं अपने बन्दे को उदास कैसे देख सकता है, वो अपने बन्दे की तकलीफ कैसे सेहन कर सकता है भले ही उसके नफ़रमान बन्दे ने कभी नमाज़ ना पढ़ी हो बस एक मुश्किल में ही वो इस फर्ज़ को बंदा अंजाम देता था। अल्लाह उस नमाज़ के ज़रिये उसको ग़ैब से मदद पहुंचता है।
अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता हैं:
इंसानी ज़िन्दगी दो हिस्सों पर मुशतमिल है एक आराम व राहत एक हिस्सा तकलीफ व परेशानी से मुताल्लिक हैं यानी इंसान को कभी ज़िन्दगी में आराम मिलेगा तो कभी वो तकलीफ में भी हो सकता है। एक मोमिन के लिए इन दोनों हालातों में नबी अलैहिस्सलाम की जानिब से रेहनुमाइ मौजूद है।
नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया :
इस हदीस में इंसानी ज़िन्दगी के अच्छे और बुरे दिनों, हालात का ज़िक्र हैं और बताया गया है के राहत व सुकून वाली हालात में अल्लाह का शुक्र बजा लाना और मुसीबत व परेशानी वाली हालात में सब्र करना सवाब का काम है। सूरह बक़रा में दो मक़ाम पर अल्लाह ने मोमिनो को मुसीबत में सब्र और नमाज़ के ज़रिये मदद करने का हुक्म जैसा की ऊपर आयात में हमने बताया है।
नमाज दीन का अहम सुतून और इस्लाम का दूसरा रुकन है। ये सुकून हासिल करने, परेशानी हल करने, मुसीबत से नजात पाने और अल्लाह से क़रीब होकर उससे मदद माँगने का अहम तरीन जरिया है। अल्लाह ने अल मोमिनून के नाम से एक सूरह नाज़िल की है और वहां सबसे पहले यानी पहली आयत में मोमिनो के औसाफ ज़िक्र करते हुए सबसे पहले यानी दूसरी आयत में बताया है के वो अपनी नमाज़ में यकसोई क़ायम करते है और नवी आयत में बताया है के वो अपनी नमाज़ पर हमेशगी बरतने वाले हैं। चलिए अब उन आयत को देखते हैं-
1. पहली आयत जहाँ मोमिनो को कामयाबी की बशारत देता है:
2. दूसरी आयत जहाँ अल्लाह कामयाब होने वाले मोमिनो की पहली अलामत नमाज़ में खुशु इख़्तियार करने वाला बताया है:
3. नवी आयत में जहाँ अल्लाह ज़िक्र करता है कि मोमिन हमेशा नमाज़ क़ायम करते रहते और उस पर मुहाफ़िज़त करते हैं:
आगे 10 व 11 आयत में अल्लाह ये भी बयान करता हैं कि ऐसे ही लोग असल में जन्नत उल फिरदोस (आला जन्नत) के वारिस हैं जहाँ वो हमेशा हमेश रहेंगे।
इन बातो को तफसील से ज़िक्र करने का मेरा मक़सद ये है कि आज मुसलमान इसलिए परेशान है कि वो शिर्क व बिदअत में मुबतिला है। ऐसी सूरत में यक़ीनन मुसलमान परेशान ही रहेगा नमाज़ मक़सद हयात और दफाअ बला का जरिया है इसलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज़न (sadness) व मलाल और घबराहट व परेशानी के वक़्त नमाज़ कि तरफ मुतावज्जो हो जाया करते थें।
इस हदीस से मालूम हुआ कि नमाज परेशानी दूर करने का नबवी नुस्खा है। आप ने कुफ्फार कि तरफ से अज़ीयत व परेशानी के वक़्त नमाज़ में क़ुनूत ए नाज़िला पढ़ी है, सूरज और चांद ग्रहण के वक्त नमाज की तरफ जल्दी करने का हुक्म दिया है।
इसी तरह जब बारिश ना होने से लोग परेशान हो तो सलातुल इस्तसक़ा पढ़ने का हुक्म दिया है। जंगे बदर का मौका मुसलमानों के लिए बहुत संगीन और नाजुक था बल्कि यूं कह लें मुसलमानों की छोटी सी जमात के लिए इतना बड़ा खतरा कभी इस्लामी तारीख में नहीं आया और ना आ सकता है। ऐसे मौके से खुद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम अल्लाह से दुआ करते हैं कि अगर मुसलमानों की एक छोटी सी जमात हालाक हो गई तो रोये जमीन पर तेरी इबादत करने वाला कोई नहीं बचा होगा। इस पर परेशानकुन मोके पर बद्र की रात से मुतालिक हजरत अली रजि°अन्हु नबी अलैहिस्सलाम कि कैफियत बयान करते हैं :
खुलासा कलाम यह है कि नमाज एक बहुत ही बड़ा अज़ीम तरीन फरीज़ा है, हम अल्लाह से अहद ले ले कि कभी भी नमाज़ को नहीं छोड़ेंगे, अल्लाह को हमेशा राजी रखेंगे।
अल्लाह हमें पांच वक्त का नमाजी बनाएं। (आमीन)
आपका दीनी भाई
मुहम्मद
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