ईदुल अज़हा (किस्त 06)- परिचय, इतिहास और अहकाम व मसाएल
ईदुल अज़हा /क़ुर्बानी का दिन:
ईदुल अज़हा (बक़रीद) के दिन सुबह सवेरे ग़ुस्ल करना चाहिए, हैसियत के मुताबिक़ अच्छे कपड़े पहनने चाहियें, ख़ुशबू लगाना भी सुन्नत है।
ईदुल अज़हा की नमाज़ से पहले कुछ भी नहीं खाना मुस्तहब है क्योंकि:
عَنْ ابْنِ بُرَيْدَةَ عَنْ أَبِيهِ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ لَا يَخْرُجُ يَوْمَ الْفِطْرِ حَتَّى يَأْكُلَ وَكَانَ لَا يَأْكُلُ يَوْمَ النَّحْرِ حَتَّى يَرْجِعَ
बुरैदा रज़ी अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदुल फ़ितर के दिन जब तक कुछ खा न लेते थे नहीं निकलते थे और ईदुल अज़हा में जब तक ईदगाह से वापिस नहीं आते थे कुछ न खाते थे।
[सुनन इब्ने माजा हदीस 1756/किताबुस सियाम, ईद के नमाज़ से पहले कुछ खाने के सिलसिले में]
इमाम तिर्मिज़ी ने भी इस हदीस को ज़िक्र किया है और इस सिलसिले में यह नतीजा निकाला है:
وَقَدِ اسْتَحَبَّ قَوْمٌ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ أَنْ لَا يَخْرُجَ يَوْمَ الْفِطْرِ حَتَّى يَطْعَمَ شَيْئًا وَيُسْتَحَبُّ لَهُ أَنْ يُفْطِرَ عَلَى تَمْرٍ، وَلَا يَطْعَمَ يَوْمَ الْأَضْحَى حَتَّى يَرْجِعَ.
अहले इल्म की एक जमाअत ने इसे मुस्तहब (पसंदीदा अमल) क़रार दिया कि आदमी ईदुल फ़ितर की नमाज़ के लिए कुछ खाये बेग़ैर न निकले और उस के लिए मुस्तहब है कि वह खुजूर खाये और ईदुल अज़हा के दिन न खाये जब तक ईदगाह से वापिस नहीं आ जाएं।
[सुनन तिर्मिज़ी हदीस 542/ अल जुमतु अन रसुलिल्लाह ईदुल फितर की नमाज़ के लिए निकलने से पहले कुछ खाने के बयान]
ईद की नमाज़ खुले मैदान में अदा करनी चाहिए:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईद की नमाज़ शयेद ही कभी मस्जिद में अदा की हो जो रिवायतें बारिश के हवाले से मिलती है वह भी बहुत कमज़ोर हैं।
नमाज़ के लिये निहायत सुकून व वक़ार के साथ ऊंची आवाज़ से तकबीरात "अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द" पढ़ते हुए जाना चाहिए।
क्या औरतें ईद की नमाज़ में शरीक हो सकती हैं?
ईद की नमाज़ में औरतों को भी शरीक होना चाहिए यहां तक कि अगर कुछ औरतें हैज़ (मासिक धर्म) आने की वजह से नमाज़ न पढ़ सकें तो अलग बैठी रहें लेकिन ईदगाह ज़रूर जायें। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस की ताकीद करते थे;
عَنْ أُمِّ عَطِيَّةَ قَالَتْ أَمَرَنَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْ نُخْرِجَهُنَّ فِي الْفِطْرِ وَالْأَضْحَى الْعَوَاتِقَ وَالْحُيَّضَ وَذَوَاتِ الْخُدُورِ فَأَمَّا الْحُيَّضُ فَيَعْتَزِلْنَ الصَّلَاةَ وَيَشْهَدْنَ الْخَيْرَ وَدَعْوَةَ الْمُسْلِمِينَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِحْدَانَا لَا يَكُونُ لَهَا جِلْبَابٌ قَالَ لِتُلْبِسْهَا أُخْتُهَا مِنْ جِلْبَابِهَا
(صحیح بخاری 2056/ صلاة العيدين » ذكر إباحة خروج النساء في العيدين إلى المصلى وشهود)
उम्मे अतिया रज़ी अल्लाहु अन्है से रिवायत है, वह कहती है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें हुक्म दिया कि "हम ईदुल फ़ितर और ईदुल अज़हा में पर्दा नशीन, हायेज़ा (जो मासिक धर्म में हो) औरतों और कुवांरी लड़कियों को बाहर निकालें, लेकिन हायेज़ा नमाज़ से दूर रहें। वह ख़ैर व बरकत और मुसलमानों की दुआ में शरीक रहें।"
मैंने पूछा: "ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हम में से किसी औरत के पास चादर नहीं होती।"
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, "इस की (कोई मुसलमान) बहन उसको अपनी चादर का एक हिस्सा पहना दे।"
[सही मुस्लिम हदीस 2056/ सलातुल ईदैन, ईदगाह में औरतों के जाने और वहां नमाज़ पढ़ने का बयान]
नमाज़ का वक़्त:
ईद की नमाज़ का वक़्त ज़वाले आफ़ताब (सूरज ढलने) तक है लेकिन नमाज़ में जल्दी करनी चाहिए। बेहतर वक़्त इशराक का है।
ईद की नमाज़ की रिकआत:
ईद की नमाज़ में दो रिकअतें होती हैं जैसा कि:
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ، أَنْبَأَنَا يَزِيدُ بْنُ زِيَادِ بْنِ أَبِي الْجَعْدِ، عَنْ زُبَيْدٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنْ كَعْبِ بْنِ عُجْرَةَ، عَنْ عُمَرَ، قَالَ: صَلَاةُ السَّفَرِ رَكْعَتَانِ، وَصَلَاةُ الْجُمُعَةِ رَكْعَتَانِ، وَالْفِطْرُ وَالْأَضْحَى رَكْعَتَانِ، تَمَامٌ غَيْرُ قَصْرٍ، عَلَى لِسَانِ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ .
"सफ़र की नमाज़ दो रिकअत है, जुमा की नमाज़ दो रिकअत है और ईदुल फ़ितर व ईदुल अज़हा की नमाज़ दो रिकअत है और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बक़ौल यह पूरी हैं अधूरी नहीं हैं।"
[सुनन इब्ने माजा हदीस 1064/किताबु इक़ामतिस सलात वस सुन्नते फ़ीहा, सफ़र में नमाज़ क़सर करने के सिलसिले में]
नमाज़ का तरीक़ा:
ईदुल फ़ितर और ईदुल अज़हा की नमाज़ के दो तरीक़े रायेज हैं:
[1] 12 ज़ायेद (extra) तकबीरों के साथ पहली रिकअत में तकबीरे तहरीमा के बाद और 7 तकबीर क़िरअत से पहले होंगी। और दूसरी रिकअत में क़िरअत शुरू करने से पहले 5 ज़ायेद तकबीरें होंगी। इन बारह ज़ायेद तकबीरों में हर तकबीर पर रफ़ा यदैन करना ज़रूरी है।
أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يُكَبِّرُ فِي الْعِيدَيْنِ فِي الْأُولَى سَبْعًا قَبْلَ الْقِرَاءَةِ وَفِي الْآخِرَةِ خَمْسًا قَبْلَ الْقِرَاءَةِ
(سنن ابن ماجہ / إقامة الصلاة والسنة فيها » ما جاء في كم يكبر الإمام في صلاة العيدين
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदैन की पहली रिकअत में किरअत से पहले सात और दूसरी रिकअत में किरअत से पहले पांच तकबीरें कहा करते थे।
[सुनन इब्ने माजा हदीस 1277/ किताबु इकामतिस सलातु वस सुन्नति फ़िहा, ईदैनकी नमाज़ में कितनी तकबीर कहे -- सुनन तिर्मिज़ी हदीस 536, सुनन अबु दाऊद 1149]
[2] हनफ़ी मसलक के लिहाज़ से पहली रिकअत में सना के बाद 3 ज़ायेद तकबीरें होंगी पहली और दूसरी बार हाथ कानों तक उठायेंगे और छोड़ देंगे तीसरी बार हाथ कानों तक उठाएंगे और फिर बांध लेंगे। ऐसे ही दूसरी रिकअत में सूरह फातिहा और कोई और सूरह पढ़ने के बाद 3 ज़ायेद तकबीरें होंगी उनमें तीनों बार हाथ कानों तक उठाएंगे और छोड़ देंगे। चौथी बार बेगैर हाथ उठाये तकबीर कहते हुए रुकूअ में जायेंगे बाकी नमाज़ और नमाज़ों की तरह होगी।
मशहूर हनफ़ी फ़िक़्ह की किताब "अल हिदाया" में है:
ويصلي الإمام بالناس ركعتين ، يكبر في الأولى للافتتاح وثلاثا بعدها ، ثم يقرأ الفاتحة وسورة ، ويكبر تكبيرة يركع بها . ثم يبتدئ في الركعة الثانية بالقراءة ، ثم يكبر ثلاثا بعدها ، ويكبر رابعة يركع بها )
(الهداية شرح بداية المبتدي للامام برهان الدين ابي الحسن بن أبي بكر المرغيناني المجلد الاول، رقم الصفحه 388 باب صلاة العيدين/ و المختصر القدوری للامام ابو الحسن محمد بن جعفر القدوری باب صلاة العيدين)
इमाम लोगों को दो रिकअत नमाज़ पढ़ाएगा। वह नमाज़ शुरू करने के लिए तकबीर (तकबीरे तहरीमा) कहेगा। उसके बाद 3 तकबीर कहेगा फिर सूरह फ़ातिहा और किसी और सूरह की तिलावत करेगा। फिर तकबीर कहते हुए रुकूअ करेगा फिर (पहली रिकअत पूरी करने के बाद) दूसरी रिकअत में किरअत शुरू करेगा फिर तीन तकबीरें कहेगा।फिर चौथी तकबीर कहते हुए रुकूअ करेगा।
इस की दलील वह अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ी अल्लाहु अन्हु का एक क़ौल बताते हैं।
[बुरहानुद्दीन मर्गीनानी की मशहूर किताब अल हिदायह, किताबुल ईदैन से जिल्द 1 सफ़हा 388]
बाकी नमाज़ आम नमाज़ों की तरह अदा की जाएगी। इस सिलसिले में एक हदीस भी मिलती है
صَلَّى بِنَا رَسُولُ اللهِ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم يَوْمَ عِيدٍ، فَكَبَّرَ أَرْبَعًا أَرْبَعًا، ثم أُقْبَلَ عَلَيْنَا بِوَجْهِه حِين انْصَرَفَ، قالَ: لَا تَنْسَوْا، كتَكبيرِ الْجَنَائز. وأَشَار بِأَصَابِعِه، وقَبَضَ إِبْهَامَه. يَعْني في صَلَاة الْعِيد
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें ईद की नमाज़ पढ़ाई तो चार चार तकबीरें कहीं। फिर सलाम फेर कर हमारी जानिब तवज्जुह की और फ़रमाया; देखो भूल न जाना जनाज़े की तकबीर की तरह है और अपनी उंगलियों के साथ इशारा किया अपने अंगूठे को बंद रखा यानी ईद की नमाज़ में"
[अस सिलसिला अस सहीहा हदीस 774]
ईद की नमाज़ में सुन्नत यह है कि पहली रिकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह अल आला या सूरह काफ़ पढी जाये और दुसरी रिकअत में सूरह ग़ाशिया या सूरह क़मर पढी जाये। याद रहे कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अमल था इस लिए यह पसंदीदा तो है लेकिन हुक्म न होने के सबब लाज़मी (compulsory) नहीं है।
नमाज़ शुरु करने से पहले नमाज़ ईद की नीयत करने का तरीका बताया जाता है। जो इस तरह होता है, "नीयत करता हूं नमाज़े ईद की, वास्ते अल्लाह तआला के म अ ज़ायद तकबीरों के, पीछे इस इमाम के, मुंह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहुअकबर" नीयत का यह तरीक़ा बिदअत है। दुनिया में मौजुद हदीस की तमाम किताबों में से किसी एक में भी इस तरह से नमाज़ की नीयत करने का तरीक़ा नहीं मिलता है। नीयत तो दिल के इरादे का नाम है।
ख़ुत्बा:
जुमे और ईद की नमाज़ में फ़र्क़ यह भी है कि जुमा की नमाज़ में ख़ुत्बा नमाज़ से पहले और ईदैन में नमाज़ के बाद होता है।
ख़ुत्बा भी नमाज़ का हिस्सा है और इसे ग़ौर से सुनना चाहिए और अगर सुनाई न दे तो भी उस दौरान ख़ामोश रहना चाहिए इसलिए नमाज़ के बाद तमाम लोग अपनी अपनी सफ़ों में बैठे रहें।
ख़ुत्बा में नसीहत और दीन की ज़रुरी बातें बताई जाएं इसलिए बेहतर है अवाम की ज़बान में यह नसीहतें की जाएं वरना ख़ुत्बा की जो रुह है वह फ़ना हों जाती है और मक़सद हासिल नहीं होता। कुछ लोगों ने तो इस जानिब पहल की है लेकिन अक्सरियत आज भी सिर्फ़ सुन्नत के ज़ाहिरी पहलू पर नज़र रखे हुए है और एक वजह यह भी है कि लोग ख़ुत्बा के दौरान बातें करते रहते हैं। ईदगाह से घर वापस होते हुए रास्ता बदलना सुन्नत है। और आते हुए भी तकबीर ज़बान पर जारी रहनी चाहिए।
इन शा अल्लाह आगे की बातों का ज़िक्र हम "पार्ट-7" में करेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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