रमजान के महीने की अहमियत और इसकी फ़ाज़िलत को हम सभी जानते है। इस महीने की आमद पर मुस्लिम समाज में तब्दीलियां दिखाई देती है। इंसान अपने आपको इबादत और सदक़ात के लिए तैयार करते हैं और ये महीना है ही खुशीसियत के लिए।
कुछ उलमा लिखते है के रमज़ान लफ्ज़ अरबी के "रामिदा" (رَمِضَ) या "अर-रमद" (الرَمَضُ) से लिया गया है जिसका मतलब है "ख़त्म कर देना" या "मिटा देना" मतलब ये एक ऐसा महीना है जो गुनाहों को मिटा देता है। जैसे आग चीज़ों को जला के ख़त्म कर देती है उसी तरह ये महीना भी हमारे गुनाहों को जला के ख़त्म कर देता है। ये महीना हमें बहुत बड़ा और मैसेज देता है।
ये महीना कुछ ही दिनों की दूरी पर है पर इस उम्मत की बहुत बड़ी अक्सरियत ऐसी है जो इस महीने की फ़ज़ाइल से न वाक़िफ़ है जिसका नतीजा ये होता है के जब ये महीना आ जाता है तो ये समझते हैं इसमें रोज़ा रखना है और थोड़ी ज़्यादह इबादत करनी। पर वो ये नहीं जानते के हम इस महीने से कितने फायदे उठा सकते हैं और न ही वो सीखना चाहते हैं। ये महीना हर साल उनकी ज़िन्दगी में आता है और यूँही चला जाता है, न अमाल में कोई तबदीली दिखती है न इबादतों में।
रमज़ान की तैयारी क्यों करनी चाहिए?
कोई भी काम हो जब हम वो एक बार कर नहीं लेते हमें उसका एक्सपीरियंस नहीं होता इसी तरह रमज़ान में कुछ अमल जैसे नफिल नमाज़ों की पाबन्दी, क़ुरान की तिलावत, लैलतुल क़द्र की रात जागना ये तभी मुमकिन है जब हमें इसकी आदत हो और ये आदत तभी होगी जब हम इसे अमल में लाएंगे।
मिसाल के तौर पर: आप कार चलना सीखना चाहते है तो आप ड्राइविंग स्कूल में एडमिशन लेते हैं जहा 15 दिन से 30 दिन तक का कोर्स होता है। अब ये एक महीने की ट्रेनिंग से आप कार चलना सिख गए। और इस ट्रेनिंग से ये फायदा हुआ के आप जब तक अपने होश ओ हवास है कार चलना नहीं भूलते।
इसी तरह रमज़ान भी एक ट्रैनिंग है जिससे अगर साल भर में हमारे अंदर कोई कमज़ोरी आ गई हो तो हम इसको दूर कर दें। ये एक माह की ट्रेनिंग जो इस्लामिक कैलेंडर से नवें महीने में आता है और इस पुरे महीने में इबादतगुज़ार को देख कर रश्क आता है।
रमजान की तैयारी के लिए कुछ टिप्स-
कोई भी काम हो उसे करने से पहले हम कितनी प्रैक्टिस करते है, उस चीज़ से जुडी हुई बातों को जानने की कोशिश में जुट जाते है, कभी घर के लोगों से उसकी तहक़ीक़ करते है तो कभी मीलों का सफर करके लोगों से मिलते है पर अल्हम्दुलिल्लाह ये टाइम इंटरनेट का है बस एक क्लिक में कितनी डिटेल्स हमें कम वक़्त में मिल जाती है और आर्टिकल भी इसी मक़सद से लिखा जा रहा है की आप को एक ही जगह इतनी डिटेल्स मिल जाये की आपके आने वाले रमज़ान की इबादत अल्लाह क़ुबूल करें। तो आइये देखते है हमें क्या-क्या करना चाहिए जिससे हमारा ये रमज़ान बेस्ट हो जाये-
1. दिल की गन्दगी को साफ़ करना
सिर्फ जिस्म की पाकी ही काफी नहीं है रूह की पाकी भी ज़रूरी है अल्लाह के नज़दीक आने के लिए और रूह की पाकी तभी होगी जब हम अपने दिल को कीना, हसद, बुग्ज़, निफ़ाक़, शिर्क, ज़ुल्म, ज़िना वगैरह से पाक करते हैं। इसलिए जिन पर ज़ुल्म किया, धोखा दिया, गलत किया उनसे माफी मांग लें अगर खुद की माफ़ी चाहते हों तो।
क़ुरान कहता है:
"माफ़ कर देना और दरगुज़र कर लेना चाहिए, क्या तुम नहीं चाहते के अल्लाह ताला तुम्हारे कुसूर माफ़ कर दे।"
[क़ुरान 24: 22]
उमर (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ) को ये कहते सुना गया, "जो भी रहम नहीं करता है उस पर रहम नहीं किया जायेगा। जो शख्स माफ़ नहीं करेगा उसे माफ़ नहीं किया जायेगा और उसकी हिफाज़त नहीं की जाएगी।" [अल-अदब अल-मुफरद 371]
नबी करीम (ﷺ) ने लैलतुल क़द्र की दुआ सिखाई, "या अल्लाह बेशक तू माफ़ करने वाला है, (फराख है) तू माफ़ करना पसंद करता है , तो मुझे माफ़ कर।"
2. रमजान का मक़सद ज़ेहन में रखते हुए तैयारी
रमज़ान की तैयारी शाबान से शुरू कर देनी चाहिए ताकि रमज़ान आते-आते हमारा ज़ेहन हर उस नेक काम के लिए तैयार हो जाये जो हमें खास कर रमजान में करना है क्यों की हम जो करेंगे उसका सवाब सिर्फ हमें मिलेगा इसलिए जैसी हमारी तैयारी होगी वैसा ही सवाब हमारे हिस्से आएगा। अल्लाह ताला फरमाता है:
"और ये के हर इंसान के लिए सिर्फ वही है जिस की कोशिश खुद उस ने की।" [क़ुरआन 53:39]
3. अच्छी आदतों को अपनाना और बुरी आदतों को छोड़ना
एक रिसर्च से पता चलता है की किसी भी आदत को अपनाने में एक इंसान को कम से कम दो महीने (कम से कम 66 दिन) लगते है। अब सवाल ये उठता है अगर हम बुरी आदतों (जैसे लड़ाई-झगड़ा, ग़ीबत, म्यूजिक, नाटक, ज़िना वगैरह) के कायल है तो अचानक से रमजान में अच्छी आदतों को दिल से कैसे अपना सकते है? इसके इलाज ये है के रमज़ान से दो महीने या फिर एक महीने पहले से हम इन बुरी आदतों पर पाबंदियां लगाना शुरू कर दें और रमज़ान आते-आते हम इन आदतों से पूरी तरह बहार निकल कर रमज़ान को खूबसूरत बना लेंगे। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"फ़ितने दिलों पर डालें जाएँगे, चटाई की तरह तिनका-तिनका (एक-एक) करके और जो दिल उन से सैराब कर दिया गया (इस ने उन को क़बूल कर लिया और अपने अन्दर बसा लिया), उस में एक काला नुक़्ता पड़ जाएगा और जिस दिल ने उन को रद्द कर दिया उस में सफ़ेद नुक़्ता पड़ जाएगा यहाँ तक कि दिल दो तरह के हो जाएँगे : (एक दिल) सफ़ेद, चिकने पत्थर के जैसा हो जाएगा, जब तक आसमान और ज़मीन क़ायम रहेंगे , कोई फ़ितना इस को नुक़सान नहीं पहुँचाएगा। दूसरा काला मटयाले रंग का औंधे लोटे के जैसा (जिस पर पानी की बूँद भी नहीं टिकती) जो न किसी नेकी को पहचानने का और न किसी बुराई से इनकार करेगा, सिवाए इस बात के जिसकी ख़ाहिश से वो (दिल) भरा हुआ होगा।" [सहीह मुस्लिम:144]
अच्छी आदतों बनाने के कुछ स्टेप्स:
- छोटे छोटे कामों से शुरुआत करें।
- नजीता क्या होगा ये सोचने के बजाये वक़्त की पाबन्दी पर ध्यान दें।
- कब, कहाँ, कैसे और किसके साथ क्या करना है इसकी एक लिस्ट तैयार करें।
- कोई भी ऐसा काम बीच में न आने दें जिससे आपके बनाये हुए प्लान पर असर पड़े।
- कोई भी अच्छा काम सवाब की नियत से करें इससे तक़वा बढ़ेगा।
- अगर इस दौरान कोई गलती हो गई तो तुरंत अपने प्लान पर तवज्जो दें।
अल्लाह तआला ये नहीं चाहता के हम खुद पर ज़ुल्म करके उसके राज़ी करें बल्कि वो आपकी की गई छोटो छोटी नेकियों में भी राज़ी हो जाता है बस उसकी पाबन्दी की जाये और तकब्बुर जैसी बीमारी से आपका दिल पाक हो। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"अल्लाह की बारगाह में सबसे ज़्यादा पसन्द वो अमल है जिसे पाबन्दी से हमेशा किया जाए चाहे वो कम ही हो।" [बुखारी: 5861]
4. क़ुरान की तिलावत तर्जुमा और तफ़्सीर के साथ
रमज़ान की फ़ज़ीलत को हम इससे भी समझ सकते है इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ। हमें चाहिए के हम पूरी तवज्जोह के साथ इसे पढ़े, समझे और इस पर अमल करें। अल्लाह तआला फरमाता है:
"रमज़ान वो महीना है जिसमें कुरान नाज़िल हुआ जो लोगों का रहनुमा है (जिसमे) हिदायत की खुली निशानिया हैं और जो (हक़ और बातिल) को अलग अलग करने वाला है" [क़ुरआन 2:185]
अगर हम रमज़ान में क़ुरान पढ़ना शुरू करते है तो हमारी स्पीड बहुत कम होती है जिससे नुकसान ये होता है के हम क़ुरान मुकम्मल नहीं कर पाते। अगर हम एक या दो माह पहले से क़ुरान पढ़ना शुरू कर दें तो इन शा अल्लाह रमज़ान में अच्छी स्पीड में पढ़ सकते हैं। चूंकि शाबान रमजान से पहले आता है तो जिस तरह रमज़ान में क़ुरान ए तिलावत और रोज़े का हुक्म इसी तरह शाबान में भी इसकी बड़ी अहमियत है इसलिए चाहिए के हम इस महीने में तैयारी करें जैसा के सहाबा किया करते थे।
सलमाह इब्न कुहैल कहते थे:
"शाबान का महीना पढ़ने वालों का महीना है।"
अबू बक्र अल-बल्की ने कहा:
“रजब बीज बोने का महीना है; शाबान फ़सल की सिंचाई का महीना है; और रमजान फ़सल काटने का महीना है।”
5. बच्चो को रोज़ा रखवाना
बच्चा वही करता है जो अपने बड़ो को करते देखता है। अगर हम चाहते है हमारा बच्चा नेक बने तो हमें भी नेकी के काम करने होंगे। इसी तरह हम चाहते है हमारा बच्चा पूरे रोज़े रखे तो हमें भी इसका एहतेराम करना चाहिए और उन्हें सात-आठ साल की उम्र से रोज़ा रखने की हिदायत करनी चाहिए जिससे उसकी प्रैक्टिस हो सके। अगर सातवे साल में वो दो-चार रोज़े रखता है तो नवे साल में दस रोज़े और इन शा अल्लाह जब उसपर रोज़े फ़र्ज़ हो जायेंगे तो वो पूरे रोज़े रख लेगा।
6. नफिल रोज़ा रखना
आयशा (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهَا) फरमाती है, "रोज़े रखने के लिए रसूलुल्लाह ﷺ को शाबान का महीना सबसे ज़्यादा पसंद था फिर आप (ﷺ) इसे रमज़ान ही में मिला देते थे।" [अबू दावूद 2431]
रमजान के रोज़े की तैयारी हमें शाबान में नफिल रोज़ों से शुरू कर देनी चाहिए पर ये नहीं के आखीर शाबान तक रोज़ा रखे और कमज़ोर पड़ जाये की रमज़ान के रोज़े छूट जाएं। औरतों को चाहिए के वो अपने छूटे हुए रोज़े इसी महीने में पूरे कर लें। हज़रत आयशा (रज़ि०) से रिवायत हुई है कि,
"हम बीवियों में से किसी एक को रमज़ान मुबारक के कुछ रोज़े (हैज़ की बिना पर) छोड़ने पड़ते थे वो उनकी क़ज़ा नहीं दे सकती थी यहाँ तक कि शाबान आ जाता। रसूलुल्लाह ﷺ किसी महीने में इतने रोज़े न रखते थे जितने शाबान में रखते थे सिर्फ़ कुछ दिन छोड़ कर बाक़ी रोज़े रखते थे बल्कि (यही कह लीजिये कि) सारा महीना ही रोज़े रखते थे।" [नसाई: 2180]
सहाबा (رضي الله عنهم) शाबान में रोज़ा रखकर रमज़ान की प्रैक्टिस शुरू कर देते थे। रसूलुल्लाह ﷺ इससे मना करते थे कही वो कमज़ोर न हो जाये। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जब निस्फ़ शाबान आए तो रोज़े न रखो।" [अबू दावूद: 2337]
7. रमजान में उमरा की तैयारी
हमारे माली हालात ऐसे हों की हम हज को ना जा सके पर उमरा कर सकते हैं जो की हज के मुकाबले आसान है जिसमे रकम और वक़्त कम लगता है। पता नहीं कब हम पर कौन सी मुसीबत आ जाये के हम उमरा से भी महरूम कर दिए जाये इसलिए हमें चाहिए के हम रमजान के महीने में उमरा करे जिसका सवाब रसूल अल्लाह ﷺ ने हज के बराबर बताया है:
"बेशक, रमजान के उमरा करना हज के बराबर है।" [सहीह बुखारी 1782]
8. कसरत से दुआ करें
लोग अक्सर दुआ करने में सुस्ती महसूस करते है और ये सुस्ती अक्सर रमज़ान में भी देखी जाती है। वजह ये है की हम दुआ कसरत से नहीं मांगते, हमें चाहिए के चलते फिरते,उठते बैठते कसरत से दुआ मांगते रहे। कुछ लोग इसलिए भी दुआ नहीं मांगते के उनकी दुआ पूरी नहीं होती, तो आप जान लें अल्लाह तआला फरमाता है:
"और ऐ नबी! मेरे बन्दे अगर तुमसे मेरे बारे में पूछें तो उन्हें बता दो कि मैं उनसे क़रीब ही हूँ। पुकारनेवाला जब मुझे पुकारता है, मैं उसकी पुकार सुनता और जवाब देता हूँ।" [क़ुरआन 2:186]
"जब एक मुस्लमान दुआ करता है तो उसके साथ तीन में से एक चीज़ होती है, या तो दुआ क़ुबूल हो जाएगी या तो वो दुआ उसकी आख़िरत के लिए जमा कर दी जाएगी। या तो जो उस पर परेशानी आने वाली थी टल जाएगी। इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा दिल से दुआएं मांगनी चाहिए।" [अल-अदब अल-मुफरद: 547]
9. नेक अमाल में इज़ाफ़ा
नमाज़, इबादत, सदक़ा, सिला रहमी वगैरह में इज़ाफ़ा करें। कोई भी चीज़ करने से उसमे इज़ाफ़ा होता है और रमजान में ये सारी चीज़ें बढ़ सके इसके लिए हम शाबान से ही इसकी तैयारी शुरू कर दें। सदक़ा देने की एक आदत बना लें सिर्फ रमजान में ही नहीं बल्कि हर महीने में जब भी आपको लगे आप किसी की मदद कर सकते है करें। माल देने से बढ़ता है जैसे दूसरे अमल करने से तजुर्बा बढ़ता है और सवाब मिलता है। गरीब आपसे मदद मांग लेता है पर मिस्कीन नहीं मांगता इसलिए मिस्कीनों को तलाश करके उसकी मदद करें। वो आपका पड़ोसी, रिश्तेदार और आपका दोस्त भी हो सकता है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"मिस्कीन वो नहीं जिस को एक खजूर दो खजूरें या एक लुक़मा दो लुक़मे वापस कर दें बल्कि मिस्कीन वो है जो ज़रूरत मन्द होने के बावजूद माँगने से परहेज़ करे।" [नसाई 2572; सहीह]
10. रात में किस तरह इबादत करें
पूरे दिन का रोज़ा फिर रात को इबादत, ये बहुत मुश्किल हो जाता है लेकिन उसके लिए बहुत आसान है जो पहले से रात की इबादत के आदी होते है। अगर हम भी रमजान में रात में इबादत करना चाहते है तो हमें इन बातों पर अमल करना चाहिए:
- रात का खाना हल्का और हेल्थी हो, खाने के बाद टहलें।
- खाना खाते वक़्त दिल में रखें के ये खाना हमें ताक़त दे की हम इबादत कर सकें और सहरी के वक़्त उठ सके।
- सोते वक़्त ये सोचे के मुझे जल्दी नींद आये के मै वक़्त पे उठ सकूँ।
- नींद न आने पर दुआ पढ़ें की नींद आ जाये।
- घर या बाहर के काम जल्दी निबटा लें।
- कोशिश करें के रमजान से पहले सरे एक्स्ट्रा काम खत्म कर लें कि सारी एनर्जी इबादत में लगे।
- घर की सफाई और खरीदारी से फ़ारिग़ हो जाएं ताकि ज़ेहन शांत रहे।
अफ़सोस की बात है की इस एक महीने के बाद जब दूसरा महीना आता है तो ज़्यादातर लोग ऐसा हो जाता है जैसे वो इस महीने से गुज़रे ही नहीं। एक चाँद ऐसा आता है के मस्जिदों में जगह नहीं होती, लोग सड़कों पर मुसल्ले बिछाते है और एक महीना ऐसा भी आता है के इमाम को रोज़ाना पांच वक़्त लोगों का इंतज़ार करना पड़ता है और उसका इंतज़ार एक साल बाद खत्म होता है। रमजान का मतलब है दिल को बदल देना पर अफ़सोस इसके ख़तम होते ही लोगों के दिल भी बदल जाते हैं।
हमारी खास तौर पर जो तैयारी होती है वो घर को सजाना, कौन सा पेंट हो, परदे किस रंग के हों, कपडे नई डिज़ाइन के होने चाहिए जो के रमजान के लास्ट में मार्किट में आएंगे, इफ्तार में क्या खाना है सहरी में क्या चाहिए, ये सारी तैयारी हम कर लेते है पर जो ज़रूरी है उसे पीछे छोड़ देते है।
रोज़े रखने का एक मक़सद है, हम अल्लाह का डर और तक़वा इख़्तियार करें। इसलिए हमें ये सोच कर हर अमल करना चाहिए के ये जो रमज़ान आये वो हमारे अंदर परमानेंट चेंज लाय, हमारे दिल की दुनिया बदल दे, हमारे मामलात बदल जाये, ज़िक्र ओ अज़कार, तिलावत ए क़ुरान, सदक़ा खैरात जो हमने रमजान में किये वो रमज़ान बाद भी जारी रहे।
अल्लाह रहम करे हम मुसलमानो पर और हमें रमजान की इबादत और उसके अजर की समझ अता करे।
Posted By: Islamic Theology
1 टिप्पणियाँ
Bahut achi knowledge
जवाब देंहटाएंAllah hm sabko amal krne ki taufiq naseeb farmay
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।