Akhirat ka inkaar, Khuda (God) Ka inkaar hai

Akhirat ka inkaar, Khuda (God) Ka Inkaar

आख़िरत का इनकार करना ख़ुदा का इनकार है


जो शख्स भी ख़ुदा को मानता हो लेकिन मरने के बाद की दूसरी जिंदगी यानी आख़िरत का इनकार करता हो तो वह दरहकीकत में ख़ुदा का भी इनकार करता है ख़ुदा की कुदरत और ख़ुदा की हिकमत का इनकार करता है।

ख़ुदा की कुदरत का इनकार करना ये हुआ कि इंसान ये समझे कि ख़ुदा उसे फिर से जिंदगी देने की कुदरत नहीं रखता। वो ये समझता है कि जिस ख़ुदा ने उसे पहली बार बनाया है पूरी कायनात को बनाया है और जमीन और आसमानों के दरमियान जितनी चीज़ें है सबका बनाने वाला है। वो ख़ुदा मरने के बाद फिर से उसे जिंदगी देने की कुदरत नहीं रखता है।

जरा सोचें, जो ख़ुदा पूरी कायनात को बनाने की ताकत रखता है तो क्या वह इंसान को फिर से जिंदगी देने की ताकत नहीं रखता? 

इसलिए ही, जो लोग भी मरने के बाद दूसरी जिंदगी यानी आख़िरत का इनकार करते है वो असल में ख़ुदा का ही इनकार करते है।

ख़ुदा की हिक्मत का इनकार करना ये हुआ कि इंसान ये समझे की मरने के बाद मुझसे किसी चीज के बारे में भी पूछ गच्छ नहीं होगी, मैं इस दुनिया में कितना ही जुल्म और ज़्यादती करू कोई मुझसे पूछने वाला नहीं है।

जरा सोचें जिस ख़ुदा ने इतनी बड़ी कायनात बनाकर और उस कायनात के एक छोटे से गोले यानी दुनिया पर इंसान को बसाया और इस दुनिया की एक एक चीज को इंसान की खिदमत में लगा दिया और इसके साथ ही इंसान को इस दुनिया में पूरा इख्तियार भी दे दिया कि वह जो मर्ज़ी चाहे इस दुनिया में करे कोई उसका हाथ पकड़ने वाला नहीं।

और इंसान को नेकी और बुराई चुनने की पूरी आजादी दे दी गई और साथ ही नेकी और बुराई की पहचान ख़ुदा ने इंसान के अंदर ही रख दी है। इंसान अगर इन सब चीजों पर गौर करे तो वह सिर्फ एक ही नतीजे पर पहुंचता है कि ख़ुदा ने इंसान को हिक्मत के साथ ही इस दुनिया में बसाया है, हिक्मत के तहत ही उसके अंदर नेकी और बुराई की समझ रखी है और उसे नेकी और बुराई चुनने की पूरी आजादी दी है। अब अगर कोई इंसान ये समझें की ख़ुदा मरने के बाद उससे कोई पूछ गच्छ नहीं करेगा, इतने इख्तियार देने के बाद उससे हिसाब किताब नहीं लेगा, वो इंसान ये समझता है कि ख़ुदा ने ये सब कुछ फिजूल और बेमकसद ही बनाया है तो वह ख़ुदा की हिक्मत का इनकार कर रहा है। इसलिए जो लोग भी मरने के बाद दूसरी जिंदगी यानी आख़िरत का इनकार करते है वो असल में ख़ुदा का ही इनकार करते है।

जैसा की अल्लाह ने अपने आखिरी पैगाम कुरआन में कहा है कि:


وَ اِنۡ تَعۡجَبۡ فَعَجَبٌ قَوۡلُہُمۡ ءَ اِذَا کُنَّا تُرٰبًا ءَ اِنَّا لَفِیۡ خَلۡقٍ جَدِیۡدٍ ۬ ؕ اُولٰٓئِکَ الَّذِیۡنَ کَفَرُوۡا بِرَبِّہِمۡ ۚ وَ اُولٰٓئِکَ الۡاَغۡلٰلُ فِیۡۤ اَعۡنَاقِہِمۡ ۚ وَ اُولٰٓئِکَ اَصۡحٰبُ النَّارِ ۚ ہُمۡ فِیۡہَا خٰلِدُوۡنَ

अब अगर तुम्हें ताज्जुब करना है तो ताज्जुब के क़ाबिल लोगों का ये कहना है कि “जब हम मरकर मिट्टी हो जाएँगे तो क्या हम नए सिरे से पैदा किए जाएँगे?” ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने रब के साथ इनकार का रवैया अपनाया है। [कुरआन 13:5]


यानी लोगों का आख़िरत (मरने के बाद दूसरी जिंदगी) से इनकार अस्ल में ख़ुदा से और उसकी क़ुदरत और हिकमत से इनकार है। आख़िरत के इंकारी सिर्फ़ इतना ही नहीं कहते कि हमारा मिट्टी में मिल जाने के बाद दोबारा पैदा होना नामुमकिन है, बल्कि उनकी इसी बात में ये ख़याल भी छिपा है कि अल्लाह की पनाह वो ख़ुदा मजबूर और बेबस और नादान व नासमझ है जिसने उनको पैदा किया है। नउज़ूबिलह

आख़िरत (मरने के बाद दूसरी जिंदगी) से इनकार करने को अल्लाह ने अपना इनकार बताया है और इसी बात को अल्लाह ने सूरह कहफ में दो बाग वालों का जिक्र करते हुए यू बयान किया है कि:


ऐ नबी! "इनके सामने एक मिसाल पेश करो। दो आदमी थे। उनमें से एक को हमने अंगूर के दो बाग़ दिये और उनके चारों तरफ़ खजूर के पेड़ों की बाड़ लगाईं और उनके बीच खेती की ज़मीन रखी।

दोनों बाग़ ख़ूब फले-फूले और फलदार होने में उन्होंने कोई कमी न छोड़ी। उन बाग़ों के अन्दर हमने एक नहर जारी कर दी। और उसे ख़ूब फ़ायदा हासिल हुआ। ये कुछ पाकर एक दिन वो अपने पड़ोसी से बात करते हुए बोला, “मैं तुझसे ज़्यादा मालदार हूँ और तुझसे ज़्यादा लोगों की ताक़त मुझे हासिल है।” फिर वो अपने बाग़ में दाख़िल हुआ और ख़ुद अपने हक़ में ज़ालिम बनकर कहने लगा, मैं नहीं समझता कि ये दौलत कभी ख़त्म हो जाएगी और मुझे उम्मीद नहीं कि क़ियामत की घड़ी कभी आएगी। फिर भी अगर कभी मुझे अपने रब के पास पलटाया भी गया, तो ज़रूर इससे भी ज़्यादा शानदार जगह पाऊँगा।

उसके पड़ोसी ने बातें करते हुए उससे कहा, "क्या तू कुफ़्र (इनकार) करता है, उस ज़ात से जिसने तुझे मिट्टी से और फिर नुत्फ़े (वीर्य) से पैदा किया और तुझे एक पूरा आदमी बना खड़ा किया?" [कुरआन 18:32-37]


हालाँकि उस शख़्स ने ख़ुदा के वुजूद से इनकार नहीं किया था, बल्कि अगर मुझे मेरे रब की तरफ़ पलटाया भी गया के अलफ़ाज़ ज़ाहिर करते हैं कि वो ख़ुदा के वुजूद को मानता था, लेकिन इसके बावजूद उसके पड़ोसी ने उसे अल्लाह के इनकार का मुजरिम ठहराया। इसकी वजह ये है कि अल्लाह के साथ कुफ़्र सिर्फ़ उसके वुजूद से इनकार ही का नाम नहीं है, बल्कि घमंड, फ़ख़्र पर आख़िरत का इनकार भी अल्लाह से कुफ़्र ही है। जिसने ये समझा कि बस मैं ही हूँ, मेरी दौलत और शानो-शौकत किसी की दी हुई नहीं, बल्कि मेरी ताक़त और क़ाबिलियत का नतीजा है, और मेरी दौलत ख़त्म होनेवाली नहीं, कोई उसको मुझसे छीननेवाला नहीं और किसी के सामने मुझे हिसाब देना नहीं, वो अगर ख़ुदा को मानता भी है तो सिर्फ़ एक वुजूद की हैसियत से मानता है अपने मालिक और आका और हाकिम की हैसियत से नहीं मानता। हालाँकि अल्लाह पर ईमान इसी हैसियत से ख़ुदा को मानना है, न कि सिर्फ़ एक मौजूद हस्ती की हैसियत से।





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