Qiyam ul lail ke talluq se kuch galatfehmiyan

 

Qiyam ul lail ke talluq se kuch galatfehmiyan

कियामल लैल (night prayer)

कियामुल लैल यानि नफिल नमाज़ जो बंदा ईशा के बाद रात के किसी भी हिस्से में अदा करता है।

"ऐ नबी (ﷺ)! तुम्हारा रब जानता है कि तुम कभी दो तिहाई रात के क़रीब और कभी आधी रात और कभी एक तिहाई रात इबादत में खड़े रहते हो, और तुम्हारे साथियों में से भी एक गरोह ये अमल करता है। अल्लाह ही रात और दिन के औक़ात का हिसाब रखता है, उसे मालूम है कि तुम लोग औक़ात की ठीक गिनती नहीं कर सकते, लिहाज़ा उसने तुमपर मेहरबानी की, अब जितना क़ुरआन आसानी से पढ़ सकते हो पढ़ लिया करो।" [क़ुरान 73.20]

▪️ हमें उतना ही पढ़ना चाहिए जितना हम आसानी से पढ़ सकते हैं। क्यों कि अज्र तो हमें अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से मिलना है और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसका हिसाब रखता है।


कियामुल लैल के ताल्लुक़ से कुछ ग़लतफहमियां

रात की नमाज़ कितनी रकात पढ़नी चाहिए? तो देखते हैं इस ताल्लुक से नबी करीम ﷺ की सुन्नत क्या थी?

तरावीह 8 या 20 रकात पढ़नी चाहिए?

अक्सर ग़लतफ़हमियां या कश्मोकश (confusion) कम इल्मी की बिना पर होती हैं यानि हम ख़ुद हक़ को जानने के बजाए दूसरों की ज़ुबानी सुन कर और उसे ही सच मान कर उस पर अमल करना शुरू कर देतें हैं। और सबसे अजीब बात ये है कि ऐसा सिर्फ़ दीन (इस्लाम) की बातों में ही होता है, वरना साइंस वगैरा में तो अगर कोई कुछ गलत बात पढ़ा दे तो उससे पढ़ना ही नहीं छोड़ते हैं बल्कि औरों को भी मना कर देते हैं और इस्लाम का सहीह अहकाम बताने वाला ही दुश्मन बन जाता है। 

ऐसी ही एक ग़लतफ़हमी या कश्मोकश तरावीह के हवाले से बहुत आम है, आईए अहादीस की रौशनी हक़ जानने की कोशिश करते हैं;

अम्मा आयशा (रज़ी०) से पूछा गया, नबी करीम ﷺ (तरावीह या तहज्जुद की नमाज़) रकाअत में कितनी रकाअत पढ़ते थे? तो उन्होंने बताया, "रमज़ान हो या कोई और महीना आप 11 रकाअतों से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे। आप ﷺ पहली चार रकाअत पढ़ते, तुम उनके हुस्न वा खूबी और तूल का हाल ना पूछो फिर चार रकाअत पढ़ते तुम उनके हुस्न वा खूबी और तूल का हाल ना पूछो, आख़िर में तीन रकाअत (वित्र) पढ़ते।" [सहीह बुखारी:2013]


▪️इस हदीस से ये बात साफ़ होती है कि नबी करीम ﷺ रमज़ान हो या गैर रमज़ान आप ﷺ रात में सिर्फ़ आठ रकात नफिल नमाज़ पढ़ते थें। यानि तहज्जुद और तरावीह एक ही नमाज़ हैं रमज़ान में तहज्जुद की अहमियत और बढ़ जाती है यानि इसे बा जमाअत अदा किया जाता है।

▪️एक और बात वाज़ेह होती है, नबी करीम ﷺ रमज़ान के महीने में नफिल नमाज़ की रकात को तूल नहीं दिया बल्कि उनके क़याम को तूल दिया करते थें। नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "सबसे बेहतरीन नमाज़ वो है जिसमें क़ायम को तूल दिया जाए।" [सहीह मुस्लिम:756a]

▪️ इस हदीस से ये साबित होते है कि बहुत आला अंदाज़ में किरात करते थें। नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "जो शख़्स अच्छे अंदाज़ से नहीं पढ़ता है, वो हम में से नहीं।" [सुन्न अबु दाऊद:1471]

▪️ और हम लोग क्या कर रहे हैं? क़ुरआन इस तरह पढ़ते हैं कि ख़ुद को नहीं पता होता होगा कि क्या पढ़ रहे हैं। जबकि फ़रमाने रसूल है; "अपनी आवाज़ से क़ुरआन को ज़ीनत दो।" [सुन्न अबु दाऊद:1468]

▪️वित्र को आख़िरी नमाज़ रखते।


नोट:-  11 रकातों में 8 तहज्जुद/तरावीह (नफिल) + 3 वित्र


हज़रत अबुज़र (रज़ी०) रियावत करते हैं,

हमनें नबी करीम ﷺ के साथ रमज़ान के रोज़े रखें लेकिन आप ﷺ ने उस महीने में किसी वक्त भी रात को नमाज़ के लिए नहीं उठाया जब तक कि सात रातें बाक़ी ना रहें। फिर आप ने हमें नमाज़ के लिए उठाया यहां तक कि एक तिहाई रात गुज़र गई। जब छठी बाक़ी रह गई तो उन्होंने ने हमें नमाज़ के लिए नहीं उठाया। जब पांचवीं रात बाक़ी रह गई तो आप ने हमें नमाज़ में खड़ा किया यहां तक की रात का निस्फ (आधा) रह गया। तो मैंने अर्ज़ किया; अल्लाह के रसूल, काश आपने आज की पुरी रात में हमें नमाज़ पढ़ाई होती।

आप ﷺ ने फ़रमाया: जब आदमी इमाम के साथ नमाज़ पढ़ता है यहां तक कि वो चला जाता है तो इसने पुरी रात इबादत में गुजारी। चौथी रात बाक़ी रह गई उन्होंने हमें उठने पर मजबूर नहीं किया। जब तीसरी रात आई तो आप ने अपने अहलो अयाल और लोगों को जमा किया और हमारे साथ नमाज़ पढ़ी यहां तक कि हमें अंदेशा हुआ कि हम फलाह (कामयाबी) से महरूम हो जाएंगे।

मैंने कहा फलाह क्या है? 

फ़रमाया सेहरी से पहले खाना। 

फिर उन्होंने हमें बाक़ी महीने में नमाज़ के लिए नहीं उठाया।

[सुन्न निसाई:1364]


▪️इस हदीस से ये वाज़ेह होता है, नबी करीम ﷺ ने नमाज़ ए तारावीह की जमाअत पे हमेशगी नहीं दी।


नबी करीम ﷺ ने मस्जिद में चटाई से घेर कर एक कमरा बनाया, और आपने इसमें कई रातें नमाज़े पढ़ें। यहां तक कि लोग आपके पास जमा होने लगें, फिर इन लोगों ने एक रात आप ﷺ की आवाज़ नहीं सुनी, वो समझे आप सो गए, तो इन लोगों ने खखारने लगे, ताकि आप ﷺ इनकी तरफ़ निकलें। 

आप ﷺ ने फ़रमाया: मैंने इस काम में तुम्हें बराबर लगा देखा तो डरा कि कहीं वो तुम पर फ़र्ज़ ना कर दी गई, तो तुम इसे अदा नहीं कर सकोगे, तो अपने घरों में नमाज़े (नफिल) पढ़ा करो, क्योंकि आदमी की सबसे अफ़ज़ल नमाज़ (नफिल) वो है जो उसके घर में हो सिवाय फ़र्ज़ नमाज़ के। 

[सुन्न नसाई:1600]


▪️ये हदीस रमज़ान के ताल्लुक से ही है लेकिन नबी करीम ﷺ लोगों की इमामत नहीं किया और कहा घर बेहतरीन नफिल नमाज़ वही है जो घर में अदा की जाए।

▪️ और अपने घर (बीवियों) वालों को भी शामिल किया।

▪️ लेकिन अगर ईमाम के साथ आधी रात भी कियाम किया तो पुरी रात कियाम का सवाब मिलता है।


अब्दुर रहमान कहते हैं कि मैं रमज़ान की एक रात उमर बिन खत्ताब (रज़ी०) के साथ मस्जिद में गया तो देखा कि लोग मुख्तालिफ गिरोहों में नमाज़ पढ़ रहें हैं, एक आदमी अकेला नमाज़ पढ़ रहा है या कोई आदमी थोड़ा सा नमाज़ पढ़ रहा है, तो उमर (रज़ी०) ने कहा मेरे ख्याल में इन लोगों को एक क़ारी की इमामत में जमा करना बेहतर है (यानि इन्हें बा जमाअत नमाज़ अदा करने दें) चुनांचा आपने फ़ैसला किया। इन्हें अबी बिन कआब के पीछे जमा करो, फिर दूसरी रात में दुबारा इनके पास गए और लोग क़ारी के पीछे नमाज़ पढ़ रहे थे। इस पर उमर (रज़ी०) ने कहा कि ये कितनी अच्छी बिदआत है। लेकिन वो नमाज़ जिसको वो अदा नहीं करते बल्कि इस वक्त पर सोते हैं इससे बेहतर है जो वो पढ़ रहें हैं (इससे मुराद रात के आख़िरी हिस्से में नमाज़ है), (इन दोनों) लोग रात के इब्तेदाई हिस्से में नमाज़ पढ़ा करते थें।

[सहीह बुखारी:2010]


अल्लामा इब्ने अबि अल अज़र हन्फी (वफात 792 हिजरी) फरमाते हैं: 

सैयदना उमर (रज़ी०) के फरमान, "या ताज़दीद क्या खूब है" (मतलब ये अच्छी बिदअत है) से भी यही दलील ली जाती है हालांकि ये इस्तेदलाल दुरुस्त नहीं।

नबी ﷺ ने फ़रमाया, "हर बिद’अत गुमराही है" आप ﷺ का ये फ़रमान आम हैं इससे कुछ मुस्तसना (Exception) नहीं।" [अत तंबीहा अला मुश्कलत अल हिदायाह लिल इब्ने अल अज़र अल हंफी 01/549,550,551]*


नमाज़ ऐ तरावीह बिदअत ऐ शरई नही बिद’ अत ऐ लुग़वी है?

▪️इमाम बहियिकी (रहमतुल्लाह अलैह) (वफात 458 हिजरी)फरमाते हैं: 

"सैय्यदना उमर (रज़ी०) का ये कदम किताब वा सुन्नत और इजमा के खिलाफ नहीं था लिहाज़ा ये गुमराही वाली बिदअत नहीं बल्कि ये ऐसी भलाई आई थी जिसकी असल सुन्नत ऐ रसूल ﷺ में मौजूद थी।" [अल सुन्न अस सगीर लिल बहीयिकी रा जिल्द:1, सफा:297, हदीस:817]


खुलासा ए कलाम

हज़रत ने उमर (रज़ी०) जो बिदअत कहा वो लुगवी माना में था, क्योंकि तरावीह की जमात नबी करीम ﷺ से साबित थी तो जब जो काम नबी करीम ﷺ से साबित हो उसको हज़रत उमर बिदअत नहीं कह सकते। 

जब हज़रत उमर (रज़ी०) ने देखा सब अलग अलग क़ुरआन पढ़ रहें हैं तो हज़रत उमर (रज़ी०) अगले दिन देखा सब एक ईमान के पीछे नमाज़ पढ़ रहें हैं तो इसको उन्होंने कहा क्या ही अच्छी बिदअत है।

अरबी ज़बान में हर नए काम को बिदअत कहते हैं।

मान लें एक जगह बिल्डिंग नहीं थी बाद में बन गई अरबी में बिल्डिंग को कहेंगे ये बिल्डिंग बिदअत है।


रमज़ान में क्यामुल लैल (तरावीह या तहज्जुद) की अहमियत


"जो अपने रब के आगे सज्दे में और खड़े होकर रातें गुज़ारते हैं।" [क़ुरान  25.64]

▪️ इस आयत का सही मफ़हूम इससे पहले वाली आयत के साथ देखने पर पता चलता है।

 ▪️अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कहता हकीकी बंदे वही हैं जो रात में अपने रब के आगे सज्दे में रातें गुज़ारतें हैं। नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "जिसने रमज़ान की रातों में (बेदार रह कर) नमाज़ तरावीह पढ़ी, ईमान और सवाब की नियत के साथ, इसके अगले तमाम गुनाह माफ हो जाएंगे।" [सहीह बुखारी:2009]

▪️ किसी भी बात (दीनी) पर जब इख्तेफाल होता है तो हम उस अहकाम की अहमियत को नज़र अंदाज़ करके अपनी अपनी दलीलों से ख़ुद को सही और दूसरों को गलत दिखाना शुरू हो जाते हैं।

▪️ ये बात वाज़ेह रहे, हमारी दलील सिर्फ़ नबी करीम ﷺ की तालीम और तरबियत है। अगर हम हक़ पे हैं तो हमारा अंदाज़ भी नबी करीम ﷺ के जैसा होना चाहिए और ये ज़रूरी नहीं कि हमारी ज़बान से अदा हुई बात लोगों पर उसी तरह असर अंदाज़ हो जैसा हम चाहें। नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "जो शख़्स हक़ पर होते हुए भी झगड़ा छोड़ दे तो मैं उसे जन्नत के बीच में घर बनाने का ज़ामिन हूं।" [सुन्न इब्ने माजा:51]

▪️ये भी नबी करीम ﷺ की तरबियत है जिसे हमें मल्हूज़ ए खातिर (considration) रखना चाहिए।

▪️और अगर कोई आपको हक़ बता रहा है तो एक बार सब्र और तहम्मुल से उसे सुने, और ख़ुद उसकी तहकीक करें फिर अमल करने के लिए आप आज़ाद हैं।

▪️ ऊपर बयान की गई हदीस की अहमियत को समझें और अमल और करने की कोशिश करें।

▪️ रमज़ान में कियामुल लैल की अहमियत और बढ़ जाती है, यानि अगर सवाब की नियत कियाम करें तो पिछले सारे गुनाह बख़्श दिए जाते हैं।

▪️वाज़ेह रहे सिर्फ़ सगीरा गुनाह माफ़ किए जाते हैं। कबीरा गुनाहों के लिए तौबा ज़रूरी है।


क्या 8 रकात से ज़्यादा पढ़ सकते हैं?

इसे भी हदीस की रौशनी में जानने की कोशिश करते हैं!

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"रात की नमाज़ दो-दो रकाअत है फिर जब कोई सुबह हो जाने से डरे तो एक रकाअत पढ़ ले, वो उसकी सारी नमाज़ को ताक (odd) बना देगी।" [सहीह बुखारी: 990]


▪️अगर हम नबी करीम ﷺ की सुन्नत देखेंगे तो आप ﷺ रात की नमाज़ सिर्फ़ 8 रकात ही पढ़ी है जिसे हमने ऊपर हदीस की रौशनी में देखा।

▪️ लेकिन इस हदीस से साबित होते है कि आप ﷺ ने कियामुल लैल की नमाज़ में कोई हद नहीं मुकर्रर किया। 

▪️ बेशक कोई चाहे तो वो 8 रकात से ज़्यादा पढ़ सकता है। लेकिन 20 रकात की कहीं कोई दलील नहीं है।

▪️ अपने अमल को सही साबित करने के लिए, बिना हक़ जाने किसी भी बात को दलील बना कर ना पेश करें।

▪️ फिर आख़िर में आप ताक (1,3,5,7) नंबर में वित्र अदा कर के पूरी नमाज़ को ताक बना दें।


अहमद बज़्मी

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