Karmon (amaal) ka badla zaroor milna hai

Karmon (amaal) ka badla zaroor milna hai


कर्मों (आमाल) का बदला जरूर मिलना है

क्या इंसान जो इस दुनिया में कर्म (आमाल) कर रहा है क्या उसका बदला उसे मिलेगा या नहीं? आईए इस सवाल को अल्लाह के आखिरी संदेश कुरआन से समझते है, अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि: 


وَالذّٰرِیٰتِ ذَرۡوًا ۙ فَالۡحٰمِلٰتِ وِقۡرًا فَالۡجٰرِیٰتِ یُسۡرًا ۙ فَالۡمُقَسِّمٰتِ اَمۡرًا ۙ اِنَّمَا تُوۡعَدُوۡنَ لَصَادِقٌ ۙ وَّ اِنَّ الدِّیۡنَ لَوَاقِعٌ ؕ
क़सम है उन हवाओं की जो गर्द उड़ानेवाली हैं, फिर पानी से लदे हुए बादल उठाने वाली हैं, फिर तेज़ रफ़्तारी के साथ चलनेवाली हैं, फिर एक बड़े काम (बारिश) की तक़सीम करने वाली हैं, हक़ ये है कि जिस चीज़ का तुम्हें ख़ौफ़ दिलाया जा रहा है वो सच्ची है और आमाल की जज़ा ज़रूर पेश आनी है।
[कुरआन 51:1-6]


अल्लाह ने यहां बताया है कि इंसान के आमाल का बदला उसे जरूर मिलकर रहेगा और यही वो बात है जिस पर क़सम खाई गई है। इस क़सम का मतलब ये है के जिस बेनज़ीर नज़्म और बक़ायदगी के साथ बारिश का ये अज़ीमुश्शान ज़ाब्ता तुम्हारी आँखों के सामने चल रहा है, और जो हिकमत और मस्लिहतें इसमें सरीह तौर पर कारफ़रमा नज़र आती हैं, वो इस बात पर गवाही दे रही हैं के ये दुनिया कोई बे-मक़सद और बेमाना घरौंदा नहीं है जिसमें लाखों करोड़ों बरस से एक बहुत बड़ा खेल बस यूँ ही अलल-टप हुए जा रहा हो, बल्कि ये दरहक़ीक़त एक कमाल दर्जे का हकीमाना निज़ाम है जिसमें हर काम किसी मक़सद और किसी मस्लिहत के लिये हो रहा है। इस निज़ाम में ये किसी तरह मुमकिन नहीं है के यहाँ इंसान जैसी एक मख़लूक़ को अक़्ल, शऊर, तमीज़ और इस्तेमाल की आज़ादी के इख़्तियारात दे कर उसमें नेकी व बदी की अख़लाक़ी हिस पैदा करके, और उसे हर तरह के अच्छे और बुरे, सही और ग़लत कामों के मौक़े देकर ज़मीन में जंगें करने के लिये महज़ फ़ुज़ूल और लायानी तरीक़े से छोड़ दिया जाए, और उससे कभी ये पूछताछ न हो के दिल व दिमाग़ और जिस्म की जो क़ुव्वतें इसको दी गईं थीं, दुनिया में काम करने के लिये जो वसीअ ज़राए उसके हवाले किये गए थे, और ख़ुदा की बे शुमार मख़लूक़ात पर तसर्रुफ़ के इख़्तियारात उसे दिये गए थे, उनको उसने किस तरह इस्तेमाल किया। 

जिस निज़ामे कायनात मैं सब कुछ बामक़सद है, उसमें सिर्फ़ इंसान जैसी अज़ीम मख्लूक़ की तख़लीक़ कैसे बे मक़सद हो सकती है? 

जिस निज़ाम में हर चीज़ मबनी बरहक़ीक़त है, उसमें तनहा एक इंसान ही की तख़लीक़ कैसे फ़ुज़ूल और अब्स हो सकती है? मख़लूक़ात की जो क़िस्में (प्रजातियाँ) अक़्ल व शऊर नहीं रखती, उनकी पैदाइश की मस्लिहत तो इसी दुनिया में पूरी हो जाती है। इसलिये अगर वो अपनी उम्र की मुद्दत ख़त्म होने के बाद ख़त्म कर दी जाएं तो ये ऐन माक़ूल बात है, क्योंकि उन्हें कोई इख़्तियारात दिये ही नहीं गए हैं के उनसे पूछताछ का कोई सवाल पैदा हो। मगर अक़्ल व शऊर और इख्तियार रखने वाली मख़लूक़, जिसके अफ़आल महज़ दुनिया (Physical World) तक महदूद नहीं हैं बल्कि अख़लाक़ी नौइय्यत भी रखते हैं, और जिसके अख़लाक़ी नताइज पैदा करने वाले आमाल का सिलसिला महज़ ज़िन्दगी की आख़िरी घड़ी तक ही नहीं चलता बल्कि मरने के बाद भी उसपर अख़लाक़ी नताइज मुरत्तब होते रहते हैं, उसे सिर्फ़ उसका तबई काम ख़त्म हो जाने के बाद पेड़-पौधों और जानवरों की तरह कैसे जाइज़ किया जा सकता है? 

उसने तो अपने इख़्तियार और इरादे से जो नेकी या बदी भी की उसकी ठीक ठीक हक़ व इन्साफ़ के मुताबिक़ जज़ा उसको लाज़िमन मिलनी ही चाहिये, क्योंकि ये उस मस्लिहत का बुनियादी तक़ाज़ा है जिसके तहत दूसरी मख़लूक़ात के बरख़िलाफ़ उसको एक इख्तियार रखनेवाली मख़लूक़ बनाया गया है। उससे हिसाब न हो, उसके अख़लाक़ी आमाल पर जज़ा व सज़ा न हो, और उसको भी बेइख़्तियार मख़्लूक़ की तरह तबई काम ख़त्म होने पर ख़त्म कर दिया जाए, तो ला-मुहाला उसकी पैदाइश सरासर बेकार होगी, और एक हकीम से बेकार काम की तवक़्क़ो नहीं की जा सकती।


इसके आलावा आख़िरत और जज़ा और सज़ा के होने पर इन चार मज़ाहिर-ए-काएनात की क़सम खाने की एक और वजह भी है। मुन्किरीने-आख़िरत ज़िन्दगी बादे मौत को जिस बिना पर ग़ैर मुमकिन समझते हैं, वो ये है के हम जब मर कर ख़ाक में रल-मिल जाएँगे और हमारा ज़र्रा-ज़र्रा जब ज़मीन मैं बिखर जाएगा तो कैसे मुमकिन है के ये सारे बिखरे हुए जिस्म के हिस्से फिर इकट्ठे हो जाएं और हमें दोबारा बना खड़ा किया जाए। 

इस शुबहे की ग़लती उन चारों मज़ाहिर-ए-काएनात पर ग़ौर करने से ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाती है जिन्हें आख़िरत के लिये दलील के तौर पर पेश किया गया है। 

सूरज की किरणें ज़मीन के ऊपर उन तमाम पानी के ज़खीरों पर असर अंदाज़ होती हैं जिस तक उनकी हरारत पहुँचती है। इस अमल से बे हद व हिसाब क़तरे उड़ जाते हैं और अपने मख़ज़न में बाक़ी नहीं रहते मगर वो फ़ना नहीं हो जाते बल्कि भाप बन कर एक-एक क़तरा हवा में महफ़ूज़ रहता है। फिर जब ख़ुदा का हुक्म होता है तो यही हवा उन क़तरों की भाप को समेट लाती है, उसको घने बादलों की शकल में जमा करती है, उन बादलों को ले कर ज़मीन के ऊपर मुख़्तलिफ़ हिस्सों में फैल जाती है, और ख़ुदा की तरफ़ से जो वक़्त मुक़र्रर है, ठीक उसी वक़्त एक-एक क़तरा उसकी शकल में जिसमें वो पहले था, ज़मीन पर वापस पहुँचा देती है। ये मंज़र जो आए दिन इन्सान की आँखों के सामने गुज़र रहा है, इस बात की शहादत देता है के मरे हुए इंसानों के जिस्म के हिस्से भी अल्लाह तआला के एक इशारे पर जमा हो सकते हैं और उन इंसानों को उसी शकल में फिर उठा खड़ा किया जा सकता है जिसमें वो पहले मौजूद थे। ये हिस्से चाहे मिटटी में हों, या पानी में, बहरहाल रहते इसी ज़मीन और इसी के माहौल ही में हैं। जो ख़ुदा पानी की भाप को हवा मैं बिखरे हुए हो जाने के बाद फिर उसी हवा के ज़रिये से समेट लाता है और उन्हें फिर पानी की शकल मैं बरसा देता है, उसके लिये इंसानी जिस्मों के बिखरे हुए अजज़ा को हवा, पानी और मिटटी में से समेट लाना और फिर पहली शक्लों में जमा कर देना आख़िर क्यों मुश्किल हो?

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