Maut ke baad zindagi par kaaynaat se kya daleel milti hai?

Maut ke baad zindagi par kaaynaat se kya daleel milti hai?


मौत के बाद की ज़िंदगी पर कायनात से दलील

अगर हम अपनी कायनात पर गौर ओ फिक्र करें तो हम पाएंगे कि हमारी कायनात फिजूल और बेमकसद नहीं बनाई गई है बल्कि इसके बनाने वाले ने इस कायनात को बहुत ही हिक्मत के तहत और एक मकसद के साथ बनाया है। कायनात में मौजूद तमाम चीजें इस बात की गवाही दे रही है कि ये कायनात सिर्फ खेल के तौर पर नहीं बना दी गई है बल्कि इसका एक मकसद है। इसी बात को अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि:


ہُوَ الَّذِیۡ جَعَلَ الشَّمۡسَ ضِیَآءً وَّ الۡقَمَرَ نُوۡرًا وَّ قَدَّرَہٗ مَنَازِلَ لِتَعۡلَمُوۡا عَدَدَ السِّنِیۡنَ وَ الۡحِسَابَ ؕ مَا خَلَقَ اللّٰہُ ذٰلِکَ اِلَّا بِالۡحَقِّ ۚ یُفَصِّلُ الۡاٰیٰتِ لِقَوۡمٍ یَّعۡلَمُوۡنَ
"वही है जिसने सूरज को उजियाला बनाया और चाँद को चमक दी और चाँद के घटने-बढ़ने की मंज़िलें ठीक-ठीक मुक़र्रर कर दीं, ताकि तुम उससे वर्षों और तारीख़ों के हिसाब मालूम करो। अल्लाह ने ये सब कुछ खेल के तौर पर नहीं बल्कि मक़सद के साथ ही बनाया है। वो अपनी निशानियों को खोल-खोलकर पेश कर रहा है उन लोगों के लिये जो इल्म रखते हैं।
[कुरआन 10:5]


اِنَّ فِی اخۡتِلَافِ الَّیۡلِ وَ النَّہَارِ وَ مَا خَلَقَ اللّٰہُ فِی السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ لَاٰیٰتٍ لِّقَوۡمٍ یَّتَّقُوۡنَ 
"यक़ीनन रात और दिन के उलट-फेर में और हर उस चीज़ में जो अल्लाह ने ज़मीन और आसमानों में पैदा की है, निशानियाँ हैं उन लोगों के लिये जो (ग़लत देखने और ग़लत रास्ते पर चलने से) बचना चाहते हैं।"
[कुरआन 10:6]


इन आयतों में आख़िरत (मौत के बाद की ज़िंदगी) के अक़ीदे की दलील है। कायनात में अल्लाह के जो काम हर तरफ़ नज़र आ रहे हैं, जिनके बड़े-बड़े निशानात सूरज और चाँद, और दिन-रात के आने-जाने की शक्ल में हर शख़्स के सामने मौजूद हैं, उनसे इस बात का बहुत ही वाज़ेह सुबूत मिलता है कि दुनिया के इस शानदार कारख़ाने का बनानेवाला कोई बच्चा नहीं है जिसने सिर्फ़ खेलने के लिये ये सब कुछ बनाया हो और फिर दिल भर लेने के बाद यूँ ही इस घरौंदे को तोड़-फोड़ डाले। साफ़ तौर पर नज़र आ रहा है कि उसका हर काम मुनज़्ज़म (व्यवस्थित) है, उसके हर काम में हिकमत है, मस्लिहतें हैं और ज़र्रे-ज़र्रे की पैदाइश में एक गहरा मक़सद पाया जाता है। 

तो जब वो हिकमतवाला है और उसकी हिकमत की निशानियाँ और अलामतें तुम्हारे सामने साफ़-साफ़ मौजूद हैं, तो उससे तुम कैसे ये उम्मीद रखते हो कि वो इंसान को अक़्ल और अख़लाक़ी एहसास और आज़ादाना ज़िम्मेदारी और इस्तेमाल के इख़्तियारात देने के बाद उसकी ज़िन्दगी के कामों का हिसाब कभी न लेगा और अक़्ली व अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी की बुनियाद पर इनाम और सज़ा का जो हक़ लाज़िमी तौर पर पैदा होता है उसे यूँ ही बेकार छोड़ देगा। इस तरह इन आयतों में आख़िरत का अक़ीदा पेश करने के साथ उसकी तीन तलीलें ठीक-ठीक अक़्ली तरतीब के साथ दी गई हैं :


1. पहली दलील: 

पहली ये कि दूसरी ज़िन्दगी मुमकिन है क्योंकि पहली ज़िन्दगी का होना एक हक़ीक़त की शक्ल में मौजूद है। 


اَفَعَیِیۡنَا بِالۡخَلۡقِ الۡاَوَّلِ ؕ بَلۡ ہُمۡ فِیۡ لَبۡسٍ مِّنۡ خَلۡقٍ جَدِیۡدٍ
"क्या पहली बार पैदा करने से हम बेबस थे? मगर नए सिरे से पैदा किये जाने की तरफ़ से ये लोग शक मे पड़े हुए हैं।"
[कुरआन 50:15]


ये आख़िरत के हक़ में अक़्ली दलील है। जो शख़्स ख़ुदा का इनकारी हो और इस हद तक न पहुँच गया हो कि इस मुनज़्ज़म कायनात और उसके अंदर इंसान की पैदाइश को महज़ एक इत्तफ़ाक़ी हादसा क़रार देने लगे, उसके लिये ये माने बग़ैर चारा नहीं है कि ख़ुदा ही ने हम और इस पूरी कायनात को पैदा किया है। अब ये एक हक़ीक़त है के हम इस दुनिया में ज़िंदा मौजूद हैं और ज़मीन व आसमान का ये सारा कारख़ाना हमारी आँखों के सामने चल रहा है, आप ही इस बात का खुला सबूत है कि ख़ुदा हमें और इस कायनात को पैदा करने से बेबस न था। 

इसके बाद अगर कोई शख़्स ये कहता है के क़ियामत बरपा करने के बाद वही ख़ुदा एक दूसरा निज़ामे-आलम न बना सकेगा, और मौत के बाद वो हमें दोबारा पैदा न कर सकेगा, तो वो महज़ एक ख़िलाफ़े-अक़्ल बात कहता है। ख़ुदा बेबस होता तो पहले ही पैदा न कर सकता। 

जब वो पहले पैदा कर चुका है और इसी पैदा किये जाने की बदौलत हम ख़ुद वजूद में आए बैठे हैं, तो ये फ़र्ज़ कर लेने के लिये आख़िर क्या माक़ूल बुनियाद हो सकती है के अपनी ही बनाई हुई चीज़ को तोड़ कर फिर बना देने से वो बेबस हो जाएगा?


2. दूसरी दलील: 

दूसरी ये कि दूसरी ज़िन्दगी की ज़रूरत है क्योंकि मौजूदा ज़िन्दगी में इंसान अपनी अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी को सही ग़लत तौर पर जिस तरह अदा करता है और उससे सज़ा और इनाम का जो हक़ पैदा होता है उसकी बुनियाद पर अक़्ल और इन्साफ़ का तक़ाज़ा यही है कि एक और ज़िन्दगी हो जिसमें हर शख़्स अपने अख़लाक़ी रवैये का वो नतीजा देखे जिसका वो हक़दार है।


3. तीसरी दलील: 

तीसरी ये कि जब अक़्ल व इन्साफ़ के लिहाज़ से दूसरी ज़िन्दगी की ज़रूरत है तो ये ज़रूरत यक़ीनन पूरी की जाएगी, क्योंकि इंसान और कायनात का पैदा करनेवाला हिकमतवाला है और हिकमतवाले से ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि हिकमत व इन्साफ़ जिस चीज़ की माँग करते हों उसे वो वुजूद में न लाए।

ग़ौर से देखा जाए तो मालूम होगा कि मरने के बाद की ज़िन्दगी को दलीलों के ज़रिए साबित करने के लिये यही तीन दलीलें दी जा सकती हैं और यही काफ़ी भी हैं। इन दलीलों के बाद अगर किसी चीज़ की कमी बाक़ी रह जाती है तो वो सिर्फ़ ये है कि कि इंसान को आँखों से दिखा दिया जाए कि जो चीज़ मुमकिन है, जिसके वुजूद में आने की ज़रूरत भी है, और जिसको वुजूद में लाना ख़ुदा की हिकमत का तक़ाज़ा भी है, वो देख ये तेरे सामने मौजूद है। लेकिन ये कमी बहरहाल दुनियावी ज़िन्दगी में पूरी नहीं की जाएगी, क्योंकि देखकर ईमान लाना कोई मतलब नहीं रखता। अल्लाह इंसान का जो इम्तिहान लेना चाहता है वो तो है ही ये कि वो महसूस होने और दिखाई देने से परे हक़ीक़तों को ख़ालिस ग़ौर व फ़िक्र और सही दलीलों के ज़रिए से मानता है या नहीं। 

इस सिलसिले में एक और अहम बात भी बयान कर दी गई है जिसपर गहराई से ग़ौर करने की ज़रूरत है। फ़रमाया कि अल्लाह अपनी निशानियों को खोल-खोलकर पेश कर रहा है उन लोगों के लिये जो इल्म रखते हैं। और अल्लाह की पैदा की हुई हर चीज़ में निशानियाँ हैं उन लोगों के लिये जो ग़लत सोचने और ग़लत रास्ते पर चलने से बचना चाहते हैं। इसका मतलब ये है कि अल्लाह ने बहुत ही हिकमत के साथ ज़िन्दगी के मज़ाहिर में हर तरफ़ वो निशानियाँ फैला रखी हैं जो इन मज़ाहिर के पीछे छिपी हुई हक़ीक़तों की साफ़-साफ़ निशानदेही कर रहीं हैं। लेकिन इन निशानियों से हक़ीक़त तक सिर्फ़ वो लोग पहुँच पाते हैं जिनके अन्दर ये दो ख़ूबियाँ मौजूद हों-

  1. एक ये कि वो जाहिलाना तास्सुबात (अज्ञानतापूर्ण दुराग्रह) से पाक होकर इल्म हासिल करने के उन ज़रिओं से काम लें जो अल्लाह ने इंसान को दिये हैं।
  2. दूसरी ये कि उनके अन्दर ख़ुद ये ख़ाहिश मौजूद हो कि ग़लती से बचें और सही रास्ता इख़्तियार करें।


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