Lailatul Qadr - Mubarak Raat

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लैलतुल क़द्र की फ़ज़ीलत व अहमियत

إِنَّآ أَنزَلۡنَٰهُ فِي لَيۡلَةِ ٱلۡقَدۡرِ وَمَآ أَدۡرَىٰكَ مَا لَيۡلَةُ ٱلۡقَدۡرِ لَيۡلَةُ ٱلۡقَدۡرِ خَيۡرٞ مِّنۡ أَلۡفِ شَهۡرٖ تَنَزَّلُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ فِيهَا بِإِذۡنِ رَبِّهِم مِّن كُلِّ أَمۡرٖ سَلَٰمٌ هِيَ حَتَّىٰ مَطۡلَعِ ٱلۡفَجۡرِ 



शबे क़द्र एक ऐसी रात है जिसकी बहुत फ़ज़ीलत है क़ुरआन का इस रात से ख़ास तअल्लुक़ है। इस रात को क़ुरआन में लैलतुल क़द्र कहा गया है जैसा कि सूरह अल क़द्र में है 

إِنَّآ أَنزَلۡنَٰهُ فِي لَيۡلَةِ ٱلۡقَدۡرِ

"हमने क़ुरआन को शब ऐ क़द्र में नाज़िल किया" और सूरह अद दुख़ान में इसे है लैलतुल मुबारिका का नाम दिया गया है 

 حمٓ وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡمُبِينِ إِنَّآ أَنزَلۡنَٰهُ فِي لَيۡلَةٖ مُّبَٰرَكَةٍۚ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ

"हा मीम यह स्पष्ट किताब है जिसे हम ने मुबारक रात में नाज़िल किया है। बेशक हम ही डराने वाले हैं"

(सूरह 44 अद दुख़ान 1 से 3) 



शबे क़द्र रमज़ानुल मुबारक की एक अहम रात है और रमज़ानुल मुबारक वह महीना है जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया

شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٍۢ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ 



"रमज़ानुल मुबारक वह महीना है जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया जो इंसानों के लिए हिदायत है और ऐसी स्पष्ट तालीमात पर आधारित है जो सीधा सच्चा रास्ता दिखाने वाली और हक़ व बातिल के फ़र्क़ को खोल कर रख देने वाली है"

(सूरह 02 अल बक़रह आयत 185)



क़ुरआन का नुज़ूल इसी मुबारक महीने की मुबारक रात यानी शबे क़द्र में अंतिम नबी रहमतुल लिल आलमीन इमामुल अंबिया मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुआ और इसे फ़रिश्तों में सबसे अफ़ज़ल जिब्रईल अलैहिस्सलाम इस दुनिया मे ले आये।



शबे क़द्र की फ़ज़ीलत का अंदाज़ा इस से लगाया जा सकता है कि ख़ुद क़ुरआन में इसे हज़ार महीनों यानी दुनिया के 83 वर्ष से भी ज़्यादा बेहतर बताया गया है



لَيۡلَةُ ٱلۡقَدۡرِ خَيۡرٞ مِّنۡ أَلۡفِ شَهۡرٖ 

"लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है'"


लैलतुल क़द्र में तमाम मामलात के फ़ैसले होते हैं जैसा कि सूरह अद दुख़ान में है

"فِيهَا يُفۡرَقُ كُلُّ أَمۡرٍ حَكِيمٍ أَمۡرٗا مِّنۡ عِندِنَآۚ إِنَّا كُنَّا مُرۡسِلِينَ رَحۡمَةٗ مِّن رَّبِّكَۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ" 

"यही वह रात है जिसमें हर मामले का हकीमाना फ़ैसला हमारे आदेश से होता है तेरे रब की रहमत के तौर पर। वास्तव में वही सब कुछ सुनने और जानने वाला है"



यही बात सूरह अल क़द्र में बयान हुई है

 تَنَزَّلُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ فِيهَا بِإِذۡنِ رَبِّهِم مِّن كُلِّ أَمۡرٖ سَلَٰمٌ هِيَ حَتَّىٰ مَطۡلَعِ ٱلۡفَجۡرِ  

"फ़रिश्ते और जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने रब के हुक्म से तमाम मामलात को ले कर उतरते है वह भोर होने तक सलामती है"



नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ान के आख़िरी अशरे (दस दिनों) का काफ़ी एहतेमाम करते थे जैसा कि हदीस में है 

قَالَتْ عَائِشَةُ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا: «كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَجْتَهِدُ فِي الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ، مَا لَا يَجْتَهِدُ فِي غَيْرِهِ»

"उम्मुल मुमेनीन आयेशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा ने बयान किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आख़िरी अशरे में जिस क़दर इबादत और सख़ावत करते थे उसके इलावा किसी और वक़्त में नहीं करते थे"

(सही मुस्लिम 2788/ किताबुल एतेकाफ़, मिश्कातुल मसाबीह 3089/ किताबुस सौम, शबे क़द्र का बयान)



 एक दूसरी हदीस में है

إِذَا دَخَلَ الْعَشْرُ ، شَدَّ مِئْزَرَهُ ، وَأَحْيَا لَيْلَهُ ، وَأَيْقَظَ أَهْلَهُ .

"जब आख़िरी अशरा शुरू तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इबादत के लिए तैयार हो जाते रात भर जगते और घर वालों को भी जगाते थे"

(सही बुख़ारी 2024, सही मुस्लिम 2787 किताबुल एतेकाफ़ , मिश्कातुल मसाबीह 2098/ किताबुस सौम, शबे क़द्र का बयान)



लैलतुल क़द्र में क़याम करने पर बहुत सवाब है और इसकी तरफ़ विशेष तवज्जुह दिलाई गई है। हदीस में है:

مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ

"जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ अपना एहतेसाब करते हुए रखा उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ हो जाते हैं और जिसने ईमान के साथ अपना एहतेसाब करते हुए लैलतुल क़द्र में क़याम किया उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ हो जाते हैं 

(सही बुख़ारी हदीस 35/ किताबुल ईमान 1901/ किताबुस सौम, ईमान और एहतेसाब के साथ रोज़ा रखने का बयान, जामे तिर्मिज़ी 683/ अबवाबुस सौम, मिश्कातुल मसाबीह1958/किताबुस सौम)



 लैलतुल क़द्र रमज़ान की कौन सी रात है इसके बारे में मुख़्तलिफ़ अहादीस हैं किसी एक रात को मख़सूस नहीं किया जा सकता। एक हदीस में है:

خَرَجَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لِيُخْبِرَنَا بِلَيْلَةِ الْقَدْرِ ، فَتَلَاحَى رَجُلَانِ مِنَ الْمُسْلِمِينَ ، فَقَالَ : خَرَجْتُ لِأُخْبِرَكُمْ بِلَيْلَةِ الْقَدْرِ ، فَتَلَاحَى فُلَانٌ وَفُلَانٌ ، فَرُفِعَتْ وَعَسَى أَنْ يَكُونَ خَيْرًا لَكُمْ ، فَالْتَمِسُوهَا فِي التَّاسِعَةِ ، وَالسَّابِعَةِ ، وَالْخَامِسَةِ
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हुजरे से बाहर निकले, वह लोगों को शबे कद्र बताना चाहते थे इतने में दो मुसलमान आपस में लड़ पड़े। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाया मैं तो इसीलिए बाहर निकला था कि तुमको शबे क़द्र बताऊं उसी वक़्त फुलां फुला आदमी लड़ पड़े तो मेरे दिल से उठा ली गई और शायद इसी में तुम्हारे लिए कुछ अच्छाई हो अब तुम शबे क़द्र को 29वीं, 27वीं और 25वीं रात में तलाश करो"

(सही बुख़ारी 2023 किताब फ़ज़लु लैलतिल क़द्र मिश्कातुल मसाबीह/ 2095 किताबुस सौम, शबे क़द्र के बयान में)



जबकि एक और हदीस में है 

أُرِيتُ لَيْلَةَ الْقَدْرِ، ثُمَّ أَيْقَظَنِي بَعْضُ أَهْلِي، فَنُسِّيتُهَا فَالْتَمِسُوهَا فِي الْعَشْرِ الْغَوَابِرِ

"नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया मुझे शबे क़द्र दिखाई गई फिर मुझे किसी बीवी ने जगाया तो मुझे वह रात भूल गई ,अब तुम उसे आख़िरी 10 रातों में तलाश करो"

(सही मुस्लिम 2768 किताबुस सयाम, अस सिलसिला अस सहीहा 2212)



एक और रिवायत में है

وَإِنَّهَا فِي الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ فِي وِتْرٍ

शबे क़द्र को रमज़ान की आख़िरी दस रातों की ताक़ रातों में तलाश करो।

(सही बुख़ारी 813 किताबुल ईमान)



शबे क़द्र के बारे में आमतौर से लोगों को यह कहते हुए सुना गया है कि शबे क़द्र तो रमज़ान की सत्ताईसवीं रात है सहाबा के यहां भी इस तारीख़ का ख़ास एहतेमाम होने लगा था तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लीगों को मुख़ातब करते हुए फ़रमाया

لَا يَزَالُونَ يَقُصُّونَ عَلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الرُّؤْيَا أَنَّهَا فِي اللَّيْلَةِ السَّابِعَةِ مِنْ الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَرَى رُؤْيَاكُمْ قَدْ تَوَاطَأَتْ فِي الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ فَمَنْ كَانَ مُتَحَرِّيهَا فَلْيَتَحَرَّهَا مِنْ الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ

"बहुत से सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने ख़्वाब बयान किए कि शबे क़द्र रमज़ान की सत्ताईसवीं रात है इस पर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "मैं देख रहा हूं कि तुम सब के ख़्वाब रमज़ान की आख़िरी अशरे में शबे क़द्र के होने पर मुत्तफ़िक़ हो गए हैं इसलिए जिसे शबे क़द्र की तलाश हो वह रमज़ान के आख़िरी अशरे में तलाश करे"

(सही बुख़ारी 1158/किताबुत तहज्जुद) 



मिश्कातुल मसाबीह में जामे तिर्मिज़ी के हवाले से एक रिवायत है

ذُكِرَتْ لَيْلَةُ الْقَدْرِ عِنْدَ أَبِي بَكْرَةَ فَقَالَ مَا أَنَا مُلْتَمِسُهَا لِشَيْءٍ سَمِعْتُهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِلَّا فِي الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ فَإِنِّي سَمِعْتُهُ يَقُولُ الْتَمِسُوهَا فِي تِسْعٍ يَبْقَيْنَ أَوْ فِي سَبْعٍ يَبْقَيْنَ أَوْ فِي خَمْسٍ يَبْقَيْنَ أَوْ فِي ثَلَاثِ أَوَاخِرِ لَيْلَةٍ

अबु बकरह रज़ियल्लाहु अन्हु ने बताया कि मैंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना "शबे क़द्र को इक्कीसवीं, तेईसवीं, पचीसवीं, सत्ताईसवीं, और उन्तीसवीं शब में तलाश करो"

(जामे तिर्मिज़ी 794/ अबवाबुस सौम लैलतुल क़द्र के बयान में, मिश्कातुल मसाबीह 2092/किताबुस सौम

शबे क़द्र के बयान में)



आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही

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