Tagut ka inkar (yaani kufr bit-tagut) part-17

Tagut ka inkar (yaani kufr bit-tagut)


ताग़ूत का इनकार [पार्ट-17]

(यानि कुफ्र बित-तागूत)


सोशलिज्म (socialism) आज के दौर का ताग़ूत कैसे है?

इस्लाम के मुताबिक़, "ताग़ूत" वो हर चीज़ है जो अल्लाह के इलाह होने का इंकार करके इंसान को अपनी हुकूमत या फ़िक्र का ग़ुलाम बना लेती है। ताग़ूत सिर्फ़ बुत-परस्ती तक महदूद नहीं, बल्कि हर वो सिस्टम, सोच, या शख्स जो इंसान को अल्लाह की दी हुई हिदायत से दूर करने का ज़रिया बने, ताग़ूत की कैटेगरी में आता है।

अब अगर हम सोशलिज्म को इस पहलू से देखें, तो इसमें कुछ ऐसे उसूल हैं जो इस्लाम के बुनियादी अक़ीदे से टकराते हैं:

1. अक़ीदा-ए-तौहीद और सोशलिज्म के नज़रियात में तफरीक़

इस्लाम का अक़ीदा-ए-तौहीद का मतलब है कि सिर्फ़ अल्लाह का हुक्म चलना चाहिए। हर इंसान सिर्फ़ अल्लाह का बंदा है, और हर माली, सियासी, और समाजी मामलात में अल्लाह का हुक्म फ़रमान रवा होना चाहिए। जबकि सोशलिज्म का बुनियादी नज़रिया मटेरियलिज़्म है, जिसमें दीन को मआशरे से अलग रखने पर ज़ोर दिया जाता है। इसमें अख़लाक़ियात, इंसानियत और हुकूमत सब को एक दुनियावी नज़रिए के हवाले कर दिया जाता है।

"फैसला करने का हक़ सिर्फ अल्लाह को है।" [कुरआन 6:57]

इस आयत में अल्लाह साफ तौर पर बयान करता है कि सिर्फ़ वही मालिक और हाकिम है, और हर तरह का फैसला उसी के हुक्म से होना चाहिए। सोशलिज्म में जहां मटेरियलिज़्म और इंसानी तजुर्बात को ही सबसे अहम माना जाता है, इस्लाम का अक़ीदा-ए-तौहीद अल्लाह की पूरी हुक्मरानी पर इमान रखने पर ज़ोर देता है।


2. सरमाया और मिल्कियत का तसव्वुर

सोशलिज्म का कहने का मक़सद ये है कि सरमाया और प्रोडक्शन के सारे ज़राए का इख़्तियार सिर्फ़ हुकूमत के पास हो, और इस वजह से अफराद को उनकी मिल्कियत से महरूम कर दिया जाता है। इस्लाम इस बात को नहीं मानता। क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ हर इंसान अपने माल का मालिक है, जब तक वो हलाल तरीक़ों से माल हासिल करता है और ज़कात और सदक़ात के ज़रिए दूसरों की मदद करता है।

"ऐ ईमान लाने वालो! अपने आपसी लेन-देन में एक-दूसरे का माल नाहक़ न खाओ, सिवाय इसके कि कोई सौदा आपसी रज़ामंदी से हो।" [कुरआन 4:29]

इस आयत में साफ तौर पर हिदायत है कि किसी का माल नाजायज़ तौर पर हासिल करना मना है, लेकिन जो हलाल तरीके से हासिल किया गया है, वो इंसान का हक़ है।

इस्लाम में मिल्कियत का ये तसव्वुर सोशलिज्म के बिल्कुल उलट है, जहां इंसानी सरमाया को हुकूमत के कंट्रोल में दे दिया जाता है। इस्लाम में, माल का मालिकाना हक़ होता है, लेकिन साथ ही इसके सही इस्तेमाल और ज़कात देने का भी हुक्म है।


3. दीन और दुनिया का फिक्र

सोशलिज्म इंसानी ज़िंदगी को दीनी और दुनियावी हिस्सों में बाँट कर देखता है। ये अक़ीदा रखता है कि मुआशी फ़ायदा या नुकसान सबसे ज़्यादा अहमियत रखता है, जबकि इस्लाम कहता है कि इंसान की ज़िंदगी एक है, और दीन और दुनिया को जुदा नहीं किया जा सकता। अल्लाह ने हमें दुनिया में इबादत के लिए और आख़िरत के लिए तैयारी करने के लिए भेजा है।

इस्लाम में दीन और दुनिया को अलग-अलग नहीं देखा जाता, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी अल्लाह की इबादत और उसकी मर्जी के मुताबिक गुज़ारने के लिए है। दीन और दुनिया के इस ताल्लुक़ को क़ुरआन मजीद में भी वाजेह किया गया है।

"और मैंने जिन्न और इंसान को नहीं पैदा किया, मगर इसलिए कि वे मेरी इबादत करें।" [कुरआन 51:56]

इस आयत में अल्लाह साफ तौर पर बयान करता है कि इंसान और जिन्न की पैदाइश का मकसद सिर्फ़ उसकी इबादत है। इबादत का मतलब सिर्फ़ नमाज या रोज़ा नहीं, बल्कि इंसान का हर अमल जो अल्लाह की मर्जी के मुताबिक हो, वो इबादत में शुमार होता है। इस आयत से ज़ाहिर होता है कि इंसान की पूरी ज़िंदगी एक इबादत है, चाहे वो दुनियावी काम हो या दीनी।

"और उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं: 'ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई दे और आख़िरत में भी भलाई दे, और हमें आग के अज़ाब से बचा।[कुरआन 2:201]

इस आयत में इस्लाम की तालीमात का तवाज़ुन दिखाई देता है कि इंसान को न सिर्फ दुनिया की भलाई की दुआ करनी चाहिए, बल्कि आख़िरत की भी फिक्र रखनी चाहिए। इस आयत से ये साबित होता है कि इस्लाम इंसान की ज़िंदगी के हर पहलू को समेटता है और दीन और दुनिया को अलग नहीं करता।

इस्लाम में, दुनियावी ज़िंदगी भी उसी का हिस्सा है, जिसे अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक गुज़ारने का हुक्म दिया गया है, जबकि सोशलिज्म जैसे नज़रियात मुआशी फ़ायदे को ही सबसे अहम समझते हैं और दीन को मआशरे से अलग रखने की कोशिश करते हैं।


4. हुकूमत का हुकमरानी का दायरा

सोशलिज्म कहता है कि हुकूमत हर चीज़ का इख़्तियार रखती है, चाहे वो माल हो, मज़हबी आज़ादी हो या इंसानी हक़ूक़। जबकि इस्लाम में हुकूमत का काम इंसाफ करना है और क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ हुक्म चलाना है। हुकूमत का असली मक़सद इंसानी ख़िदमत और इंसाफ का निज़ाम क़ायम करना है, न कि लोगों पर ज़ुल्म या ज़बरदस्ती करना।

इस्लाम में हुकूमत का असल मक़सद इंसाफ पर मबनी निज़ाम कायम करना है, जहां हाकिम और अवाम दोनों अल्लाह की मर्जी के मुताबिक चलें। हुकूमत को ज़ालिमाना तौर पर लोगों पर हुक्म चलाने के बजाय उनके हक़ों की हिफाज़त और इंसाफ का अमल लागू करना है। इस पर क़ुरआन में कई आयतें वाजेह हिदायत देती हैं:

"बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उन लोगों को वापस कर दो जो उसके हक़दार हैं, और जब तुम लोगों के बीच फैसला करो, तो इंसाफ के साथ करो।" [कुरआन 4:58]

इस आयत में साफ तौर पर हिदायत है कि हुकूमत का काम अमानतें उनके हक़दारों को देना और इंसाफ के साथ फैसले करना है। यहाँ इंसाफ को हुकूमत की बुनियादी ज़िम्मेदारी के तौर पर पेश किया गया है।

"और जो अल्लाह के नाज़िल किए हुए (क़ानून) के मुताबिक फैसला न करें, वही ज़ालिम हैं।" [कुरआन 5:45]

यह आयत इस्लाम में हुकूमत की बुनियाद बयान करती है कि फैसले अल्लाह के हुक्म के मुताबिक होने चाहिए। जो हुक्मरान अल्लाह के नाजिल किए हुए हुक्म के मुताबिक फैसला नहीं करते, उन्हें ज़ालिम कहा गया है।

इस्लाम में हुकूमत का हदूद तजावुज़ नहीं करता, बल्कि उसे अल्लाह के हुक्म और इंसाफ के दायरे में रहकर काम करना होता है। इसके उलट, सोशलिज्म में हुकूमत को हर चीज़ पर पूरा इख़्तियार देने का नज़रिया है, जो लोगों की माल, मज़हबी आज़ादी और हक़ूक़ तक को अपने कंट्रोल में लेने की कोशिश करता है।


5. दीन की हदें

सोशलिज्म में दीनी मामलात को अलग करके सिर्फ़ दुनियावी फ़ायदा देखने का नज़रिया रखा जाता है। इस्लाम इस तरह का मटेरियलिस्टिक नज़रिया नहीं मानता। इस्लाम के मुताबिक़, हर काम का असल फ़ायदा अल्लाह की रज़ा हासिल करना है, और यही दुनिया और आख़िरत में कामयाबी का ज़रिया है।

दीन और दुनिया के मामलों को अलग करने के नज़रिये के खिलाफ़ इस्लाम का स्पष्ट संदेश है कि हर काम का उद्देश्य अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की कामयाबी होना चाहिए। इस संदर्भ में कुछ आयतें जो इस बात को स्पष्ट करती हैं:

1. सूरह अल-अंआम (6:162): "कह दो, मेरी नमाज़, मेरे तमाम इबादतें, मेरा जीना और मेरा मरना अल्लाह के लिए है जो सारे जहानों का पालनहार है।"

इस आयत से ये स्पष्ट होता है कि हर अमल चाहे वह दीनी हो या दुनियावी, अल्लाह के लिए ही होना चाहिए। कोई भी काम सिर्फ़ दुनियावी फ़ायदे के लिए नहीं होना चाहिए।

2. सूरह अल-बक़रह (2:207): "और इन्सानों ही में कोई ऐसा भी है जो अल्लाह की ख़ुशी की चाह में अपनी जान खपा देता है, और ऐसे बन्दों पर अल्लाह बहुत मेहरबान है।"

यहाँ बताया गया है कि अल्लाह की ख़ुशी के लिए सबसे बड़ा त्याग करना भी असली मकसद है, ना कि सिर्फ़ दुनियावी फ़ायदे की तलाश।

3. सूरह अल-क़सस (28:77): "जो माल अल्लाह ने तुझे दिया है, उससे आख़िरत का घर बनाने की फ़िक्र कर और दुनिया में से भी अपना हिस्सा न भूल। एहसान कर जिस तरह अल्लाह ने तेरे साथ एहसान किया है और ज़मीन में बिगाड़ फैलाने की कोशिश न कर, अल्लाह बिगाड़ फैलानेवालों को पसन्द नहीं करता।"

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि दुनियावी और दीनी कामों का ताल्लुक़ होना चाहिए और सिर्फ़ दुनियावी फ़ायदे की सोच इंसान के असली मकसद से भटका देती है।

4. सूरह अल-जुमुआ (62:10): "फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए तो धरती पर फैल जाओ और अल्लाह का फ़ज़्ल (रिज़्क़) तलाश करो, और अल्लाह को बहुत याद करो, ताकि तुम कामयाब हो सको।"

यहाँ इस्लाम में दुनिया और दीनी मामलात का सही तवाज़ुन बताया गया है कि दुनियावी काम भी किये जाएं मगर अल्लाह की याद और उसका हुक्म हर चीज़ में सबसे ऊपर होनी चाहिए।

इन आयतों से साबित होता है कि इस्लाम में दुनियावी काम और दीनी काम अलग नहीं हैं। दोनों का मकसद अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की कामयाबी है।


नतीजा:

सोशलिज्म के असूल इस्लाम के बुनियादी अक़ीदे के ख़िलाफ़ हैं। ये इंसान को अल्लाह के हुक्म से दूर ले जाकर हुकूमत, मटेरियलिज़्म, और दुनियावी फ़ायदे का ग़ुलाम बनाता है। इसलिए, आज के दौर में सोशलिज्म एक ताग़ूत का रूप है, जो इंसान को सिर्फ़ दुनिया के फ़ायदे तक महदूद करके अल्लाह के ज़िक्र और उसकी हुकूमत से दूर करने का ज़रिया बनता है।

इसलिए, एक मुसलमान का फ़र्ज़ है कि वो ताग़ूत का इंकार करे और अपने आमाल और ज़िंदगी में सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म और क़ुरआन और सुन्नत की इताअत करे।


- मुवाहिद


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