अंबिया के वाक़िआत बच्चों के लिए (पार्ट-13k)
अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
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5. जंगे बद्र
1. बद्र की लड़ाई की पृष्ठभूमि
हिजरत के दूसरे वर्ष रमज़ान के महीने में बद्र की लड़ाई हुई इसे गज़वा ए बदरतुल कुबरा भी कहते हैं। अल्लाह ने इस जंग का नाम यौमुल फ़ुरक़ान (फ़ैसले का दिन) रखा।
إِن كُنتُمۡ ءَامَنتُم بِٱللَّهِ وَمَآ أَنزَلۡنَا عَلَىٰ عَبۡدِنَا يَوۡمَ ٱلۡفُرۡقَانِ يَوۡمَ ٱلۡتَقَى ٱلۡجَمۡعَانِۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٌ
"अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाए हो और जो हमने फ़ुरक़ान के दिन अपने बंदों पर नाज़िल किया जब दो लश्कर आमने-सामने थे।"
(सूरह 08 अल अनफ़ाल आयत 41)
इस लड़ाई का कारण यह था कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सूचना मिली कि अबु सुफ़ियान बिन हरब क़ुरैश के एक बड़े काफ़िले के साथ शाम (सीरिया) से वापस आ रहा है जिनके पास नक़दी और व्यापार के सामान है। उस समय मुसलमान और मुशरेकीन के बीच जंग ज़रूरी हो गई थी क्योंकि वह इस्लाम के विरुद्ध जंग में अपनी मिल्कियत की तमाम चीज़ें ख़र्च करने को तैयार थे और उनकी फ़ौज की टुकड़ी मदीना की सीमा तथा उसकी चारागाह तक लूटमार करती थी। जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अबु सुफ़ियान (जो तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा इस्लाम का दुश्मन था) के शाम से लौटने की सूचना मिली तो उन्होंने ने लोगों से मदीना से बाहर निकलने के बारे में मशविरा किया। मुसलमानों ने बहुत ज़्यादा तैयारी भी नहीं की क्योंकि मामला व्यापारियों का था फ़ौज का नहीं था।
जब अबु सुफ़ियान को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मदीना से निकलने की सूचना मिली और उनके इरादे का पता चला तो उसने क़ुरैश ए मक्का से मदद मांगी कि मुसलमानों से उसकी रक्षा करें। मक्का वाले यह गुहार सुनकर तैयारी करने लगे और जल्द ही जंग के लिए उठ खड़े हुए, नायकों (संभ्रात) में अबु लहब के इलावा कोई पीछे नहीं रहा उसने भी अपने बदले एक व्यक्ति को भेजा।
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2. अंसार का जवाब
जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को क़ुरैश के मक्का से निकलने की सूचना मिली तो आपने साथियों से मूलत: अंसार से मशविरा किया क्योंकि उन्होंने अपने घर में उनकी सुरक्षा करने की ज़िम्मेदारी ली थी। जब मदीना से निकलने का मंसूबा बन गया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अंसार के बारे में जानना चाहा कि उनका इरादा क्या है? मुहाजिर बोले और उन्होंने बेहतर बात कही। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दूसरी बार मशविरा किया तो भी मुहाजिरों ने बात की और अच्छा मशविरा दिया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीसरी बार फिर मशविरा किया तो अंसार समझ गए कि इशारा उनकी जानिब है चुनांचे सअद बिन मुआज़ रज़ि अल्लाहु अन्हु खड़े हुए और कहा या रसूलुल्लाह शायेद कि आपका इशारा हमारी तरफ़ है और आपको अंसार की तरफ़ से भय है कि अंसार केवल आपकी अपने इलाक़े में ही मदद करेंगे तो मैं उनकी जानिब से विश्वास दिलाता हूं कि वह आप का आदेश मानेंगे जैसा आप चाहेंगे यह उससे दोस्ती रखेंगे जिससे आप चाहेंगे और उससे संबंध तोड़ देंगे जहां आप चाहेंगे, हमारी सबसे प्यारी चीज़ों में जो चाहें आप ले लें आप तो हमें जैसा आदेश देंगे और जो आदेश भी देंगे हम उस आदेश का पालन करेंगे। अल्लाह की क़सम अगर आप हमें ग़मदान की पहाड़ी की चोटी पर भी चढ़ने के लिए कहेंगे हम उसपर चढ़ जाएंगे और अगर आप समुद्र में कूदने का हुक्म देंगे तो हम उसमें भी कूद जाएंगे।
मिक़दाद रज़ि अल्लाहु अन्हु ने कहा हम आपसे हरगिज़ वैसे नहीं कहेंगे जैसे मूसा की क़ौम ने मूसा से कहा था "जंग लड़ने तुम जाओ और तुम्हारा ख़ुदा जाए हम तो यहीं बैठे रहेंगे" बल्कि हम तो जंग करेंगे आपके दाएं से, आपके बाएं से, आपके सामने से आपके पीछे से, जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सुना तो उनका चेहरा खिल उठा और सहाबा के जवाब से ख़ुश हो गए, फिर कहा, तैयार हो जाओ और सभी को ख़ुशख़बरी सुना दो।
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3. छोटे बच्चों का जंग में जाने का शौक़
जब मुसलमान बद्र की तरफ़ बढ़े तो एक बच्चा जिसका नाम उमैर बिन अबि वक़्क़ास था जिसकी उम्र केवल सोलह वर्ष थी उसे भय था कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उम्र कम होने के कारण जंग में जाने की अनुमति नहीं देंगे इसलिए वह ख़ुद को छुपाये हुए था कि कहीं कोई उसको देख न ले उसके बड़े भाई सअद बिन वक़्क़ास रज़ि अल्लाहु अन्हु ने छुपने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मुझे इस बात का अंदेशा है कि कहीं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मुझे लौटा न दें जबकि वहां जाना मेरे दिल की आरज़ू है। होसकता है कि अल्लाह तआला मुझे शहादत दे दे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब कम उम्र होने के कारण उसे लौटाने का इरादा किया तो उमैर रोने लगे जिसे देखकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दिल पिघल गया और आप ने उसको इजाज़त दे दी चुनांचे वह उसी लड़ाई में शहीद हुआ।
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4. मुसलमान और कुफ़्फ़ार के दरमियान संख्या का फ़र्क़
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (मुसनद अहमद 2232 की ज़ईफ़ रिवायत के अनुसार) 313 और (सही मुस्लिम 4588 के अनुसार) 319 सहाबा के साथ मदीना से निकले, उनके साथ केवल दो घोड़े और सत्तर ऊंट थे जिसपर दो दो और तीन तीन लोग बारी-बारी सवार होते थे, लीडर और फ़ौजी के बीच तथा अनुयायी और मतबूअ (followed by) के बीच कोई फ़र्क़ पता नहीं चलता था। उन्हीं में अबु बकर तथा उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा भी थे और बड़े-बड़े सहाबा भी थे।
लश्कर का झंडा मुसअब बिन उमैर रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास था जबकि मुहजिरीन का झंडा अली बिन अबु तालिब रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास और अंसार का झंडा सअद बिन मुआज़ रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास था।
अबु सुफ़ियान को जब मुसलमानों के मदीने से निकलने की सूचना मिली तो वह डर गया और उसने समुद्र के किनारे का रास्ता पकड़ लिया जब उसे इत्मीनान हो गया कि वह सुरक्षित निकल गया है और उसका क़ाफ़िला महफ़ूज़ है तो उसने क़ुरैश को वापस लौट जाने के लिए पत्र लिखा कि तुम तो केवल अपने क़बीले को बचाने के लिए निकले थे। लश्करियों ने लौटने का इरादा किया लेकिन अबु जहल ने इनकार कर दिया वह तो जंग के लिए बिल्कुल तैयार था। क़ुरैश की संख्या एक हज़ार से कुछ अधिक थी उनमें क़ुरैश के बड़े बड़े सरदार, जरनैल और हीरो थे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया मक्का ने अपने जिगर के टुकड़ों को तुम्हारी झोली में लाकर डाल दिया है।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने सहाबा के साथ आधी रात के क़रीब आगे बढ़े और पानी पर क़ब्ज़ा कर लिया लेकिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वहां आने वाले कुफ़्फ़ार को भी पानी पीने और भरने की इजाज़त दी।
अल्लाह तआला ने उस रात बारिश बरसाई जो मुशरेकीन के लिए सख़्त मुसीबत थी जिसने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया और मुसलमानों के लिए अल्लाह की रहमत साबित हुई जिससे ज़मीन नरम और रेत सख़्त हो गई उनके क़दम जमा दिए और उनकी हिम्मत बढ़ाई। क़ुरआन में है:
وَيُنَزِّلُ عَلَيۡكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ لِّيُطَهِّرَكُم بِهِۦ وَيُذۡهِبَ عَنكُمۡ رِجۡزَ ٱلشَّيۡطَٰنِ وَلِيَرۡبِطَ عَلَىٰ قُلُوبِكُمۡ وَيُثَبِّتَ بِهِ ٱلۡأَقۡدَامَ
"और आसमान से तुम्हारे ऊपर पानी बरसा रहा था, ताकि तुम्हें पाक करे और तुमसे शैतान की डाली हुई गन्दगी दूर करे और तुम्हारी हिम्मत बँधाए और इसके ज़रिए से तुम्हारे क़दम जमा दे।"
(सूरह 08 अल अनफ़ाल आयत 11)
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5. जंग की तैयारी
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए एक छप्पर बनाया गया जो जंग के मैदान में एक टीले पर था आप जंग के मैदान में चलते जाते और हाथ से इशारा करते जाते कि यहां फ़ुलां व्यक्ति क़त्ल होगा यहां फ़ुलां व्यक्ति मारा जाएगा और इस स्थान पर फ़ुलां व्यक्ति क़त्ल होगा इंशाल्लाह। चुनांचे जहां रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इशारा किया था उसी स्थान पर वह मारे गए, कोई इधर-उधर नहीं मारा गया।
जब मुशरिक सामने आए और दोनों फ़ौजों ने एक दूसरे को देखा। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बान पर यह जुमले थे "ऐ अल्लाह! यह क़ुरैश हैं जो बड़े घमंड में आए हैं, यह तुझसे जंग करने और तेरे रसूल को झुठलाने आए हैं" उस दिन रमज़ान की सत्तरह तारीख़ और जुमा की रात थी। जब सुबह हुई तो क़ुरैश अपना लश्कर लेकर आगे बढ़े और दोनों ने सफ़े बांध लीं।
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6. दुआ और आजिज़ी
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सफ़ें दुरुस्त कराईं फिर अपने छप्पर की तरफ़ चले गए और छप्पर में प्रवेश किया आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ अबु बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु भी थे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने गिड़गिड़ा गिड़गिड़ा कर आजिज़ी (नम्रता) के साथ दुआ की और अल्लाह की ज़ात से मदद मांगी जिसके हुक्म को कोई टाल नहीं सकता और जिसके फ़ैसले को बदला नहीं जा सकता और मदद तो केवल अल्लाह की जानिब से ही होती है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ की "ऐ अल्लाह अगर यह मुट्ठी भर लोग हिलाक हो गए तो फिर इसके बाद ज़मीन पर तेरी इबादत न हो सकेगी" आप अपने रब से फ़रियाद करते जाते थे और यह दुआ भी करते जाते थे "ऐ अल्लाह तूने जो वादा किया है अब उसे पूरा फ़रमा ऐ अल्लाह मदद मदद" ऐसा कहते हुए आप अपना हाथ आसमान की जानिब उठाये हुए थे यहांतक कि चादर बार-बार कंधे से गिर जाती थी। फिर अबु बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु ने आपको तसल्ली देना शुरू किया उन्हें आपके इस क़दर गिड़गिड़ा गिड़गिड़ा कर रोने पर तरस आने लगा था।
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7. दो गिरोहों ने अपने रब के बारे में झगड़ा किया
फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों की तरफ़ आए और उन्हें जंग पर उभारा। तभी उतबा बिन रबीआ, उसका भाई शैबा और उसका बेटा वलीद अपनी सफ़ से निकले और दोनों सफ़ों के दरमियान आए। उन्होंने परस्पर युद्ध के लिए तलब किया उनके मुकाबले में अंसार के तीन जवान निकले। कुरैशियों ने पूछा तुम कौन हो? अंसार ने जवाब दिया हमारा संबंध अंसार क़बीले से है कुरैशियों ने कहा तुम शरीफ़ लोग हो लेकिन हम तुमसे लड़ने नहीं आए हैं हमारे मुक़ाबले में हमारे चचेरे भाइयों को भेजो। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आदेश दिया उबैदा बिन हारिस तुम उठो, हमज़ा आप उठें और अली तुम उठो और मुक़ाबले में जाओ। जब यह लोग मैदान में गए तो कुरैशियों ने कहा हां तुम शरीफ़ प्रतिद्वंदी हो, उबैदह का (जो इनमें उम्र में सबसे बड़े थे) उतबा बिन राबीआ से हमज़ा का शैबा से और अली का वलीद बिन उतबा से मुक़ाबला हुआ। हमज़ा और अली ने तो अपने प्रतिद्वंद्वी को फ़ौरन ही क़त्ल कर दिया लेकिन उबैदह और उतबा के बीच एक-एक वार का मुक़ाबला हुआ और दोनों ने एक दूसरे को गहरा ज़ख़्म लगाया उसी समय हमज़ा और अली ने अपनी तलवार उतबा पर चलाई और उसका काम तमाम कर दिया फिर वह उबैदह को उठाकर ले आए वह सख़्त ज़ख़्मी थे और इसी हालत में शहीद हो गए।
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8. दोनों गिरोहों के दरमियान घमासान की जंग
लोग एक दूसरे की तरफ़ लड़ने के लिए आगे बढ़े, कोई किसी के क़रीब हुआ और कोई किसी के, मुशरेकीन भी मैदान की तरफ़ तेज़ी से बढ़े। यह देखकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा से कहा "बढ़ो जन्नत की तरफ़ जिसकी चौड़ाई आसमान और ज़मीन के समान है"
उमैर बिन अल हुमाम अल अंसारी आगे बढ़े और पूछा या रसूलुल्लाह क्या जन्नत की चौड़ाई आसमान और ज़मीन के समान है आपने जवाब दिया हां उन्होंने कहा बहुत ख़ूब बहुत ख़ूब या रसूलुल्लाह। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा तुम्हें यह बात कहने पर किस चीज़ ने उभारा उन्होंने कहा या रसूलुल्लाह मुझे उम्मीद है कि मैं भी उन्हीं जन्नत वालों में से हूंगा। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा वास्तव में तुम उन्हीं में से हो, फिर वह तोशादान से खुजूर निकाल कर खाने लगे फिर सोचा और बोले अगर मैं इतनी देर तक जीवित रहा कि यह पूरी खुजूर खा लूं फिर तो ज़िन्दगी लंबी हो जाएगी चुनांचे उन्होंने बाक़ी खुजूरें फेंक दीं और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। यह जंगे बद्र के पहले शहीद थे। (सही मुस्लिम 4915)।
लोग अपनी सफ़ में साबित क़दमी के साथ खड़े थे और अल्लाह का ख़ूब-ख़ूब ज़िक्र कर रहे थे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस दिन बहुत ही सख़्त जंग की आप दुश्मन के बिल्कुल क़रीब थे बल्कि लड़ाई का केंद्र ही आप थे। फ़रिश्ते रहमत और नुसरत (मदद) लेकर नाज़िल हुए और उन्होंने मुशरेकीन से जंग की।
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9. अल्लाह और उसके रसूल के दुश्मन के क़त्ल में दो भाइयों की एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश
नौजवान शहादत की तमन्ना दिल लिए और सौभाग्य प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से आगे बढ़ जाना चाहते थे, दोस्त की दोस्त से, घनिष्ठ मित्र की अपने घनिष्ठ मित्रों से और सगे भाई की अपने सगे भाइयों से आगे बढ़ जाने की इच्छा थी।
अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि अल्लाहु अन्हु का बयान है कि बद्र के दिन अभी मैं सफ़ में ही खड़ा था कि अचानक मैंने अपने दाएं और बाएं दो नौजवानों को मौजूद पाया उनके यहां होने पर मुझे सख़्त तअज्जुब हुआ तभी उनमें से एक ने चुपके से पूछा चाचा मुझे दिखाएं अबु जहल कहां है मैंने हैरानी से पूछा तुम उसका क्या करोगे? उसने कहा मैंने अल्लाह की क़सम खाई है कि अगर वह मुझे नज़र आ जाए तो मैं उसे क़त्ल कर दूं या ख़ुद क़त्ल हो जाऊंगा यही बात दूसरे ने भी चुपके से कही। मैंने उन दोनों की बातें एक दूसरे पर ज़ाहिर नहीं की, फिर मैंने इशारा किया की देखो अबु जहल वहां है फिर तो वह दोनों उसपर बाज़ की तरह झपट पड़े और उसे मार ही डाला।
जब अबू जहल क़त्ल हो गया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया
هَذَا فِرْعَوْنَ هَذِهِ الْأُمَّةِ
"यह इस उम्मत का फ़िरऔन था।"
(मुसनद अहमद 3824, 3825, 4246 और 4247)
नोट:- (अगरचे यह रिवायत मुसनद अहमद में चार स्थान पर आई है लेकिन मुहद्दिस अहमद शाकिर ने इनकी सनद को ज़ईफ़ क़रार दिया है।
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10. स्पष्ट विजय (फ़तह ए मुबीन)
जब जंग मुसलमानों की विजय और मुशरेकीन की पराजय पर समाप्त हुई तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह हु अकबर की तकबीर बुलंद की और कहा
"तमाम प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने वादे को पूरा किया, अपने बंदे की मदद की और कुफ़्फ़ार के लश्कर को अकेले पराजित किया" अल्लाह तआला ने सत्य फ़रमाया है:
وَلَقَدۡ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ بِبَدۡرٖ وَأَنتُمۡ أَذِلَّةٞۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ
"अल्लाह ने बद्र के दिन तुम्हारी मदद की जबकि तुम कमज़ोर थे। अल्लाह से डरो शायेद कि तुम अल्लाह के शुक्रगुज़ार बंदे बन सको।"
(सूरत 03 आले इमरान आयात 123)
फिर क़ुरैश के मक़तूलों को एक गड्ढे में फेंकने का आदेश दिया जब उन्हें उसमें फेंक दिया गया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वहां खड़े होकर फ़रमाया "क्या तुम्हें पता चल गया कि तुम्हारे रब का वादा सत्य था मैंने तो अपने रब के वादे को सच्चा ही पाया है।"
बद्र के दिन कुफ़्फ़ार के सत्तर लोग मारे गए और सत्तर ही क़ैदी बनाए गए और चौदह मुसलमान क़ुरैश के छः और अंसार के आठ व्यक्ति शहीद हुए।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कैदियों को अलग-अलग सहाबा के दरमियान तक़सीम कर दिया और उनके साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया।
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11. बद्र की जंग का प्रभाव
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम विजेता होकर मदीना लौटे। इस विजय से मदीना के आसपास के तमाम दुश्मनों के दिलों में भय बैठ गया, बहुत से लोगों ने इस्लाम भी क़ुबूल कर लिया।
मक्का में मुशरेकीन के घरों में मातम होने लगा, मक़तूलों पर रोने पीटने की आवाज़ें सुनाई देती थीं तथा दुश्मनों के दिलों में हैबत बैठ गई।
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12. मुस्लिम बच्चों की तालीम देना ही क़ैदियों का फ़िदिया
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़ैदियों को माफ़ कर दिया और उनसे फ़िदिया लेना क़ुबूल किया। जिनके पास फ़िदिया देने के लिए कोई चीज़ नहीं थी उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एहसान करके छोड़ दिया, कुछ क़ैदियों का फ़िदिया क़ुरैश ने भेजा तो उन्हें छोड़ दिया गया।
क़ैदियों में कुछ ऐसे भी थे जिनके पास फ़िदिया देने के लिए कुछ भी नहीं था रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके सिलसिले में आदेश दिया कि इनका फ़िदिया यह है कि वह अंसार के बच्चों को लिखना पढ़ना सिखाएं और एक क़ैदी कम से कम दस बच्चों को लिखना पढ़ना सिखाए। ज़ैद बिन साबित भी उन्हीं लोगों में से थे जिन्होंने उन क़ैदियों से लिखना पढ़ना सीखा था।
बनी क़ैनुक़ाअ पहला यहूदी क़बीला था जिसने अपने और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरमियान मुआहिदा को तोड़ा, उनसे जंग की और मुसलमानों को तकलीफ़ पहुंचाई चुनांचे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनका मुहासिरा (घेराव) किया। मुहासिरा पंद्रह दिन तक जारी रहा यहांतक कि आपके हुक्म पर उन्हें बाहर आना पड़ा मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई की सिफ़ारिश पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें छोड़ दिया। यह सात सौ लड़ाके थे और उनमें रंगरेज और व्यापारी थे।
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किताब: कसास उन नबीयीन
मुसन्निफ़ : सैयद अबुल हसन नदवी रहमतुल्लाहि अलैहि
अनुवाद : आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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