खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (079) अन नाज़िआत
सूरह (079) अन नाज़िआत
(i) क़यामत
कुफ़्फ़ारे मक्का क़यामत को असंभव (impossible) समझते थे। इसलिये मुख़्तलिफ़ चीज़ों की क़सम खा कर यह यक़ीन दिलाया गया है कि क़यामत भी ज़रूर आ कर रहेगी और दूसरी जिंदगी भी होगी। यह अल्लाह तआला के लिए सिरे से कुछ मुश्किल काम ही नहीं है जिसके लिए बड़ी तैयारी की ज़रूरत हो, केवल एक झटका ही दुनिया के सिस्टम को छिन्न भिन्न कर देने के लिए पर्याप्त होगा। (01 से 14 और 34 से 46)
(ii) झुठलाने वालों का अंजाम
क़यामत के दिन कुफ़्फ़ार के दिल धड़क रहे होंगे, दहशत, ज़िल्लत और नदामत उनपर छा रही होगी, नज़रें झुकी हुई होंगी। फ़िरऔन का उदाहरण देकर यह बताया गया है कि वह भी क़यामत का मुनकिर था। उसका अंजाम याद रखो और जिस दिन यह क़यामत को देखेंगे तो उनको ऐसा मालूम होगा कि सिर्फ़ दिन का आख़िरी हिस्सा या एक पहर दुनिया में रहे। (15 से 26)
(iii) संसार की बनावट और मृत्यु पश्चात जीवन
इंसान की तख़लीक़ ज़्यादा मुश्किल है या आसमान की तख़लीक़, उसकी छत ऊंची उठाई, फिर बैलेंस बनाया, उसकी रात अंधेरी बनाई और दिन को चमकाया, ज़मीन को बिछाया, पहाड़ गाड़ दिए और इंसान और तमाम मख़लूक़ के लिए दाना, चारा, और पानी पैदा किया। (27 से 33)
(iv) ज़मीन का आकार (Shape)
विज्ञान कहता है कि ज़मीन चिपटी नहीं बल्कि गोल है क़ुरआन में यह सूचना पहले से ही मौजूद है
وَٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ ذَ ٰلِكَ دَحَىٰهَاۤ
दुहया دحية शुतुरमुर्ग़ के अंडे को कहते हैं यानी अल्लाह ने ज़मीन को ऐसे फैलाया है कि वह न तो चिपटी है और न पूरी तरह गोल है बल्कि उसका आकार शुतुरमुर्ग़ के अंडे की तरह गोल है।
(30)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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