Khulasa e Qur'an - surah 74| surah al muddassir

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (074) अल मुद्दस्सिर


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (074) अल मुद्दस्सिर 


(i) नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आम दावत का आदेश

◆ ऐ चादर लपेटने वाले उठो, 

◆ लोगों को डराओ, 

◆ अपने रब की बड़ाई बयान करो, 

◆ अपने कपड़े पाक साफ़ रखो, 

◆ गंदगी को दूर करो, 

◆ ज़्यादा की तलब में एहसान न करो, 

◆ अपने रब की रज़ा के लिए आने वाली तकलीफ़ पर सब्र करो। (1 से 7) 

(यह दूसरी वही (وحی) है जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुई)।


(ii) वलीद बिन मुग़ीरह की गुमराही और उसको को दी गईं नेअमतें

◆ अल्लाह ने इकलौता पैदा किया, 

◆ ख़ूब मदलदार बनाया, 

◆ हाज़िर रहने वाले बेटे दिए, 

◆ उसके लिए रियासत की राह बनाई। 

लेकिन नाशुक्री और इस्लाम दुश्मनी में हद से गुज़र गया इसलिए अब उसका ठिकाना जहन्नम है। (11 से 30) (1)


(iii) जहन्नमियों का अपने जुर्म का इक़रार 

◆ हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे, 

◆ मिस्कीन को खाना नहीं खिलाते थे, 

◆ हक़ के ख़िलाफ़ बातें करने वालों के साथ हम भी बातें बनाते थे, 

◆ आख़िरत के दिन को झुठलाते थे। (42 से 46)

 

(iv) कुछ अहम बातें

◆ कुफ़्र करने वाले जंगली गधे हैं जो शेर से भाग रहे हैं (50, 51) 

◆ क़ुरआन एक नसीहत है जिसका दिल चाहे नसीहत हासिल करे, 

◆ तक़वा और मग़फ़िरत के तलबगार ही नसीहत हासिल करते हैं। (54 से 56)


बदनसीब वलीद बिन मुगीरा

वलीद बिन मुगीरह का तअल्लुक़ क़बीला ए कुरैश की एक शाख़ बनी मख्ज़ूम से था। यह क़ुरैश का सबसे धनवान व्यक्ति था। उसकी वार्षिक आय एक करोड़ दीनार थी। मक्के से तायफ़ तक उसकी ज़मीनें थीं। एक दिन वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास गया उस समय आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़ुरआन की तिलावत कर रहे थे क़ुरआन सुनकर उसका दिल नरम हो गया। सूचना अबु जहल को पहुंची, वह फ़ौरन उसके पास आया और कहा तुम्हारी क़ौम चाहती है कि तुम्हारे लिए माल जमा करे। उसने कहा किस लिए? उसने कहा यह माल वह तुम्हें देना चाहती है क्योंकि तुम मुहम्मद के पास गए थे और तुम पर उसका असर हो गया है। वलीद ने कहा क़ुरैश को मालूम है कि मैं उन तमाम में मालदार व्यक्ति हूं। अबु जहल ने सोचा कि अगर वलीद बिन मुगीरह ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया तो फिर क़ुरैश का हर व्यक्ति मुसलमान हो जाएगा। इससे रोकने के लिए अबु जहल ने क़ुरैश के सरदारों की एक कॉन्फ्रेंस बुलाई जिसमें तय किया गया कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के ख़िलाफ़ हज्ज के मौक़ा पर एक प्रोपेगैंडा शुरू कर दिया जाय। मीटिंग में कुछ लोगों ने राय दी कि हम मुहम्मद को काहिन कहेंगे। वलीद ने कहा, नहीं! अल्लाह की क़सम वह काहिन नहीं है। हमने काहिनों को देखा है जैसी वह बातें गुनगुनाते हैं और जिस तरह के जुमले जोड़ते हैं क़ुरआन को उनसे दूर की निस्बत भी नहीं है। कुछ बोले उन्हें मजनूं कहा जाए। वलीद ने कहा, वह मजनूं भी नहीं है। हमने दीवाने और पागल देखे हैं इस हालत में आदमी जैसी बहकी बहकी बातें और उल्टी सीधी हरकत करता है वह किसी से छुपी हुई नहीं है। कौन यक़ीन करेगा कि मुहम्मद जो कलाम पेश करते हैं वह दीवानगी की बड़ है या जुनून के दौरे में आदमी ऐसी बातें कर सकता है। लोगों ने कहा, अच्छा तो फिर हम शायर कहेंगे। वलीद ने कहा, शायर भी नहीं है, हम शायरी की तमाम अक़्साम से वाक़िफ़ हैं इस कलाम में शायरी की कोई क़िस्म भी नहीं पाई जाती। लोग बोले तो क्या उनको साहिर (जादुगर) कहा जाए। वलीद ने कहा वह साहिर भी नहीं है, जादूगरों को हम जानते हैं वह अपने जादू के लिए जो तऱीके इख़्तियार करते हैं उनसे भी हम वाक़िफ़ हैं, यह बात भी मुहम्मद पर चस्पां नहीं होती। फिर वलीद ने कहा इन बातों में जो बात भी तुम करोगे लोग उसको बिना वजह इल्ज़ाम समझेंगे। अल्लाह की क़सम इस कलाम में बड़ी मिठास है उसकी जड़ बड़ी गहरी है और उसकी डालियां बड़ी फलदार हैं इस पर अबू जहल वलीद के सिर हो गया कि तुम्हारी क़ौम तुमसे ख़ुश न होगी जब तक कि तुम मुहम्मद के बारे में कोई बात न करो, उसने कहा अच्छा, फिर सोच विचार में गुम हो गया और कुछ बात बनाने की कोशिश की, फिर नज़र उठाई, तेवरी चढ़ाई और मुंह बनाया, पलटा और घमंड सवार हो ही गया आख़िर बोल पड़ा, कि इसे इंसान की वाणी और जादू ही मशहूर कर दो जो बहुत जल्द असर कर जाता है। 


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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