Khulasa e Qur'an - surah 73 | surah al muzzammil

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (073) अल मुज़्ज़म्मिल 


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (073) अल मुज़्ज़म्मिल 


(i) नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इबादत का बयान

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कभी आधी रात, कभी आधी रात से कम और कभी आधी रात से ज़्यादा इबादत करते थे लेकिन अब अल्लाह ने आप को सहूलत दे दी कि आप इतना जागें जितना आसानी से मुमकिन हो। (1 से 4, 20)


(ii) क़ुरआन को तरतील से पढ़ने से क्या मुराद है

◆ अहिस्ता पढ़ा जाय, 

◆ रफ़्तार ज़्यादा न हो जैसे बाल काटने के लिए कैन्ची चलती है, 

◆ इत्मीनान से पढ़ा जाय भागम भाग न हो, 

◆ ठहर ठहर कर पढ़ा जाय ख़त्म करने की जल्दी न हो, 

◆ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर आयत को अलग अलग पढ़ते थे। 

◆ ख़ूबसूरत आवाज़ में पढ़ा जाय, 

◆ आयत को बार बार दुहराया भी जा सकता है, 

 ◆ जहां ज़रूरत हो रुक कर दुआ की जाय, 

◆ जहां ज़रूरत हो तस्बीह की जाय और जहां ज़रूरत हो माफ़ी तलब की जाय। (4)


(iii) सब्र की नसीहत

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कुफ़्फ़ार की तरफ़ से तकलीफ़ पहुँचने पर सबरे जमील की नसीहत की गई। (10)


(iv) चार बातों का आदेश

◆ क़ुरआन मजीद में से जो आसान लगे उसे पढ़ने, 

◆ नमाज़ क़ायम करने, 

◆ सदक़ा करने, और 

◆ क़र्ज़े हसना (खूबसूरत क़र्ज़) देने का हुक्म दिया गया है। (20)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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