खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (062) अल जुमुआ
सूरह (062) अल जुमुआ
(i) रसूल भेजने का मक़सद
अल्लाह की आयात की तिलावत (पढ़ना और लोगों को सुनाना)' तज़किया (पाक) करना, किताब व हिकमत की तालीम देना। (2)
(ii) रिसालत अल्लाह का फ़ज़ल है जिसे चाहता है देता है
यहूदी यह समझते थे कि नबूवत उनकी जागीर है, उनकी क़ौम के बाहर का जो व्यक्ति भी नबूवत का दावा करे वह झूठा है। उम्मियों में कोई रसूल नहीं हो सकता। उनका जवाब दिया गया है कि रिसालत किसी की जागीर नहीं बल्कि यह तो अल्लाह का फ़ज़ल है जिसे चाहता है देता है। (4)
(iii) बे अमल उलेमा की मिसाल
बे अमल उलेमा की मिसाल उस गधे जैसी है जिसपर किताबें तो ख़ूब लदी होती हैं लेकिन उसे नहीं मालूम होता कि उसमें क्या है? (5)
(iv) जुमुआ की फ़ज़ीलत
एक बार नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़ुत्बा दे रहे थे कि कुछ ताजिर आ गए उनके ढोल ताशे की आवाज़ सुन कर 12 लोगों के इलावा सभी क़ाफ़िले की तरफ़ दौड़ पड़े। इस पर यह दूसरा रुकूअ नाज़िल हुआ। जिसमें कहा गया कि जब जुमुआ की अज़ान हो जाय तो तमाम काम छोड़ कर अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ दौड़ पड़ो क्योंकि अल्लाह ही बेहतरीन राज़िक़ है। अलबत्ता जब नमाज़ मुकम्मल हो जाये तो रिज़्क़ की तलाश में निकल सकते हो। (9 से 11)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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