खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (055) अर रहमान
सूरह (055) अर रहमान
(i) अल्लाह की क़ुदरत, उसकी नेअमतें और करिश्मे (दुनिया में)
मख़लूक़ पर सदैव रहम, क़ुरआन की तालीम, सूखी मिट्टी से इंसान की और आग के शोले से जिन्नात की तख़लीक़, इंसान को बयान की क़ुदरत, सूरज और चांद की तस्बीहात, सितारों और दरख़्तों का सज्दा करना, आसमान की बुलंदी, मख़लूक़ की आरामगाह ज़मीन, ज़मीन से मेवे और खुजूर, दाना और ग़ल्ला की पैदावार , पूरब और पश्चिम, आपस मे मिले हुए दो समुद्र फिर भी दोनों के बीच एक रुकावट, समुद्र में मोती और मूंगे, उसमें चलने वाली ऊंची ऊंची कश्तियाँ, आसमान और ज़मीन की तमाम मख़लूक़ात की मुहताजी वग़ैरह। (1 से 29 तक)
(ii) अल्लाह की क़ुदरत और उसकी नेअमतें और करिश्मे (आख़िरत में)
हरे भरे घने बाग़ात, हर फल की दो क़िस्में (variety), मेवे, खुजूर और अनार , बाग़ों में फ़व्वारों की तरह उबलते हुए चश्मे, रेशम के असतर वाले फ़र्श, शर्मीली निगाहों वाली हूरें जिन्हें किसी इंसान या जिन्न ने पहले हाथ भी न लगाया होगा, हीरे और मोती, (46 से 77)
(iii) मीज़ान (न्याय का तराज़ू)
इंसान जिस सन्तुलित (balanced) काएनात में रहता है उसका पूरा सिस्टम अदल (न्याय) पर क़ायम है इसलिए इंसान को भी न्याय पर क़ायम रहना चाहिए। इस कायेनात की फ़ितरत ज़ुल्म व बे इंसाफ़ी को क़ुबूल नहीं करती, यहां एक बड़ा ज़ुल्म तो दूर की बात है तराज़ू में डंडी मार कर किसी ग्राहक के हिस्से की एक ग्राम की चीज़ भी मार लेना मीज़ान में ख़लल पैदा कर देता है। (7 से 9)
(iv) दुनिया की तमाम मख़लूक़ फ़ना (ख़त्म) होने वाली है
كُلُّ مَنْ عَلَيْهَا فَانٍ وَيَبْقَىٰ وَجْهُ رَبِّكَ ذُو الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ
जो (मख़लूक) ज़मीन पर है सब फ़ना होने वाली है। और केवल परवरदिगार की ज़ात जो अज़मत और करामत वाली है बाक़ी रहेगी। (26, 27)
(v) तुम अपने रब की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे (فَبِأَيِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ)
अल्लाह ने इस दुनिया में इंसान को अनगिनत नेअमतें अता की हैं जिसमें कुछ का तज़किरा यहां हुआ है और आख़िरत में भी बेशुमार नेअमतें अता करेगा जिसके सामने दुनिया के नेअमतों की कोई हैसियत नहीं होगी, आख़िरत की उन नेअमतों में से कुछ का ही तज़किरा किया गया है लेकिन जिन नेअमतों का भी ज़िक्र किया है उसके बाद बार बार इस आयत "तुम अपने रब की किन किन नेअमतों, करिश्मों, क़ुदरत के अजायब, और कमालात को झुठलाओगे (فَبِأَيِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ)" दुहराया गया है ताकि इंसान ग़ौर करे कि इन नेअमतों को एक अल्लाह के इलावा भला कौन अता कर सकता है। चुनाँचे इस 78 आयात की सूरह में कुल 31 बार यह आयत दुहराई गई है।
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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