Khulasa e Qur'an - surah 2 | Surah Baqarah

 Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (002) अल बक़रह


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (002) अल बक़रह

आयत 01 से 141 तक में निम्नलिखि सात बातें हैं-

(i) इंसान की अक़्साम 
(ii) क़ुरआन का चमत्कार (Miracle of Quran)
(iii) आदम अलैहिस्सलाम की पैदाईश का वाक़या
(iv) जादू से मोमिन का कोई वास्ता नहीं
(v) बनी इस्राइल के हालात 
(vi) इब्राहिम अलैहिस्सलाम का वाक़या 
(vii) रसूलों में तफ़रीक़ मुमकिन नहीं


(i) इंसान की अक़्साम:

इंसान की तीन किस्में हैं- ईमान वाले, मुनाफ़िक़ीन (कपटी) और क़ाफ़िर 

ईमान वालों की पांच विशेषताएं: ईमान बिल ग़ैब, नमाज़ क़ायम करना, इनफ़ाक़ (अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करना), आसमानी किताबों पर ईमान, परलोक पर विश्वाश।

मुनाफ़िक़ीन की कई आदतों का ज़िक़्र आया है: झूठ, धोखा, गैर-चेतना (Non-consciousness) हार्दिक रोग, बेवक़ूफ़ीयाँ, अल्लाह के हुक्म के साथ मज़ाक, फ़ितना व फ़साद, जिहालत, गुमराही और तज़बज़ुब। 

काफ़िरों के बारे में बताया गया कि उनके दिलों और कानों पर मुहर लगी हुई है और आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ है। 


(ii) क़ुरआन का चमत्कार (Miracle of the Quran):

जिन सूरतों में क़ुरआन की अज़मत बयान हुई है उनके शुरू में "हुरुफ़े मुक़त्तेआत" हैं यह बताने के लिए कि इन्हीं हुरूफ़ से तुम्हारा कलाम भी बनता है और अल्लाह तबारक व तआला का भी, 

मगर वहीं आयत 23 में ज़बरदस्त चैलेन्ज भी किया गया है कि 

وَإِن كُنتُمْ فِي رَيْبٍ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا بِسُورَةٍ مِّن مِّثْلِهِ وَادْعُوا شُهَدَاءَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ 
"और अगर तुम्हें इस मामले में शक है कि ये किताब जो हमने अपने बन्दे (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारी है, तो ज़रा इस जैसी एक सूरह बना लाओ, और अल्लाह को छोड़कर अपने सारे हिमायतियों को भी बुला लो, अगर तुम सच्चे हो।"

और आयत 24 में वार्निंग भी दे दी है:

فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا وَلَن تَفْعَلُوا 
"चुनांचे अगर तुम ये नहीं कर सकते और हरगिज़ नहीं कर सकोगे।"

 

(iii) आदम अलैहिस्सलाम का वाक़िआ: 

अल्लाह तआला का आदम अलैहिस्सलाम को ख़लीफ़ा बनाना, फ़रिश्तों का इंसान को फ़सादी कहना, आदम अलैहिस्सलाम को अल्लाह की तरफ़ से इल्म अता किया जाना, फ़रिश्तों का इल्म ग़ैब होने का इक़रार, आदम अलैहिस्सलाम को फ़रिश्तों और जिन्नों से सज्दा करवाना, इब्लीस का सज्दा करने से इंकार करना और मरदूद ठहरना, जन्नत में आदम व हव्वा का रहना, फिर इब्लीस के बहकावे में आना, ग़लती का एहसास, माफ़ी चाहना और माफ़ी का क़ुबूल होना और फिर इंसान को ज़मीन की ख़िलाफ़त अता होना। (31 से 39)


नोट: आदम और इब्लीस में फ़र्क़

● इब्लीस की पैदाईश आग से हुई और आदम की मिट्टी से।

●● ग़लती दोनों ने की, इब्लीस ने सज्दा नहीं किया और अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी की। आदम ने उस पौदे का फल खा लिया जिसको खाने से उन्हें मना किया गया था।

लेकिन, इब्लीस ने अपनी ग़लती तस्लीम नहीं की और अकड़ गया उसकी अकड़ और घमंड ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा दुनिया में भी बेइज़्ज़त हुआ और आख़िरत में उसका ठिकाना जहन्नम है।

जबकि आदम ने भी इब्लीस के बहकावे में आ कर अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी की लेकिन ग़लती का फ़ौरन एहसास हुआ और अल्लाह से माफ़ी मांगी। 

हम सब आदम की औलाद हैं इसलिये जाने अनजाने में ग़लतियां तो होगी लेकिन जैसे ही एहसास हो अपने रब्ब के हुज़ूर सच्चे दिल से तौबा करके हमें अपनी ग़लतियों पर माफ़ी मांगनी चाहिए।


(iv) जादू शैतानी काम है:

कुछ लोग जादू को सुलैमान अलैहिस्सलाम की तरफ़ मंसूब करते थे हालांकि जादू कुफ़्र और शैतान का काम है। अल्लाह की मर्ज़ी के बग़ैर कोई नुक़सान नहीं पहुंच सकता। जादू हारूत मारूत दो फ़रिश्ते सिखाते थे लेकिन जो सीखना चाहता उसे पहले मना करते हुए कहते थे कि देखो यह फ़ितना है। जो जादू करेगा आख़िरत में उसके लिए कोई हिस्सा नहीं। (102)


(v) बनी इस्राईल के हालात:

बनी इस्राईल का अल्लाह की नेअमतों पर नाशुक्री करना और नबियों की नाफ़रमानी के कारण उन पर अल्लाह की फटकार। (40 से 122)


(vi) इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वाक़िआ: 

इब्राहीम अलैहिस्सलाम का अपने बेटे के साथ मिल कर ख़ाना ए काबा की तामीर करना। इसे अम्न की जगह और यहां बसने वालों के लिए रिज़्क़ की फ़राहमी की दुआ और वह दुआ :,ऐ रब ! इन लोगों में ख़ुद इन्हीं की क़ौम से एक ऐसा रसूल उठा, जो इन्हें तेरी आयतें सुनाए, इनको किताब और हिकमत की तालीम दे और इनकी ज़िन्दगियाँ सँवारे। तू बड़ा ज़बरदस्त और हिकमतवाला [तत्त्वदर्शी] है। (124 से 129)


(vii) रसूलों में तफ़रीक़ मुमकिन नहीं:

दुनिया मे जितने भी रसूल आए उनको बग़ैर कमी बेशी के अल्लाह का रसूल मानना भी ईमान का हिस्सा है। (आयत 136)


(viii) तहवीले क़िब्ला:

मदीना की तरफ़ हिजरत करने के बाद 16 या 17 महीने तक बैतुल मुक़द्दस ही क़िब्ला रहा। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़्वाहिश थी कि ख़ाना ए काबा क़िब्ला हो। अल्लाह तआला ने यह ख़्वाहिश पूरी कर दी। (144)


(ix) बीच की उम्मत:

यह उम्मत बीच की उम्मत है इसलिए यह लोगों पर गवाह है और रसूल इस उम्मत पर गवाह है। (143)


(x) आयाते बिर और अबवाबे बिर:

لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ

(सूरह 2 अल बक़रह आयत 177)

यह आयत आयते बिर कहलाती है। इसमें तमाम अहकामात, अक़ाएद, इबादात, मुआमिलात, मुआशिरत और अख़लाक़ का संक्षेप में वर्णन है। आगे अब्वाबे बिर में विस्तार पूर्वक वर्णन है-

(1) सफ़ा मरवा की सई (हल्की दौड़) 
(2) हराम क़रार दिया गया मुर्दार, खून, सुअर का मांस, और जिस पर अल्लाह के इलावा किसी और के नाम लिया गया हो, 
(3) क़िसास (बदला), 
(4) वसीयत, 
(5) रोज़े, 
(6) एतेकाफ़, 
(7) हराम कमाई, 
(8) क़मरी (चांद की) तारीख़ 
(9) जिहाद 
(10) हज्ज 
(11) इनफ़ाक़ फ़ी स बीलिल्लाह, (अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करना 
(12) हिजरत, 
(13) शराब और जूआ, 
(14) मुशरेकीन से निकाह, 
(15) हैज़ में संभोग, 
(16) ईला (बीवियों से अलग रहने की क़सम खाना), 
(17) तलाक़, 
(18) इद्दत, 
(19) रज़ाअत (दूध पिलाने की मुद्दत), 
(20) महर 
(21) हलाला, 
(22) इद्दत गुज़ारने वाली औरत को निकाह का पैग़ाम देना।


(xi) मोमिनों की आज़माइश और सब्र:

जन्नत की मंज़िल आसान नहीं है, ईमान लाने वाले यह न समझें कि उन्हें दुनिया में ऐसे ही छोड़ दिया जाएगा बल्कि खौफ़, भूख, जान, माल और और रोजगार में घाटा डाल कर उन्हें आज़माया जाएगा। इनसे पहले के लोगों को ऐसी तकलीफ़ और परेशानियों में डाला गया, और उन्हें इस क़दर हिला मारा गया कि रसूल और उनके मानने वाले पुकार उठे कि अल्लाह की मदद कब आएगी? लेकिन उन संगीन हालात में जो सब्र और नमाज़ से मदद ले उसे जन्नत की ख़ुशख़बरी भी सुनाई गई है और मोमिन तो वास्तव में वही है जो हर मुसीबत और ग़म पर إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيۡهِ رَٰجِعُونَ (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजेऊन = हम अल्लाह ही के हैं और अल्लाह ही की तरफ़ पलटकर जाना है) पढ़े। (153 से 156)


(xii) क़ुरआन के पैग़ाम को छुपाने वालों पर अल्लाह की लानत:

"जो लोग अल्लाह की रौशन तालीमात [खुली शिक्षाओं] और हिदायतों को छुपाते हैं उन पर अल्लाह भी लानत करता है और सभी लानत करने वाले भी उनपर लानत करते हैं। इसके इलावा जो लोग मुख़्तलिफ़ तरीक़ा से क़ुरआन की आयतों का व्यपार करते हैं वह अपने पेट मे आग भरते हैं। (आयत 159 और 174)


(xiii) अल्लाह अपने बंदों से बहुत क़रीब है:

मेरे बन्दे अगर तुमसे मेरे बारे में पूछें तो उन्हें बता दो कि मैं उनसे क़रीब ही हूँ। पुकारने वाला जब मुझे पुकारता है, मैं उसकी पुकार सुनता और जवाब देता हूँ। (आयत 186)


(xiv) तलाक़ के नियम:

◆ तीन तलाक़ तीन बार में है। दो बार तीन मासिक धर्म के अंदर रूजूअ किया जा सकता है। तीसरी बार में रुजूअ की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं रहती, 
◆ तलाक़ मासिक धर्म में नहीं बल्कि पाकी को हालत में दी जाय, 
◆ एक बार में एक तलाक़ दी जाय, 
◆ एक तलाक़ के बाद, 'इद्दत तीन मासिक धर्म होगी। 
◆ पहले और दूसरे तलाक़ के बाद इद्दत के दौरान बीवी अपने शौहर के साथ ही रहेगी ताकि वह दोनों अगर चाहें तो रुजूअ कर सकें। 
◆ रुजूअ करने में बीवी को किसी भी किस्म की तकलीफ़ पहुंचाना हरगिज़ मक़सूद न हो, 
◆ अगर रुजूअ न किया हो तो भी इद्दत गुज़रने के बाद उन्हें अख़्तियार होगा कि वह चाहें तो दोनों दोबारा निकाह कर सकते हैं, 
◆ तीन तलाक़ के बाद शौहर और बीवी दोनों का निकाह नहीं हो सकता जबतक कि उस औरत का निकाह किसी और मर्द से बग़ैर किसी शर्त के हो और वह तलाक़ दे दे या उसकी मृत्यु हो जाय तो फिर उस औरत का निकाह पहले शौहर से हो सकता है, 
◆ एक बार में तीन तलाक़ देना वास्तव में शरीअत का मज़ाक़ उड़ाना है, 
◆ हलाला का मौजूदा रायेज तरीक़ा हराम है क्योंकि शर्तिया शादी इस्लाम में हराम है। शर्तिया निकाह के कारण ही मुतआ हराम है। 
◆ इद्दत के दौरान गर्भ को औरतें न छुपाएं क्योंकि अगर गर्भ है तो बच्चा पैदा होने के बाद ही किसी से निकाह हो सकता है। 

(227 से 232)


(xv) क़िस्सा तालूत:

बनी इस्राईल में इस क़दर बिगाड़ आ गया था कि एक नबी के अपने दरम्यान मौजूद होते हुए उनसे एक बादशाह बनाने की मांग कर रहे थे लेकिन जब तालूत को बादशाह बना दिया गया तो बहुत कम लोगों ने तालूत की बात मानी लेकिन उन्होंने तादाद में कम होने के बावजूद अल्लाह के हुक्म से जालूत के लश्कर को परास्त कर दिया। (246 से 251)।


(xvi) और इब्राहीम की दुआ क़ुबूल हो गई:

इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने जो दुआ की थी कि "ऐ रब ! इन लोगों में ख़ुद इन्हीं की क़ौम से एक ऐसा रसूल उठा" वह दुआ क़ुबूल हो गई और अल्लाह ने इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल क़ुरैश में उन्हीं में से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आख़िरी नबी बना कर भेजा

"हमने तुम्हारे बीच ख़ुद तुम में से एक रसूल भेजा, जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हारी ज़िंदगियों को सँवारता है, तुम्हें किताब और हिकमत [तत्वदर्शिता] की तालीम देता है, और तुम्हें वह बातें सिखाता है जो तुम न जानते थे" (आयत 151)


(xvii) आयतुल कुर्सी:

आयतुल कुर्सी बड़ी फ़ज़ीलत वाली आयत है। (255) सोने से पहले आयतुल कुर्सी पढने वाले की हिफ़ाज़त पूरी रात एक फ़रिश्ता करता रहता है और सुबह तक शैतान उसके पास नहीं आता। (बुख़ारी 2311) जो हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद जो आयतुल कुर्सी पढ़े उसे मौत के इलावा कोई चीज़ जन्नत में दाख़िल होने से नहीं रोकती। (सही अल जामेउस सग़ीर 6464) 


(xviii) दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं:

जो चाहे ईमान लाकर नेक अमल करे और जो चाहे कुफ्ऱ पर क़ायम रहे, किसी पर कोई ज़बरदस्ती नहीं है अलबत्ता उसके आमाल की बुनियाद पर आख़िरत में फ़ैसला होगा। (256)


(xix) दो नबियों का बयान:

इब्राहीम अलैहिस्सलाम का नमरूद से मुबाहिसा और यह कह कर नमरूद को लाजवाब कर देना कि 'मेरा रब तो सूरज को पूरब से निकालता है तू ज़रा पश्चिम से निकाल दे" मुर्दा के जिंदा उठाये जाने के Observing की दुआ।

दूसरे उज़ैर अलैहिस्सलाम जिन्हें अल्लाह तआला ने सौ बरस तक मौत दे कर फिर ज़िंदा किया। (258, 259)


(xx) सदक़ा और ब्याज (सूद):

देखने में ऐसा महसूस होता है कि सदक़ा से माल कम होता है और सूद से बढ़ता है लेकिन सही बात यह है कि सदक़ा से माल बढ़ता है और सूद से घटता है। अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने का सवाब 700 गुना से भी ज़्यादा है 700 गुना तो दुनिया में भी अल्लाह देता है एक व्यक्ति एक दाना ज़मीन में डालता है उस दाने से पौधा निकलता है उसमें 7 बालियां होती हैं और हर बाली में 100 दाने होते हैं लेकिन उसके साथ शर्त यह है कि उसमें दिखावा, या एहसान जताने और तकलीफ़ पहुचाने की नीयत शामिल न हो वरना वह सवाब के बजाय अज़ाब बन जाएगा। इसके मुक़ाबले में ब्याज उतना ही घिनौना गुनाह है ब्याज में लिप्त लोग हक़ीक़त में अल्लाह और उसके रसूल से जंग का बिगुल बजा रहे हैं और जो अल्लाह और उसके रसूल से जंग करे उसका अंजाम कितना भयानक होगा। (261 से 279)


(xxi) क़ुरआन की सबसे लंबी आयत:

क़ुरआन की सबसे लंबी आयत तिजारत और क़र्ज़ के सिलसिले में है जिसमें क़र्ज़ लेने और देने के नियम बताए गए हैं। क़र्ज़ को लिखा जाय, दो गवाह बनाये जाएं, एक मुंशी हो वगैरह वगैरह। (282, 283) [1]


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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