Khulasa e Qur'an - surah 1 | Surah Fatiha

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (001) अल फ़ातिहा


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (001) अल फ़ातिहा:

तरतीब के लिहाज़ से यह क़ुरआन की पहली और सबसे ज़्यादह पढ़ी जाने वाली सूरह है।

"फ़ातिहा" कहते हैं जिससे किसी मज़मून या किताब या किसी चीज़ की शुरूआत हो। दूसरे लफ़्ज़ों में इसे दीबाचा [भूमिका, प्रस्तावना] और आग़ाज़े-कलाम [प्राक्कथन] का समानार्थी कहा जा सकता है।

वास्तव में यह सूरह एक दुआ है जो अल्लाह ने हर उस बंदे को सिखाई है जो उसकी किताब को पढ़ना शुरू कर रहा हो। किताब के शुरू में इसको रखने का मतलब यह है कि अगर हक़ीक़त में इस किताब से फ़ायदा उठाना है तो पहले रब्बुल आलमीन (जगत-स्वामी) से यह दुआ करनी चाहिए।


सूरह अल फ़ातिहा के क़ई नाम हैं, जैसे उम्मुल क़ुरआन (क़ुरआन की मां) अस सबउल मसानी (बार बार पढ़ी जाने वाली सात आयात), अल क़ुरआन अल अज़ीम (अज़मत वाला क़ुरआन), अस शिफ़ा , अर रकीय: (दम) वगैरह 


इस सूरह में बिस्मिल्लाह समेत कुल 7 आयतें हैं। 

आयत 1 से 4 तक अल्लाह तबारक व तआला की तारीफ़ है और तारीफ़ करने की वजह यह बताई गई है कि वह, 

(1) तमाम दुनिया का पालनहार है। 
(2) रहमान और रहीम है। 
(3) बदले के दिन का मालिक है। 

आयत 5 में एक इक़रार और वादा है जो एक इंसान अपने रब से करता है कि हम किसी और की नहीं बल्कि केवल तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से मदद भी चाहते हैं। 

आयत 6 से दुआ शुरु होती है "ऐ अल्लाह हमें सीधा रास्ता दिखा दे वह सीधा रास्ता जिस पर चल कर लोग इनआम (जन्नत) के हक़दार क़रार पाते हैं। और उन लोगों के रास्ते से महफ़ूज़ रख जिन पर तेरा ग़ज़ब नाज़िल हुआ (जो नरक में जाएंगे) और जो गुमराह हो गए हैं"

ग़ैरिल मगजूब से मुराद यहूदी (Jews) और ज़ाललीन से मुराद ईसाई (Christians) हैं। 


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही


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