खाना खाने की दुआ और सुन्नतें
1. खाना खाने से पहले की दुआ
بِسْمِ اللهِ
बिस्मिल्लाह (Bismillah)
"शुरू अल्लाह के नाम से"
2. शुरू में दुआ पढ़ना भूल जाएं तो ये दुआ पढ़ें
بِسْمِ اللَّهِ أَوَّلَهُ وَآخِرَهُ
"बिस्मिल्लाहि अव्वलहु व अखिरह" (Bismillahi awwalahu wa akhirah)
“शुरू और आखिर में अल्लाह का नाम लेकर खाता हूँ”
3. खाने के बाद की दुआ
(1) सहीह बुखारी 5458:
"शुरू अल्लाह के नाम से"
2. शुरू में दुआ पढ़ना भूल जाएं तो ये दुआ पढ़ें
بِسْمِ اللَّهِ أَوَّلَهُ وَآخِرَهُ
"बिस्मिल्लाहि अव्वलहु व अखिरह" (Bismillahi awwalahu wa akhirah)
“शुरू और आखिर में अल्लाह का नाम लेकर खाता हूँ”
3. खाने के बाद की दुआ
(1) सहीह बुखारी 5458:
الْحَمْدُ لِلَّهِ كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلاَ مُوَدَّعٍ وَلاَ مُسْتَغْنًى عَنْهُ، رَبَّنَا
अल-हम्दु लिल्लाही कसीरन तैय्यबन मुबारकां फीही गैरा मकफी, वाला मुवद'दा वाला मुस्तगनन अन्हु, रब्बना
(Al-hamdu li l-lah kasiran taiyiban mubarakan fihi ghaira makfiy wala muWada` wala mustaghna'anhu Rabbuna)
(Al-hamdu li l-lah kasiran taiyiban mubarakan fihi ghaira makfiy wala muWada` wala mustaghna'anhu Rabbuna)
"तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिये बहुत ज़्यादा पाकीज़ा बरकत वाली हम इस खाने का हक़ पूरी तरह अदा न कर सके और ये हमेशा के लिये रुख़सत (छूट) नहीं किया गया है (और ये इसलिये कहा ताकि ) उस से हमको बेपरवाई का ख़याल न हो ऐ हमारे रब!।"
(2) तिर्मिज़ी 3458; इब्न माजाह 3285:
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنِي هَذَا وَرَزَقَنِيهِ مِنْ غَيْرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلاَ قُوَّةٍ
(2) तिर्मिज़ी 3458; इब्न माजाह 3285:
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنِي هَذَا وَرَزَقَنِيهِ مِنْ غَيْرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلاَ قُوَّةٍ
अल-हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अतअमानी हाज़ा व रज़ाक़निही मिन गैरी हौलिन मिन्नी, वला क़ुव्वतिन, गुफ़िरा लहू मा तक़ददमा मिन ज़ंबिहि
(Al-ḥamdulillāh, alladhī aṭ`amanī hādha wa razaqanīhi min ghairi ḥawlin minnī, wa lā quwwatin, gufira lahu ma taqaddama min zanbihi)
(Al-ḥamdulillāh, alladhī aṭ`amanī hādha wa razaqanīhi min ghairi ḥawlin minnī, wa lā quwwatin, gufira lahu ma taqaddama min zanbihi)
"तमाम तारीफ़ें हैं उस अल्लाह के लिये जिसने हमें ये खाना खिलाया और उसे हमें दिया, मेरी तरफ़ से मेहनत मशक़्क़त और जिद्दोजुह्द और क़ुव्वत और ताक़त के इस्तेमाल के बग़ैर।"
(3) अबू दाऊद 3851:
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَ وَسَقَى وَسَوَّغَهُ وَجَعَلَ لَهُ مَخْرَجًا
अल-हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अतअमा वा सक़ा वा सव्वा अन्हु व जाआ'ला लहू मखराजन
(3) अबू दाऊद 3851:
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَ وَسَقَى وَسَوَّغَهُ وَجَعَلَ لَهُ مَخْرَجًا
अल-हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अतअमा वा सक़ा वा सव्वा अन्हु व जाआ'ला लहू मखराजन
(Al-hamdu Lillah alladhi at’ama wa saqa wa sawwaghahu wa ja’ala lahu makhrajan)
"हम्द उस अल्लाह की जिसने खिलाया-पिलाया, इसे ख़ुशगवार बनाया और इसके बाहर निकलने का निज़ाम भी बना दिया।"
1. दस्तरख़ान बिछाना। [बुख़ारी 2484]
2. खाना एक साथ (परिवार के साथ) खाना। [मुसनद अहमद 16078]
4. खाने से पहले की दुआ (बिस्मिल्लाह) पढ़ना। [तिर्मिज़ी 1858]
5. खाना खाने से पहले की दुआ पढ़ना भूल जाये तो "बिस्मिल्लाहि अव्वलहु व अखिरह" पढ़ें [तिर्मिज़ी 1858; इब्न माजा 3264; दाऊद 3767]
12. टेक लगा कर न खाना। [बुख़ारी 5399]
13. खाने में ऐब न निकलना। [बुख़ारी 3563, 3370; मुस्लिम 2046]
14. अगर खाना पसंद न हो या दिल न करे तो चुप चाप खाना छोड़ देना। [बुख़ारी 3563]
15. बहुत ज़्यादा गर्म न खाना। [मुग़नी अल-मुहताज (4/412); मजमाउज़ ज़वायद, वॉल्यूम 5 पेज 20]
4. खाना खाने की सुन्नतें
1. दस्तरख़ान बिछाना। [बुख़ारी 2484]
2. खाना एक साथ (परिवार के साथ) खाना। [मुसनद अहमद 16078]
3. खाना खाने से पहले हाथ धोना। [सुन्नन नसाई 257]
4. खाने से पहले की दुआ (बिस्मिल्लाह) पढ़ना। [तिर्मिज़ी 1858]
5. खाना खाने से पहले की दुआ पढ़ना भूल जाये तो "बिस्मिल्लाहि अव्वलहु व अखिरह" पढ़ें [तिर्मिज़ी 1858; इब्न माजा 3264; दाऊद 3767]
6. खाने को न फूँकना। [मुसनद अहमद 3194]
7. दाएं (right) हाथ से खाना। [बुख़ारी 5376; मुस्लिम 2022]
8. तीन उँगलियों से खाना, मुमकिन न हो तो चौथी और पाँचवी का इस्तेमाल करना। [मुस्लिम 2032; फत अल-बारी, 9/578]
9. खाने को किनारे से खाना। [तिर्मिज़ी 1805; इब्न माजा 3277]
10. अपने सामने से खाना। [बुख़ारी 5376; मुस्लिम 2022]
11. अगर लुक़मा गिर जाये तो उठा कर खाना (दिल मुत्मइन हो तो)। [मुस्लिम 2034]
7. दाएं (right) हाथ से खाना। [बुख़ारी 5376; मुस्लिम 2022]
8. तीन उँगलियों से खाना, मुमकिन न हो तो चौथी और पाँचवी का इस्तेमाल करना। [मुस्लिम 2032; फत अल-बारी, 9/578]
9. खाने को किनारे से खाना। [तिर्मिज़ी 1805; इब्न माजा 3277]
10. अपने सामने से खाना। [बुख़ारी 5376; मुस्लिम 2022]
11. अगर लुक़मा गिर जाये तो उठा कर खाना (दिल मुत्मइन हो तो)। [मुस्लिम 2034]
12. टेक लगा कर न खाना। [बुख़ारी 5399]
13. खाने में ऐब न निकलना। [बुख़ारी 3563, 3370; मुस्लिम 2046]
14. अगर खाना पसंद न हो या दिल न करे तो चुप चाप खाना छोड़ देना। [बुख़ारी 3563]
15. बहुत ज़्यादा गर्म न खाना। [मुग़नी अल-मुहताज (4/412); मजमाउज़ ज़वायद, वॉल्यूम 5 पेज 20]
16. खजूर, जामुन, अंगूर, वगैरह एक बार में एक ही पीस उठाना। [बुख़ारी 5446]
5. खाना खाने से मुताल्लिक़ कुछ अहादीस
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया,
17. ज़मीन पर बैठ कर खाना खाना। [बुख़ारी 6450]
18. नरम रोटी न खाना। [बुख़ारी 6450]
19. बर्तन और उँगलियों को चाट कर साफ़ करना। [मुस्लिम 2034]
20. खाने के बाद की दुआ पढ़ना। [बुख़ारी 5458; तिर्मिज़ी 3458; दाऊद 3851]
21. खाने के बाद हाथ धोना और कुल्ली करना। [बुख़ारी 5390]
19. बर्तन और उँगलियों को चाट कर साफ़ करना। [मुस्लिम 2034]
20. खाने के बाद की दुआ पढ़ना। [बुख़ारी 5458; तिर्मिज़ी 3458; दाऊद 3851]
21. खाने के बाद हाथ धोना और कुल्ली करना। [बुख़ारी 5390]
5. खाना खाने से मुताल्लिक़ कुछ अहादीस
(1) "तुम में से कोई अपने बाएं हाथ से न खाए और न पिए, क्योंकि शैतान बाएं हाथ से खाता और पीता है। [मुस्लिम 2020]
(2) "बेशक बरकत खाने के बीच में उतरती है, तो उसके किनारों से खाओ, और उसके बीच में से मत खाओ।" [तिर्मिज़ी 1805; इब्न माजा 3277]
(3) "रेशम और दीबा न पहनो और न सोने चाँदी के बर्तन में कुछ पियो और न उन की प्लेटों में कुछ खाओ क्योंकि ये चीज़ें उन (काफ़िरों) के लिये दुनिया में हैं और हमारे लिये आख़िरत में हैं।" [बुख़ारी 5426; मुस्लिम 2067]
(4) "किसी आदमी ने कोई बर्तन अपने पेट से ज़्यादा बुरा नहीं भरा। आदमी के लिये कुछ लुक़मे ही काफ़ी हैं जो उसकी पीठ को सीधा रखें और अगर ज़्यादा ही खाना ज़रूरी हो तो पेट का एक तिहाई हिस्सा अपने खाने के लिये एक तिहाई पानी पीने के लिये और एक तिहाई साँस लेने के लिये बाक़ी रखे।" [तिर्मिज़ी 2380: इब्न माजा 3349]
(2) "बेशक बरकत खाने के बीच में उतरती है, तो उसके किनारों से खाओ, और उसके बीच में से मत खाओ।" [तिर्मिज़ी 1805; इब्न माजा 3277]
(3) "रेशम और दीबा न पहनो और न सोने चाँदी के बर्तन में कुछ पियो और न उन की प्लेटों में कुछ खाओ क्योंकि ये चीज़ें उन (काफ़िरों) के लिये दुनिया में हैं और हमारे लिये आख़िरत में हैं।" [बुख़ारी 5426; मुस्लिम 2067]
(4) "किसी आदमी ने कोई बर्तन अपने पेट से ज़्यादा बुरा नहीं भरा। आदमी के लिये कुछ लुक़मे ही काफ़ी हैं जो उसकी पीठ को सीधा रखें और अगर ज़्यादा ही खाना ज़रूरी हो तो पेट का एक तिहाई हिस्सा अपने खाने के लिये एक तिहाई पानी पीने के लिये और एक तिहाई साँस लेने के लिये बाक़ी रखे।" [तिर्मिज़ी 2380: इब्न माजा 3349]
इन शा अल्लाह अगले आर्टिकल में पानी पीने की दुआ और सुन्नतों के बारे में जानेंगे।
Posted By Islamic Theology
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