sone aur jagne se mutalluq sunnatein

sone aur jagne se mutalluq sunnatein


 सोने और सो कर उठने से मुतअल्लिक़ सुन्नतें


Table of Contents
1.1. सोने की सुन्नतें
1.2. सोने से पहले की दुआएँ
1.3. साइंटिफ़िक़ फ़ायदे
1.4. सोने से मुतअल्लिक़ कुछ अहादीस

2.1. रात करवट बदलने पर ये दुआ पढ़ें
2.2. जब बिस्तर छोड़ दे और फिर लौट आए
2.3. नींद में घबराहट/वहशत के वक़्त की दुआ
2.4. अच्छा या बुरा ख़्वाब आये तो क्या करें?
2.5. अचानक आँख खुल जाये तो क्या करें?
2.6. रात को आँख खुलने से मुतअल्लिक़ हदीस

3.1. सो कर उठने की सुन्नतें
3.2. सो कर उठने की दुआएँ
3.3. साइंटिफ़िक़ फ़ायदे
3.4. सो कर उठने से मुतअल्लिक़ अहादीस


नींद इतनी अहम है कि अल्लाह तआला ने इसे कुरआन में मोमिनीन के लिए एक निशानी के तौर पर इसका ज़िक्र किया है। अल्लाह तआला फरमाता है:

"क्या उनको सुझाई न देता था कि हमने रात उनके लिये सुकून हासिल करने के लिये बनाई थी और दिन को रौशन किया था?" [क़ुरआन 27:86]

"और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन को सोना और तुम्हारा उसके फ़ज़ल को तलाश करना है।" [क़ुरआन 30: 23]

नींद अल्लाह की तरफ से एक इनाम है और हमें इसे ऐसे ही अपनाना चाहिए जैसे हम वुज़ू और दुआ करके नमाज़ के लिए तैयार होते हैं, वैसे ही हमें सोने के लिए भी तैयारी करनी चाहिए। अल्लाह कुरान में फरमाता है कि "वो वह हमारी रूहों को नींद (रात) में क़ब्ज़ कर लेता है।" [क़ुरआन 39:42; 6:60]

रात सोने से पहले हमें खास तौर पर वुज़ू, क़ुरआन की तिलावत और सोने से पहले की दुआएं पढ़ लेनी चाहिए।  अगर हम सोने से पहले और उठने पर अल्लाह को याद करते हैं, तो हमें सुकून मिलेगी जो हम चाहते हैं, "दिलों को अल्लाह की याद से इत्मीनान हासिल होता है।" [क़ुरआन 13:28] तो आइये सोने से पहले से लेकर सो कर उठने के बाद तक क्या क्या करना सुन्नत से साबित है वो जान लेते हैं:


1.1. सोने से पहले की सुन्नतें

1. इशा की नमाज़ से पहले न सोना। [बुख़ारी 568]

2. इशा के बाद जल्दी सोने की फ़िक्र करना, दुनियावी बात न करना। [बुख़ारी 1146]

3. बावज़ू सोना। [बुख़ारी 247]

4. तीन मर्तबा बिस्तर झाड़ना। [बुख़ारी 6320]

5. 33 बार सुब्हान अल्लाह, ‏‏ 33बार अल-हम्द अल्लाह और 34 बार अल्लाहु-अकबर पढ़ना। [बुख़ारी 5362] 

6. तीनों कुल पढ़ना। (सूरह इख़लास, फ़लक़ और नास)। [बुख़ारी 5017]

7. आयतल-कुर्सी पढ़ना। [बुख़ारी 2311]

8. सूरह बक़रा की आख़िरी दो आयतें पढ़ना। [बुख़ारी 5009]

9. सूरह मुल्क और सूरह अस-सजदह पढ़ना। [दाऊद 1400; तिर्मिज़ी 2891,92]

10. सूरह काफ़िरून पढ़ना। [दाऊद 5055]

11. सूरह बनी इसराईल और सूरह ज़ुमर पढ़ना। [तिर्मिज़ी 2920]

12. दाहिनी करवट लेट कर हाथ गाल के नीचे रखना। [बुख़ारी 247, 6314]

13. सोने की दुआ पढ़ना। [बुख़ारी 6324]

14. पेट के बल औंधा न लेटना। [इब्ने माजा 3724]

15. चिराग़ या रौशनी बुझा के सोना। [बुख़ारी 5623; मुस्लिम 2012]


1.2. सोने से पहले की दुआएँ

1. अमूमन पढ़ी जाने वाली दुआ

اللَّهُمَّ بِاسْمِكَ أَمُوتُ وَأَحْيَا

"Allahumma bismika amutu wa ahya,"
''ऐ अल्लाह! तेरे नाम के साथ मरता हूँ और ज़िन्दा होता हूँ।"
[बुख़ारी 6314]


2. या ये दुआ पढ़ें

بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوتُ وَأَحْيَا

"Bismika Allahumma amutu wa ahya"
''तेरे नाम के साथ ऐ अल्लाह! मैं मरता और तेरे ही नाम से जीता हूँ।"
[बुख़ारी 6324]


3. अज़ाब से महफ़ूज़ रहने की दुआ 

 اللَّهُمَّ قِنِي عَذَابَكَ يَوْمَ تَبْعَثُ عِبَادَكَ

"allahumma qini azaabaka yawma tabasu ibaadaka"
''ऐ अल्लाह! जिस दिन तू अपने बन्दों को उठाये मुझे अपने अज़ाब से महफूज़ रखना।" [3 बार पढ़ें]
[अबू दाऊद 5045]


4. अल्लाह की नेमतों के लिए शुक्रगुज़ारी का इज़हार 

الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا وَكَفَانَا وَآوَانَا فَكَمْ مِمَّنْ لاَ كَافِيَ لَهُ وَلاَ مُئْوِيَ

"alhamdu lillahilazi 'atamana wasaqana wakafana wawana fakam mimman la kaafi lahu wala مویا 
"अल्लाह की हम्द है जिसने हमें खिलाया, पिलाया, (हर तरफ़ से) काफ़ी हुआ और हमें ठिकाना दिया। कितने लोग हैं जिनका न कोई किफ़ायत करने वाला है न ही ठिकाना देने वाला।" 
[मुस्लिम 6894]


5. अल्लाह का शुक्र अदा करने की दुआ

الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي كَفَانِي وَآوَانِي وَأَطْعَمَنِي وَسَقَانِي وَالَّذِي مَنَّ عَلَىَّ فَأَفْضَلَ وَالَّذِي أَعْطَانِي فَأَجْزَلَ الْحَمْدُ لِلَّهِ عَلَى كُلِّ حَالٍ اللَّهُمَّ رَبَّ كُلِّ شَىْءٍ وَمَلِيكَهُ وَإِلَهَ كُلِّ شَىْءٍ أَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ‏ 

Alhamdu lillahil-lathi kafani wa-awani, wa-at’amani wa-saqani; wal-lathi manna ‘alayya fa-afdal, wal-lathi a’tani fa-ajzal. Al-hamdu lillahi ‘ala kulli hal. Allahumma rabba kulli shay’in wa-malikah, wa-ilaha kulli shay’in, a’udhu bika minan-nar
"तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिये है जिसने (हर तरह से) मेरी किफ़ायत की और मुझे रहने की जगह इनायत फ़रमाई मुझे खिलाया-पिलाया और जिसने मुझ पर एहसान किया और बहुत ज़्यादा किया जिसने मुझे दिया और बहुत ख़ूब दिया। हर हाल में अल्लाह ही की तारीफ़ है। ऐ अल्लाह! ऐ हर चीज़ के परवरदिगार और उसके मालिक ! ऐ हर चीज़ के माबूद ! मैं आग से तेरी पनाह चाहता हूँ।"
[अबु दाऊद 5058]


6. मग़फ़िरत की दुआ

اللَّهُمَّ خَلَقْتَ نَفْسِي وَأَنْتَ تَوَفَّاهَا لَكَ مَمَاتُهَا وَمَحْيَاهَا إِنْ أَحْيَيْتَهَا فَاحْفَظْهَا وَإِنْ أَمَتَّهَا فَاغْفِرْ لَهَا اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَافِيَةَ 

allahumma khalaqt nafsi wa'ant tawaffaha lak mamatuha wamahyaha 'iin 'ahyaytaha fahfazha wa'iin 'amattaha faghfir laha alllahumm 'inni 'as'aluk aleafia
"ऐ अल्लाह! मेरी जान को तूने पैदा किया और तू ही इस को मौत देगा, इस जान की मौत भी और ज़िन्दगी भी तेरे ही लिये है, अगर तू इस को ज़िन्दा रखे तो इसकी हिफ़ाज़त फ़रमाना और अगर तू इस को मौत दे तो इस की मग़फ़िरत करना, ऐ अल्लाह! मैं तुझ से आफ़ियत माँगता हूँ।"
[मुस्लिम 2712]


7. बेहतर इंसान बनने की दुआ

بِسْمِ اللَّهِ وَضَعْتُ جَنْبِي اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي وَأَخْسِئْ شَيْطَانِي وَفُكَّ رِهَانِي وَاجْعَلْنِي فِي النَّدِيِّ الأَعْلَى

"bismillahi wada'atu janbi allahummaghfirli zanbi wa'akhsi shaytani wafukka rihani wajalni finnadil aala"
"अल्लाह के नाम से मैंने अपना पहलू रख दिया। ऐ अल्लाह! मेरे गुनाह बख़्श दे मेरे शैतान को दफ़ा (दूर) कर दे मेरे नफ़्स को (आग से) आज़ाद कर दे और मुझे आला और बेहतर मजलिस वालों में बना दे। (फ़रिश्तों और नबियों और रसूलों का हम नशीं बना दे)।"
[अबू दाऊद 5054]


8. हिफाज़त की दुआ 

بِاسْمِكَ رَبِّ وَضَعْتُ جَنْبِي، وَبِكَ أَرْفَعُهُ، إِنْ أَمْسَكْتَ نَفْسِي فَارْحَمْهَا، وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ

"Bismika Rabbi Wada`tu Janbi wa bika arfa'uhu, In amsakta nafsi farhamha wa in arsaltaha fahfazha bima tahfazu bihi ibadakas-salihin."
"मेरे पालने वाले! तेरे नाम से मैंने अपना पहलू रखा है और तेरे ही नाम से उठूंगा अगर तूने मेरी जान को रोक लिया तो इस पर रहम करना और अगर छोड़ दिया (ज़िन्दगी बाक़ी रखी) तो उसकी इस तरह हिफ़ाज़त करना जिस तरह तो सालेहीन की हिफ़ाज़त करता है।''
[बुख़ारी 6320]


9. फ़ितरत पर मरने की दुआ 

اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ، وَفَوَّضْتُ أَمْرِي إِلَيْكَ، وَأَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ، رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ، لاَ مَلْجَأَ وَلاَ مَنْجَا مِنْكَ إِلاَّ إِلَيْكَ، اللَّهُمَّ آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ، وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ

"Allahumma aslamtu wajhi ilaika, wa fauwadtu `Amri ilaika, wa alja'tu Zahri ilaika raghbatan wa rahbatan ilaika. La Malja'a wa la manja minka illa ilaika. Allahumma amantu bikitabika-l-ladhi anzalta wa bina-biyika-l ladhi arsalta"
"ऐ अल्लाह! मैंने अपना चेहरा तेरी तरफ़ झुका दिया। अपना मामला तेरे ही सुपुर्द कर दिया। मैंने तेरे सवाब की उम्मीद और तेरे अज़ाब के डर से तुझे ही पुश्त-पनाह बना लिया। तेरे सिवा कहीं पनाह और नजात की जगह नहीं। ऐ अल्लाह! जो किताब तू ने नाज़िल की मैं इस पर ईमान लाया। जो नबी तू ने भेजा मैं उस पर ईमान लाया। तू अगर इस हालत में उसी रात मर गया तो फ़ितरत पर मरेगा।" 
[बुख़ारी 247; इब्ने माजा 3876]


10. अल्लाह से पनाह माँगना

"‏ اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ وَرَبَّ الأَرْضِ وَرَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَىْءٍ فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى وَمُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالإِنْجِيلِ وَالْفُرْقَانِ أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَىْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ اللَّهُمَّ أَنْتَ الأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَىْءٌ وَأَنْتَ الآخِرُ فَلَيْسَ بَعْدَكَ شَىْءٌ وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَىْءٌ وَأَنْتَ الْبَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَىْءٌ اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الْفَقْرِ 

"allahuma rabbssamawati warabbal'ardi warabbalarshilazim rabbana warabba kulli shai'in faliqalhabb wannawaa wamunzilttawrah wal'iinjil walfurqan 'aauzh bika min sharr kulli shai'in 'anta akhidu binasiatihi allahumm 'antal'awwalu falays qablaka shai'iun wa'antalakhiru falaysa ba'adaka shai'iun wa'ant alzzahiru falaysa fawqaka shai'iun wa'antalbatinu falaysa dunaka shai'iun aqd annaddayna wa'aghnina minalfaqr"
"ऐ अल्लाह! ऐ आसमानों के रब और ज़मीन के रब और अर्शे-अज़ीम के रब, ऐ हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने और गुठलियों को चीर (कर पौधे और पेड़ उगा) देने वाले! तौरात, इंजील और फ़ुरक़ान को नाज़िल करने वाले! मैं हर उस चीज़ के शर से तेरी पनाह में आता हूँ जिस की पेशानी तेरे क़ब्ज़े में है, ऐ अल्लाह! तू ही अव्वल है, तुझ से पहले कोई चीज़ नहीं, ऐ अल्लाह! तू ही आख़िर है, तेरे बाद कोई चीज़ नहीं है, तू ही ज़ाहिर है, तेरे ऊपर कोई चीज़ नहीं है, तू ही बातिन है, तुझ से पीछे कोई चीज़ नहीं है, हमारी तरफ़ से (हमारा) क़र्ज़ अदा कर और हमें ग़रीबी से ग़िना (मालदारी) अता फ़रमा।"
[मुस्लिम 2713]‏


1.3. सुन्नत पर अमल के साइंटिफ़िक फ़ायदे 

1. जल्दी सोना लिवर (liver) और रीढ़ की हड्डी के लिए अच्छा होता है। जब हम जल्दी सोते हैं तो लीवर को शरीर के अंदर मौजूद ज़हरीली चीज़ों को बेअसर करने के लिए ज़्यादा वक़्त मिल जाता है।

2. दाहिनी करवट सोने से दिल की बीमारी का ख़तरा कम होता है, इसके साथ ही दाहिनी करवट सोने से जिस्म के दूसरे आज़ा के लिए भी फ़ायदेमंद होता है। ऑर्गन्स ओवरलैप नहीं होते जिससे कई बीमारियों से बचाव होता है। 

3. अँधेरे में सोना प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) के लिए अच्छा है और शरीर की कई बीमारियों से लड़ने की ताक़त में सुधार लाता है। कम रोशनी में प्रतिरक्षा प्रणाली ज़्यादा बेहतर ढंग से पैदा होगी। तेज़ रोशनी में सोने से कैंसर कोशिकाओं (cancer cells) बनते है।

4. पेट के बल सोने से बचना चाहिए क्योंकि ये पोज़ीशन जिस्म के सबसे अहम आज़ा (दिमाग़ और दिल) के लिए नुक़सानदेह है, इस पोज़ीशन में लेटने पर इन दोनों में ऑक्सीजन कम पहुँच पाती है है जिससे कई बीमारियां हो जाती हैं।

5. पेट के बल सोने से रीढ़ की हड्डी में मसअ'ला हो सकता है क्यूंकि जिस्म का सारा वज़न इसी पर टिका होता है। इसके अलावा, पेट के बल सोने से हमें मुंह से सांस लेनी पड़ती है, जिससे सांस की बीमारी का ख़तरा बढ़ जाता है। मुंह से सांस लेना सेहत के लिए अच्छा नहीं है, क्योंकि मुंह से आने वाली हवा के लिए कोई फ़िल्टर नहीं हैं और सारी धूल और गंदगी फेफड़ों में जाती है।

6. सोते समय रसूलुल्लाह की हमेशा एक पोज़ीशन होती थी: पीठ सीधी करना और पैर थोड़ा मोड़ना। यह पोज़ीशन सेहत के लिए अपने आप में फ़ायदेमंद है, यह हमारी सभी मांसपेशियों (muscles) को आराम पहुंचाती है। पैर को थोड़ा मोड़कर हम पेट की मांसपेशियों को आराम देते हैं। इसलिए जब हम अगले दिन उठते हैं, तो हम ज़्यादा तरोताजा, एनर्जेटिक और सेहतमंद महसूस करते हैं।

7. दाएँ हाथ को दाएँ गालों के नीचे रखने से हमारी गर्दन में ऐंठन की नहीं होती क्योंकि नींद में ग़लत पोज़ीशन की वजह से मांसपेशियों में दर्द होता है जो कई दिनों तक बना रह सकता है। 


1.4. सोने से मुतअल्लिक़ कुछ अहादीस

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया,

1. नबी करीम (ﷺ) हर रात जब बिस्तर पर आराम फ़रमाते तो अपनी दोनों हथेलियों को मिला कर सूरा इख़लास, सूरा फ़लक़ और सूरा नास तीनों मुकम्मल पढ़ कर उन पर फूँकते और फिर दोनों हथेलियों को जहाँ तक मुमकिन होता अपने जिस्म पर फेरते थे। पहले सिर और चेहरे पर हाथ फेरते और सामने के बदन पर। ये अमल आप (ﷺ) तीन बार करते थे।" [बुख़ारी 5017]

2. "जिसने सूरा बक़रा की दो आख़िरी आयतें रात में पढ़ लीं वो उसे हर आफ़त से बचाने के लिये काफ़ी हो जाएँगी।" [बुख़ारी 5009]

3. हज़रत अबू-ज़र (रज़ि०) से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया: मैं पेट के बल लेटा हुआ था मेरे पास से नबी ﷺ गुज़रे तो मुझे क़दम मुबारक से टहोका दे कर फ़रमाया : प्यारे जुन्दुब ! ये अहले-जहन्नम के लेटने का अन्दाज़ है। [इब्ने माजा 3724]

4. जब तू सोने लगे या फ़रमाया जब तू अपने बिस्तर पर जाए तो कह : ( اللهم أَسْلَمْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ - - - - - وَنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ ) (ऊपर दी गई 10 दुआओं में दुआ न. 9 देखें) फिर अगर तू इस रात में वफ़ात पा गया तो तेरी मौत फ़ितरत (दीन इस्लाम ) पर होगी और अगर तुझे ( ख़ैरियत से) सुबह हो गई तो तेरी ये सुबह इस हाल में होगी कि तू बहुत भलाई हासिल कर चुका होगा।" [इब्ने माजा 3876] 

5. "क़ुरआन करीम की एक सूरह तीस आयतों वाली (सूरह मुल्क) अपने पढ़ने वाले के लिये सिफ़ारिश करेगी यहाँ तक कि उसे बख़्श दिया जाएगा। (मुराद है) (تباركَ الذِي بيدِهِ المُلكُ)" [अबु दाऊद 1400]

6. "सूरह काफ़िरून ( قل يا أيها الكافرون) पढ़ो और इसी पर अपनी बात चीत ख़त्म कर के सौ जाओ। बेशक इसमें शिर्क से छुटकारे का इज़हार है।" [अबु दाऊद 5055]

7. "नबी (ﷺ) जब तक सूरह बनी इसराईल और सूरा ज़ुमर पढ़ न लेते बिस्तर पर सोते न थे।" [तिर्मिज़ी 2920]

8. फ़ातिमा (रज़ि०) रसूलुल्लाह (ﷺ) की ख़िदमत में हाज़िर हुई थीं और आप से एक ख़ादिम माँगा था फिर आप (ﷺ) ने फ़रमाया कि क्या मैं तुम्हें एक ऐसी चीज़ न बता दूँ जो तुम्हारे लिये उस से बेहतर हो। सोते वक़्त तैंतीस (33) मर्तबा (सुब्हान अल्लाह) ‏‏‏तैंतीस (33) मर्तबा (अल-हम्द अल्लाह) और चौंतीस (34) मर्तबा (अल्लाहु-अकबर) पढ़ लिया करो। सुफ़ियान-बिन-उएना ने कहा कि उन में से एक कलिमा चौंतीस बार कह ले। अली (रज़ि०) ने कहा कि फिर मैंने उन कलमों को कभी नहीं छोड़ा। उन से पूछा गया जंगे-सिफ़्फ़ीन की रातों में भी नहीं? कहा कि सिफ़्फ़ीन की रातों में भी नहीं। [बुख़ारी 5362]

9. अबू-हुरैरा (रज़ि०) से रिवायत है, रसूलुल्लाह (ﷺ) ने मुझे रमज़ान की ज़कात की हिफ़ाज़त पर मुक़र्रर फ़रमाया। (रात में) एक शख़्स अचानक मेरे पास आया। और ग़ल्ले में से लप भर भर कर उठाने लगा। मैंने उसे पकड़ लिया और कहा कि क़सम अल्लाह की! मैं तुझे रसूलुल्लाह (ﷺ) की ख़िदमत में ले चलूँगा। इस पर उसने कहा कि अल्लाह की क़सम! मैं बहुत मोहताज हूँ। मेरे बाल-बच्चे हैं और मैं सख़्त ज़रूरत मन्द हूँ। 
अबू-हुरैरा (रज़ि०) ने कहा, (उसके माफ़ी चाहने पर) मैंने उसे छोड़ दिया। 
सुबह हुई तो रसूलुल्लाह (ﷺ) ने मुझसे पूछा ऐ अबू-हुरैरा! पिछले रात तुम्हारे क़ैदी ने कहा था? 
मैंने कहा या रसूलुल्लाह! उसने सख़्त ज़रूरत और बाल-बच्चों का रोना रोया इसलिये मुझे इस पर रहम आ गया। और मैंने उसे छोड़ दिया। 
आप (ﷺ) ने फ़रमाया कि वो तुम से झूट बोल कर गया है। अभी वो फिर आएगा। 
रसूलुल्लाह (ﷺ) के इस फ़रमाने की वजह से मुझको यक़ीन था कि वो फिर ज़रूर आएगा। इसलिये मैं उसकी ताक मैं लगा रहा। और जब वो दूसरी रात आ के फिर ग़ल्ला उठाने लगा। तो मैंने उसे फिर पकड़ा और कहा कि तुझे रसूलुल्लाह (ﷺ) की ख़िदमत में हाज़िर करूँगा लेकिन अब भी उसकी वही गुज़ारिश थी कि मुझे छोड़ दे मैं मोहताज हूँ। बाल-बच्चों का बोझ मेरे सिर पर है। अब मैं कभी न आऊँगा। मुझे रहम आ गया और मैंने उसे फिर छोड़ दिया। 
सुबह हुई तो रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया, ऐ अबू-हुरैरा! तुम्हारे क़ैदी ने किया? 
मैंने कहा या रसूलुल्लाह! उसने फिर उसी सख़्त ज़रूरत और बाल बच्चों का रोना रोया। जिस पर मुझे रहम आ गया। इसलिये मैंने उसे छोड़ दिया। 
आप (ﷺ) ने इस मर्तबा भी यही फ़रमाया कि वो तुम से झूट बोल कर गया है और वो फिर आएगा। 
तीसरी मर्तबा मैं फिर उसके इन्तिज़ार में था कि उसने फिर तीसरी रात आ कर ग़ल्ला उठाना शुरू किया तो मैंने उसे पकड़ लिया और कहा कि तुझे रसूलुल्लाह (ﷺ) की ख़िदमत में पहुँचना अब ज़रूरी हो गया है। ये तीसरा मौक़ा है। हर मर्तबा तुम यक़ीन दिलाते रहे कि फिर नहीं आओगे। लेकिन तुम बाज़ नहीं आए। 
उसने कहा कि इस मर्तबा मुझे छोड़ दे तो मैं तुम्हें ऐसे कुछ कलिमात सिखा दूँगा जिससे अल्लाह तआला तुम्हें फ़ायदा पहुँचाएगा। 
मैंने पूछा वो कलिमात क्या हैं? 
उसने कहा जब तुम अपने बिस्तर पर लेटने लगो तो आयतल-कुर्सी (الله لا إله إلا هو الحي القيوم) पूरी पढ़ लिया करो। एक निगारां फ़रिश्ता अल्लाह तआला की तरफ़ से बराबर तुम्हारी हिफ़ाज़त करता रहेगा। और सुबह तक शैतान तुम्हारे पास भी नहीं आ सकेगा। 
इस मर्तबा भी फिर मैंने उसे छोड़ दिया। 
सुबह हुई तो रसूलुल्लाह (ﷺ) ने पूछा पिछले रात तुम्हारे क़ैदी ने तुम से क्या मामला किया? 
मैंने कहा या रसूलुल्लाह! उसने मुझे कुछ कलिमात सिखाए और यक़ीन दिलाया कि अल्लाह तआला मुझे इससे फ़ायदा पहुँचाएगा। इसलिये मैंने उसे छोड़ दिया। 
आपने पूछा कि वो कलिमात क्या हैं? 
मैंने कहा कि उसने बताया था कि जब बिस्तर पर लेटो तो आयतल-कुर्सी पढ़ लो। शुरू (الله لا إله إلا هو الحي القيوم) से आख़िर तक। उसने मुझसे ये भी कहा कि अल्लाह तआला की तरफ़ से तुम पर (उसके पढ़ने से) एक निगारां फ़रिश्ता मुक़र्रर रहेगा। और सुबह तक शैतान तुम्हारे क़रीब भी नहीं आ सकेगा। 
सहाबा ख़ैर को सबसे आगे बढ़ कर लेने वाले थे। 
नबी करीम (ﷺ) ने (उन की ये बात सुन कर) फ़रमाया कि हालाँकि वो झूटा था। लेकिन तुम से ये बात सच कह गया है। ऐ अबू-हुरैरा ! तुमको ये भी मालूम है कि तीन रातों से तुम्हारा मामला किस से था? 
उन्होंने कहा, नहीं। 
नबी करीम (ﷺ) ने फ़रमाया कि वो शैतान था। 
[बुख़ारी 2311]

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2.1. रात करवट बदलने पर ये दुआ पढ़ें


إِلَهَ إِلَّا اللهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا الْعَزِيزُ الْغَفَّارُ

'iilah 'illa allh alwahid alqahhar rabb alssamawat wal'ard wama baynahuma aleaziz alghaffar
"अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वो एक है, ज़बरदस्त है, रब है आसमान और ज़मीन का और (उन का) जो कुछ उन दोनों के दरमियान है। बहुत ग़ालिब, बहुत बख़्शने वाला है।"
[अल मुसतदरक लिल हाकिम 1980]


2.2. जब बिस्तर छोड़ दे और फिर उस पर लौट आए


بِاسْمِكَ رَبِّي وَضَعْتُ جَنْبِي وَبِكَ أَرْفَعُهُ فَإِنْ أَمْسَكْتَ نَفْسِي فَارْحَمْهَا وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ

Bismika rabbī waḍa`tu janbī wa bika arfa`uhu, fa’in amsakta nafsī farḥamhā wa in arsaltahā faḥfaẓhā bimā taḥfaẓu bihī `ibādakaṣ-ṣāliḥīn
"ऐ मेरे रब! मैं तेरा नाम ले कर (अपने बिस्तर पर) अपने पहलू को डाल रहा हूँ यानी सोने जा रहा हूँ और तेरा ही नाम ले कर मैं उसे उठाऊँगा भी फिर अगर तू मेरी जान को (सोने ही की हालत में) रोक लेता है। (यानी मुझे मौत दे देता है।) तो मेरी जान पर रहम फ़रमा और अगर तू सोने देता है। तू उसकी वैसी ही हिफ़ाज़त फ़रमा जैसी कि तू अपने नेक और सालेह बन्दों की हिफ़ाज़त करता है।"
[तिर्मिज़ी 3401]


2.3. नींद में घबराहट या वहशत के वक़्त की दुआ 


أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ غَضَبِهِ وَشَرِّ عِبَادِهِ وَمِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَنْ يَحْضُرُونِ

'aauzu bikalimatilllahittamma min ghadabihi washarri ibadihi wamin hamazatishshayatin wa'an yahdurun
"मै अल्लाह के कामिल कलिमात की पनाह में आता हूँ, उसकी नाराज़गी से, उसके बन्दों की शरारतों से, शैतानों के वसवसों से और इस बात से के वो मेरे पास आ जाये।"
[अबु दाऊद 3893]


2.4. अच्छा या बुरा ख़्वाब आये तो क्या करें?

"जब तुममें से कोई ऐसा ख़्वाब देखे जिसे वो पसन्द करता हो तो वो अल्लाह की तरफ़ से होता है। इस पर अल्लाह की हम्द करे और उसे बता देना चाहिये लेकिन अगर कोई उसके सिवा कोई ऐसा ख़्वाब देखता है जो उसे नापसन्द है तो ये शैतान की तरफ़ से होता है इसलिये उसके शर से पनाह माँगे और किसी से ऐसे ख़्वाब का ज़िक्र न करे ये ख़्वाब उसे कुछ नुक़सान नहीं पहुँचा सकेगा।" [बुख़ारी 6985]

"जब आप में से कोई शख़्स ऐसा ख़्वाब देखे जो उसे बुरा लगे तो तीन बार अपनी बाएँ तरफ़ थूके और तीन बार शैतान से अल्लाह की पनाह माँगे और जिस करवट लेटा हुआ था उसे बदल ले।" [मुस्लिम 5904]


2.5. अचानक आँख खुल जाये तो क्या करें?

ये दुआ पढ़ कर नफ़िल नमाज़ पढ़े:


لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ ، لَهُ الْمُلْكُ ، وَلَهُ الْحَمْدُ ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ، سُبْحَانَ اللَّهِ ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ ، وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ

La ilaha illallah wahdahu la sharika lahu, lahul-mulku wa lahul-hamdu, wa Huwa ‘ala kulli shay’in Qadir; Subhan-Allah walhamdu lillahi, wa la ilaha illallahu, wa Allahu Akbar, wa la hawla wa la quwwata illa billahil-‘Aliyil-‘Azim
"अकेले अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं उसका कोई शरीक नहीं बादशाही उसी की है और उसी के लिये सब तारीफ़ है और वो हर चीज़ पर कामिल क़ुदरत रखता है। अल्लाह पाक है और सब तारीफ़ अल्लाह ही के लिये है और अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। और अल्लाह सबसे बड़ा है और बुलन्दियों और अज़मतों वाले अल्लाह की मदद के बग़ैर न बुराई से बचाव मुमकिन है न नेकी की ताक़त।"
[बुख़ारी 1154; इब्ने माजह 3878]


रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "अल्लाह इस आदमी पर रहम फ़रमाए जो रात को उठा और उसने नमाज़ (तहज्जुद) पढ़ी फिर उसने अपनी बीवी को जगाया उसने भी नमाज़ (तहज्जुद) पढ़ी और अगर वो ( उठने से) इनकार करे तो इस के चेहरे पर पानी के छींटे मारे। उसी तरह अल्लाह रहम फ़रमाए उस औरत पर जो रात को उठी और नमाज़ पढ़ी फिर अपने शौहर को जगाया और उसने भी नमाज़ पढ़ी और अगर उसने इनकार किया तो उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे।" [सुन्नन नसाई 1611]


2.6. रात को आँख खुलने पर ये दुआ पढ़ें से मुतअल्लिक़ हदीस

जिस शख़्स की रात को आँख खुल गई और उसने जाग कर इस तरह कहा : 

لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ ، لَهُ الْمُلْكُ ، وَلَهُ الْحَمْدُ ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ، سُبْحَانَ اللَّهِ ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ ، وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ 

"अकेले अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं उसका कोई शरीक नहीं बादशाही उसी की है और उसी के लिए सब तारीफ़ है और वो हर चीज़ पर कामिल क़ुदरत रखता है। अल्लाह पाक है और सब तारीफ़ अल्लाह ही के लिये है और अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। और अल्लाह सबसे बड़ा है और बुलन्दियों और अज़मतों वाले अल्लाह की मदद के बग़ैर न बुराई से बचाव मुमकिन है न नेकी की ताक़त।" 

फिर उसके बाद उसने ये दुआ की: ( رَبِّ اغْفِرْلِي ) ऐ मेरे रब! मुझे बख़्श दे। 

तो उसकी बख़्शिश हो जाएगी। 

फिर दुआ करता है तो उसकी दुआ क़बूल हो जाती है। अगर उठ कर वुज़ू करता है। फिर नमाज़ पढ़ता है तो उसकी नमाज़ क़बूल होती है। 

[इब्ने माजह 3878]

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3.1. सो कर उठने की दुआ 


الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَ مَا أَمَاتَنَا وَإِلَيْهِ النُّشُورُ

"Al-Hamdu lil-lahi al-ladhi ahyana ba'da ma amatana, wa ilaihi an-nushur."
"तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जिसने हमें ज़िन्दा किया उसके बाद कि हमें मौत (मुराद नींद है) दे दी थी और तेरी ही तरफ़ जाना है।''
[बुख़ारी 6314]


الحمد لله الذي عافاني في جسدي ورد علي روحي وأذن لي بذكره

alhamd lilah aladhi eafani fi jasadi warada eali ruhi wadhin li bidhikrih
"तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जिसने मेरे बदन को सेहत मन्द रखा और मेरी रूह मुझ पर लौटा दी और मुझे अपनी याद की इजाज़त (और तौफ़ीक़) दी।"
[तिर्मिज़ी 3401]


3.2. सो कर उठने की सुन्नतें

1. सुबह जल्दी उठना। [इब् माजह 4141]

2. नींद से उठते ही दोनों हाथों से चेहरे और आँखों को मलना। [बुख़ारी 183]

3. सो कर उठने की दुआ पढ़ना। [बुख़ारी 6314]

4. मिस्वाक करना। [ बुख़ारी 245]

5. वुज़ू करे और तीन मर्तबा नाक झाड़े। [बुख़ारी 3295]


3.3. साइंटिफ़िक़ फ़ायदे

1. ज़ेहनी सेहत में सुधार होता है। 

2. जिस्मानी सेहत बेहतर होती है। 

3. रूहानी बेदारी में इज़ाफ़ा होता है। 

4.वक़्त का इस्तेमाल बेहतर ढंग से होता है। 

5. दिन भर के काम बिना परेशानी के आसानी से हो जाते हैं। 



3.4. सो कर उठने से मुतअल्लिक़ अहादीस

 नबी करीम (ﷺ) ने फ़रमाया, 

1. "ऐ अल्लाह! मेरी उम्मत को उस के दिन के शुरूआती हिस्से  में बरकत दे दे।" [तिर्मिज़ी 1212]

2. "जो शख़्स रात को जागे और अपनी बीवी को भी जगाए फिर वो दोनों दो रकअतें पढ़ें तो उनकी गिनती ज़ाकरीन और ज़ाकिरात में होती है जो अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाले होते हैं।" [दाऊद 1451]

3. "जब कोई शख़्स सो कर उठे और फिर वुज़ू करे तो तीन मर्तबा नाक झाड़े क्योंकि शैतान रात भर उसकी नाक के नथने पर बैठा रहता है (जिससे आदमी पर सुस्ती ग़ालिब आ जाती है। इसलिये नाक झाड़ने से वो सुस्ती दूर हो जाएगी)।" [बुख़ारी 3295]

4. "जब कोई तुम में से अपने बिस्तर पर से उठ जाए फिर लौटकर उसपर (लेटने-बैठने) आए तो उसे चाहिये कि अपने इज़ार (तहबंद) के (पल्लू) कोने और किनारे से तीन बार बिस्तर को झाड़ दे इस लिये कि उसे कुछ पता नहीं कि उसके उठ कर जाने के बाद वहाँ कौन-सी चीज़ आ कर बैठी या छिपी है। 
फिर जब लेटे तो कहे: 
باسمك ربي وضعت جنبي وبك أرفعه فإن أمسكت نفسي فارحمها وإن أرسلتها فاحفظها بما تحفظ به عبادك الصالحين
"ऐ मेरे रब! मैं तेरा नाम ले कर (अपने बिस्तर पर) अपने पहलू को डाल रहा हूँ यानी सोने जा रहा हूँ और तेरा ही नाम ले कर मैं उसे उठाऊँगा भी फिर अगर तू मेरी जान को (सोने ही की हालत में) रोक लेता है। (यानी मुझे मौत दे देता है।) तो मेरी जान पर रहम फ़रमा और अगर तू सोने देता है। तू उसकी वैसी ही हिफ़ाज़त फ़रमा जैसी कि तू अपने नेक और सालेह बन्दों की हिफ़ाज़त करता है।" 
फिर नींद से बेदार हो जाए तो उसे चाहिये कि कहे: 
الحمد لله الذي عافاني في جسدي ورد علي روحي وأذن لي بذكره 
"तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जिसने मेरे बदन को सेहत मन्द रखा और मेरी रूह मुझ पर लौटा दी और मुझे अपनी याद की इजाज़त (और तौफ़ीक़) दी।" 
[तिर्मिज़ी 3401]
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नोट: इस आर्टिकल को अहादीस की रौशनी में तैयार किया गया है, रोमन इंग्लिश में लिखी हुई दुआओं को दूसरी साइट्स से कॉपी किया गया है इसमें गलतियां हो सकती है बारा ए मेहरबानी अरबी में पढ़ने की कोशिश करें। अगर कोई गलती नज़र आये या कुछ समझ न आये तो हमसे व्हाट्सप्प पर कांटेक्ट करें। जज़ाक अल्लाह खैर 


Posted By Islamic Theology

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