Nabi saw ke paigambar hone ka saboot (part-2)

Nabi saw ke paigambar hone ka saboot (part-2)

हजरत मुहम्मद ﷺ के अल्लाह के पैग़म्बर होने के सबूत


हजरत मुहम्मद ﷺ की जिंदगी में उनके पैग़म्बर होने के सबूत (पार्ट 2)


हजरत मुहम्मद ﷺ की जिंदगी इस बात की दलील है कि वह अल्लाह की तरफ से पैगम्बर है। हजरत मुहम्मद ﷺ पर अल्लाह का संदेश चालीस साल की उम्र में आया और उनकी ये चालीस साल की जिंदगी इस बात की गवाह है कि वह पैगम्बर बनाए जाने से पहले उन बातों को नहीं जानते थे जो वह पैगम्बर बनाए जाने के बाद पेश कर रहे थे। और अल्लाह ने इसी बात को हजरत मुहम्मद ﷺ के सच्चे पैगम्बर होने को दलील के तौर पर अपने आखिरी पैग़ाम कुरआन में बयान किया है:


وَ کَذٰلِکَ اَوۡحَیۡنَاۤ اِلَیۡکَ رُوۡحًا مِّنۡ اَمۡرِنَا ؕ مَا کُنۡتَ تَدۡرِیۡ مَا الۡکِتٰبُ وَ لَا الۡاِیۡمَانُ وَ لٰکِنۡ جَعَلۡنٰہُ نُوۡرًا نَّہۡدِیۡ بِہٖ مَنۡ نَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِنَا ؕ وَ اِنَّکَ لَتَہۡدِیۡۤ اِلٰی صِرَاطٍ مُّسۡتَقِیۡمٍ

"और इसी तरह (ऐ नबी) हमने अपने हुक्म से एक रूह तुम्हारी तरफ़ वह्य (प्रकाशना) की है। तुम्हें कुछ पता न था कि किताब क्या होती है और ईमान क्या होता है, मगर उस रूह को हमने एक रौशनी बना दिया जिससे हम रास्ता दिखाते हैं अपने बन्दों में से जिसे चाहते हैं। यक़ीनन तुम सीधे रास्ते की तरफ़ रहनुमाई कर रहे हो।"

[कुरआन 42:52]


हजरत मुहम्मद ﷺ को पैग़म्बर बनाए जाने से पहले कभी उनके ज़ेहन में ये ख़याल तक न आया था कि उनको कोई किताब मिलनेवाली है या मिलनी चाहिये, बल्कि आप (ﷺ) सिरे से आसमानी किताबों और उनमें बयान की गई बातों के बारे में कुछ जानते ही न थे। इसी तरह आप (ﷺ) को अल्लाह पर ईमान तो ज़रूर हासिल था, मगर आप (ﷺ) न शुऊरी तौर पर अच्छी तरह इस तफ़सील से वाक़िफ़ थे कि इन्सान को अल्लाह के बारे में क्या-क्या बातें माननी चाहियें और न आप (ﷺ) को ये मालूम था कि इसके साथ फ़रिश्तों और नुबूवत और अल्लाह की किताबों और आख़िरत के बारे में भी बहुत-सी बातों का मानना ज़रूरी है। ये दोनों बातें ऐसी थीं जो ख़ुद मक्का के ग़ैर-मुस्लिमों से भी छिपी हुई न थीं। मक्का का कोई शख़्स ये गवाही न दे सकता था कि उसने पैग़म्बरी के अचानक एलान से पहले कभी मुहम्मद (ﷺ) की ज़बान से अल्लाह की किताब का कोई ज़िक्र सुना हो, या आप से इस तरह की कोई बात सुनी हो कि लोगों को फ़ुलाँ-फ़ुलाँ चीज़ों पर ईमान लाना चाहिये। ज़ाहिर बात है कि अगर कोई आदमी पहले से ख़ुद नबी बन बैठने की तैयारी कर रहा हो तो उसकी ये हालत तो कभी नहीं हो सकती कि चालीस साल तक उसके साथ रात-दिन का मेल-जोल रखनेवाले उसकी ज़बान से अल्लाह की किताब और ईमान का लफ़्ज़ तक न सुनें और चालीस साल के बाद यकायक वो इन्हीं बातों पर धुआँधार तक़रीर करने लगे। इसी बात को अल्लाह ने कुरआन में दूसरे अंदाज में कुछ यूं बताया है कि:


وَ مَا کُنۡتَ تَرۡجُوۡۤا اَنۡ یُّلۡقٰۤی اِلَیۡکَ الۡکِتٰبُ اِلَّا رَحۡمَۃً مِّنۡ رَّبِّکَ فَلَا تَکُوۡنَنَّ ظَہِیۡرًا لِّلۡکٰفِرِیۡنَ

"तुम इस बात के हरगिज़ उम्मीदवार न थे कि तुमपर किताब उतारी जाएगी, ये तो सिर्फ़ तुम्हारे रब की मेहरबानी से (तुमपर उतारी गई है ), इसलिये तुम (ख़ुदा के) इन्कारियों के मददगार न बनो।"

[कुरआन 28:86]


यहां अल्लाह इस बात को मुहम्मद (ﷺ) की पैग़म्बरी के सुबूत में पेश कर रहा है। कि हजरत मुहम्मद ﷺ बिलकुल बेख़बर थे कि उन्हें नबी बनाया जानेवाला है और एक बहुत बड़े मिशन पर वो लगाए जानेवाले हैं, उनके ज़ेहन के किसी कोने में भी इसका इरादा या ख़ाहिश तो एक तरफ़ इसकी उम्मीद तक कभी न गुज़री थी। मक्का के लोग ख़ुद जानते थे कि हिरा की गुफा से जिस दिन आप पैग़म्बरी का पैग़ाम लेकर उतरे उससे एक दिन पहले तक आप (ﷺ) की दिलचस्पियाँ और सरगर्मियाँ किस तरह की थीं। ये पूरी ज़िन्दगी सच्चाई, ईमानदारी, अमानत और पाकबाज़ी से भरी ज़रूर थी। इसमें इन्तिहाई शराफ़त, अमन-पसन्दी, वादे का ख़याल रखना, हक़ों को अदा करना और समाज की ख़िदमत का रंग भी ग़ैर-मामूली शान के साथ नुमायाँ था। मगर इसमें कोई चीज़ ऐसी मौजूद न थी जिसकी बुनियाद पर किसी के वहमो-गुमान में भी ये ख़याल गुज़र सकता हो कि ये नेक बन्दा कल ख़ुदा का पैग़म्बर होने का दावा लेकर उठनेवाला है। 

आप (ﷺ) से सबसे ज़्यादा क़रीबी ताल्लुक़ात रखनेवालों में, आप के रिश्तेदारों और पड़ोसियों और दोस्तों में कोई शख्स यह न कह सकता था कि आप (ﷺ) पहले से नबी बनने की तैयारी कर रहे थे। किसी ने उन बातों और मामलों के बारे में कभी एक लफ़्ज़ तक आप (ﷺ) की ज़बान से न सुना था जो हिरा नामक गुफा की उस इंक़िलाबी घड़ी के बाद यकायक आप (ﷺ) की ज़बान पर जारी होने शुरू हो गए। कभी आप (ﷺ) तक़रीर करने खड़े न हुए थे। कभी कोई दावत और तहरीक लेकर न उठे थे, बल्कि कभी आप (ﷺ) की किसी सरगर्मी से ये गुमान तक न हो सकता था कि आप इज्तिमाई मसलों के हल, या मज़हबी सुधार या अख़लाक़ी सुधार के लिये कोई काम शुरू करने की फ़िक्र में हैं। इस इंक़िलाबी घड़ी से एक दिन पहले तक आप (ﷺ) की ज़िन्दगी एक ऐसे ताजिर की ज़िन्दगी नज़र आती थी जो सीधे-सादे जाइज़ तरीक़ों से अपनी रोज़ी कमाता है, अपने बाल-बच्चों के साथ हँसी-ख़ुशी रहता है, मेहमानों की ख़ातिरदारी, ग़रीबों की मदद और रिश्तेदारों से अच्छा सुलूक करता है और कभी-कभी इबादत करने के लिये तन्हाई में जा बैठता है। ऐसे शख़्स का यकायक एक आलमगीर भूकम्प पैदा कर देनेवाली तक़रीर के साथ उठना, एक इंक़िलाब लानेवाली दावत शुरू कर देना, एक निराला लिट्रेचर पैदा कर देना, ज़िन्दगी का एक मुस्तक़िल फ़लसफ़ा और निज़ामे-फ़िक्र और अख़लाक़ व तमद्दुन लेकर सामने आ जाना, इतनी बड़ी तब्दीली है जो इन्सानी नफ़सियात के लिहाज़ से किसी बनावट और तैयारी और इरादी कोशिश के नतीजे में हरगिज़ पैदा नहीं हो सकती। इसलिये कि ऐसी हर कोशिश और तैयारी बहरहाल दर्जा-ब-दर्जा तरक़्क़ी के मरहलों से गुज़रती है और ये मरहले उन लोगों से कभी छिपे नहीं रह सकते जिनके बीच आदमी दिन-रात ज़िन्दगी गुजारता हो। अगर मुहम्मद (ﷺ) की ज़िन्दगी इन मरहलों से गुज़री होती तो मक्का में सैकड़ों ज़बानें ये कहनेवाली होतीं कि हम न कहते थे, ये आदमी एक दिन कोई बड़ा दावा लेकर उठनेवाला है। लेकिन इतिहास गवाह है कि मक्का के इस्लाम-दुश्मनों ने आप (ﷺ) पर हर तरह के एतिराज़ किये, मगर ये एतिराज़ कनरेवाला उनमें से कोई एक आदमी भी न था। 

फिर ये बात कि मुहम्मद (ﷺ) ख़ुद भी पैग़म्बरी के ख़ाहिशमन्द या उसकी उम्मीद और इन्तिज़ार में न थे, बल्कि पूरी बेख़बरी की हालत में अचानक आप (ﷺ) को इस मामले का सामना करना पड़ा, इसका सुबूत उस घटना से मिलता है जो हदीसों में वह्य की शुरूआत की कैफ़ियत के बारे में नक़ल हुई है। 

हजरत मुहम्मद (ﷺ) पर वह्य का शुरूआती दौर अच्छे सच्चे और पाकीज़ा ख़्वाबों से शुरू हुआ। आप (ﷺ) ख़्वाब में जो कुछ देखते वो सुबह की रौशनी की तरह सही और सच्चा साबित होता। फिर क़ुदरत की तरफ़ से आप (ﷺ) तन्हाई पसन्द हो गए और आप (ﷺ) ने ग़ारे-हिरा में ख़िलवत नशीनी (एकान्तवास) इख़्तियार फ़रमाई और कई-कई दिन और रात वहाँ मुसलसल इबादत और यादे-इलाही और ज़िक्र और फ़िक्र में मशग़ूल रहते। जब तक घर आने को दिल न चाहता तोशा (खाने-पीने का सामान) साथ लिये हुए वहाँ रहते। तोशा ख़त्म होने पर ही बीवी मोहतरमा ख़दीजा (रज़ि०) के पास तशरीफ़ लाते और कुछ तोशा साथ ले कर फिर वहाँ जा कर ख़िलवत गुज़ीं (एकान्तवासी) हो जाते, यही तरीक़ा जारी रहा यहाँ तक कि आप (ﷺ) पर हक़ खुल गया और आप (ﷺ) ग़ारे-हिरा ही में क़ियाम पज़ीर थे कि अचानक जिब्राईल (अलैहि०) आप (ﷺ) के पास हाज़िर हुए और कहने लगे कि:

ऐ मुहम्मद! पढ़ो आप (ﷺ) फ़रमाते हैं कि मैंने कहा कि मैं पढ़ना नहीं जानता। आप (ﷺ) फ़रमाते हैं कि फ़रिश्ते ने मुझे पकड़ कर इतने ज़ोर से भींचा कि मेरी ताक़त जवाब दे गई। फिर मुझे छोड़ कर कहा कि पढ़ो! मैंने फिर वही जवाब दिया कि मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ। इस फ़रिश्ते ने मुझको बहुत ही ज़ोर से भींचा कि मुझको सख़्त तकलीफ़ महसूस हुई। फिर उसने कहा कि पढ़! मैंने कहा कि मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ। फ़रिश्ते ने तीसरी बार मुझको पकड़ा और तीसरी मर्तबा फिर मुझको भींचा, फिर मुझे छोड़ दिया और कहने लगा कि पढ़ो! अपने रब के नाम की मदद से जिसने पैदा किया और इन्सान को ख़ून की फुटकी से बनाया। पढ़ो और आपका रब बहुत ही मेहरबानियाँ करने वाला है।

इसलिये यही आयतें आप (ﷺ) जिब्राईल (अलैहि०) से सुन कर इस हाल में ग़ारे-हिरा से वापस हुए कि आप (ﷺ) का दिल इस अनोखे वाक़िए से काँप रहा था। आप (ﷺ) अपनी बीवी ख़दीजा के यहाँ तशरीफ़ लाए और फ़रमाया कि मुझे कम्बल ओढ़ा दो, मुझे कम्बल उढ़ा दो। ख़दीजा (रज़ि०) ने आप (ﷺ) को कम्बल उढ़ा दिया।

जब आप (ﷺ) का डर जाता रहा। तो आप (ﷺ) ने अपनी बीवी मोहतरमा ख़दीजा (रज़ि०) को तफ़सील के साथ ये वाक़िआ सुनाया। और फ़रमाने लगे कि मुझको अब अपनी जान का ख़ौफ़ हो गया है। आप (ﷺ) की बीवी मोहतरमा ख़दीजा (रज़ि०) ने आप (ﷺ) को ढारस बँधाई और कहा कि आपका ख़याल सही नहीं है। अल्लाह की क़सम! आप को अल्लाह कभी रुसवा नहीं करेगा। आप तो बेहतरीन अख़लाक़ के मालिक हैं। आप तो कुंबा परवर हैं। बे-कसों का बोझ अपने सिर पर रख लेते हैं, मुफ़लिसों के लिये आप कमाते हैं, मेहमान नवाज़ी में आप बे-मिसाल हैं और मुश्किल वक़्त में आप हक़ का साथ देते हैं। ऐसी ख़ूबियों वाला इन्सान इस तरह बे-वक़्त ज़िल्लत और ख्व़ारी की मौत नहीं पा सकता।

फिर मज़ीद तसल्ली के लिये ख़दीजा (रज़ि०) आप (ﷺ) को वरक़ा-बिन-नौफ़ल के पास ले गईं जो उनके चचा ज़ाद भाई थे और ज़मानाए-जाहिलियत में नसरानी (ईसाई) मज़हब इख़्तियार कर चुके थे और इबरानी ज़बान के कातिब थे; चुनांचे इंजील को भी हसबे-मंशाए-ख़ुदावन्दी इबरानी ज़बान में लिखा करते थे। (इंजील सुर्यानी ज़बान में नाज़िल हुई थी। फिर उसका तर्जमा इबरानी ज़बान में हुआ। वरक़ा उसी को लिखते थे) वो बहुत बूढ़े हो गए थे यहाँ तक कि उनकी आँख की रौशनी भी रुख़सत (ख़त्म) हो चुकी थी। ख़दीजा (रज़ि०) ने उन के सामने आप (ﷺ) के हालात बयान किये और कहा कि ऐ चचा ज़ाद भाई! अपने भतीजे (मुहम्मद ﷺ) की ज़बानी ज़रा उन की कैफ़ियत सुन लीजिये वो बोले कि भतीजे आप ने जो कुछ देखा है उसकी तफ़सील सुनाओ। चुनांचे आप (ﷺ) ने अव्वल से आख़िर तक पूरा वाक़िआ सुनाया। जिसे सुन कर वरक़ा बे इख़्तियार हो कर बोल उठे कि ये तो वही हस्ती (पाकबाज़ फ़रिश्ता) है जिसे अल्लाह ने मूसा (अलैहि०) पर वह्य देकर भेजा था। काश! मैं आपके इस अहदे-नुबूवत के शुरू होने पर जवान उम्र होता। काश! मैं उस वक़्त तक ज़िन्दा रहता जबकि आपकी क़ौम आप को इस शहर से निकाल देगी। रसूलुल्लाह (ﷺ) ने ये सुन कर ताज्जुब से पूछा कि क्या वो लोग मुझको निकाल देंगे? (हालाँकि मैं तो उन में सच्चा और अमीन और मक़बूल हूँ) वरक़ा बोले हाँ ये सब कुछ सच है। मगर जो शख़्स भी आपकी तरह बात हक़ ले कर आया लोग उसके दुश्मन ही हो गए हैं। अगर मुझे आपकी नुबूवत का वो ज़माना मिल जाए तो मैं आपकी पूरी-पूरी मदद करूँगा। मगर वरक़ा कुछ दिनों के बाद इंतिक़ाल कर गए। [सहीह बुखारी : 3]

ये पूरा वाक़िआ उस हालत की तस्वीर पेश कर देता है, जो बिलकुल फ़ितरी तौर पर यकायक उम्मीद के ख़िलाफ़ एक इन्तिहाई ग़ैर-मामूली तजरिबा पेश आ जाने से किसी सीधे-सादे इन्सान पर छा सकती है। अगर मुहम्मद (ﷺ) पहले से नबी बनने की फ़िक्र में होते, अपने बारे में ये सोच रहे होते कि मुझ जैसे आदमी को नबी होना चाहिये और उसके इन्तिज़ार में मुराक़बे (ध्यान और साधना) कर-करके अपने ज़ेहन पर ज़ोर डाल रहे होते कि कब कोई फ़रिश्ता आता है और मेरे पास पैग़ाम लाता है, तो हिरा नाम की गुफावाला मामला पेश आते ही आप (ﷺ) ख़ुशी से उछल पड़ते और बड़े दम-दावो के साथ पहाड़ से उतर कर सीधे अपनी क़ौम के सामने पहुँचते और अपनी पैग़म्बरी का ऐलान कर देते। लेकिन इसके बरख़िलाफ़ यहाँ हालत ये है कि जो कुछ देखा था उसपर हैरान रह जाते हैं, काँपते और थरथराते हुए घर पहुँचते हैं, लिहाफ़ ओढ़कर लेट जाते हैं, ज़रा दिल ठहरता है तो बीवी को चुपके से बताते हैं कि आज हिरा की गुफा कि तन्हाई में मुझपर ये हादिसा गुज़रा है, पता नहीं क्या होनेवाला है, मुझे अपनी जान की ख़ैर नज़र नहीं आती। ये कैफ़ियत पैग़म्बरी के किसी उम्मीदवार की कैफ़ियत से कितनी अलग है।

फिर बीवी से बढ़कर शौहर की ज़िन्दगी उसके हालात और उसके ख़यालात को कौन जान सकता है? 

अगर उनके तजरिबे में पहले से ये बात आई हुई होती कि मियाँ नुबूवत के उम्मीदवार हैं और हर वक़्त फ़रिश्ते के आने का इन्तिज़ार कर रहे हैं तो उनका जवाब हरगिज़ वो न होता जो हज़रत ख़दीजा ने दिया। वो कहतीं कि मियाँ घबराते क्यों हो, जिस चीज़ की मुद्दतों से तमन्ना थी वो मिल गई, चलो, अब पीरी की दूकान चमकाओ, मैं भी नज़राने संभालने की तैयारी करती हूँ। लेकिन वो पन्द्रह बरस की रफ़ाक़त में आपकी ज़िन्दगी का जो रंग देख चुकी थीं उसकी बिना पर उन्हें ये बात समझने में एक लम्हे की भी देर न लगी कि ऐसे नेक और बेलोस इन्सान के पास शैतान नहीं आ सकता, न अल्लाह उसको किसी बुरी आज़माइश में डाल सकता है, उसने जो कुछ देखा है वो सरासर हक़ीक़त है।

और यही मामला वरक़ा-बिन-नौफ़ल का भी है। वो कोई बाहर के आदमी न थे बल्कि आप (ﷺ) की अपनी ब्रादरी के आदमी और क़रीब के रिश्ते से ब्रादारे-निस्बती थे। फिर एक ज़ी-इल्म (प्रचंड विद्वान) ईसाई होने की हैसियत से नुबूवत और किताब और वह्य को बनावट और तसन्नो से अलग कर सकते थे। उम्र में कई साल बड़े होने की वजह से आपकी पूरी ज़िन्दगी बचपन से उस वक़्त तक उनके सामने थी। उन्होंने भी आपकी ज़बान से हिरा की सरगुज़श्त सुनते ही फ़ौरन कह दिया कि ये आने वाला यक़ीनन वही फ़रिश्ता है जो मूसा (अलैहि०) पर वह्य लाता था। क्योंकि यहाँ भी वही सूरत पेश आई थी जो हज़रत मूसा के साथ पेश आई थी कि एक इन्तिहाई पाकीज़ा सीरत का सीधा-सादा इन्सान बिलकुल ख़ाली ज़हन है, नुबूवत की फ़िक्र में रहना तो दरकिनार, उसके हुसूल का तसव्वुर तक उसके ज़हन के कोने में भी नहीं आया है और अचानक वो पूरे होश व हवास की हालत में ऐलानिया इस तजरिबे से दोचार होता है। इसी चीज़ ने उनको दो और दो चार की तरह बिना देर किये इस नतीजे तक पहुँचा दिया कि यहाँ कोई नफ़स का धोखा या शैतानी करिश्मा नहीं है, बल्कि उस सच्चे इन्सान ने अपने किसी इरादे और ख़ाहिश के बग़ैर जो कुछ देखा है वो असल में हक़ीक़त ही का देखना है।

ये मुहम्मद (ﷺ) कि नुबूवत का एक ऐसा खुला सुबूत है कि एक हक़ीक़त-पसन्द इन्सान मुश्किल ही से इसका इनकार कर सकता है।


जुड़े रहे इस्लामिक थियोलॉजी ब्लॉग के साथ इंशा अल्लाह जल्द आपके सामने हजरत मुहम्मद ﷺ की जिंदगी में उनके पैग़म्बर होने के सबूत का पार्ट 3 आएगा।


By- इस्लामिक थियोलॉजी

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