माँ की नाफरमानी की सज़ा
जुरैज एक इबादतगुज़ार आदमी थे। उन्होंने नुकिली छत वाली एक इबादतगाह बना ली।
वो इस के अंदर थें के उनकी वालिदा आई और इस वक्त वो नमाज पढ़ रहे हैं।
उनकी मां ने पुकार कर कहा: जुरैज!
जुरैज ने कहा: मेरे रब! एक तरफ मेरी मां है और दूसरी तरफ मेरी नमाज है। फिर वो अपनी नमाज की तरफ मुतवज्जह हो गए और माँ चली गई।
जब दुसरा दिन हुआ तो मां फिर आई। जुरैज उस वक्त भी नमाज पड़ रहे थे।
मां ने फिर आवाज लागी: ऐ जुरैज!
जुरैज ने कहा: मेरे परवरदिगार! एक तरफ मेरी मां है और दूसरी तरफ मेरी नमाज है। उन्होंने नमाज की तरफ तवज्जह कर ली।
वो (मां) फिर चली गई।
फिर जब अगला दिन हुआ तो वो आई और आवाज दी: जुरैज!
फिर जब अगला दिन हुआ तो वो आई और आवाज दी: जुरैज!
जुरैज ने कहा : मेरे परवरदिगार! मेरी माँ है और मेरी नमाज है, फिर वो अपनी नमाज में लग गए।
तो माँ ने कहा: ऐ अल्लाह! बदकर औरतों का मुह देखने से पहले इसे मौत ना देना।
बनी इसराइल आपस में जुरैज और उनकी इबादतगुज़ारी की चर्चा करने लगे।
वहां एक बदकार औरत थी जिसके हुस्न की मिसाल दी जाती थी।
वो कहने लगी: अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी खातिर इसे फ़ितने में डाल सकती हूँ।
और उस औरत ने अपने आप को जुरैज के सामने पेश किया। लेकिन जुरैज उसकी तारफ मुतवज्जह न हुए।
वो औरत एक चारवाहे के पास गई जो (धूप या बरसात में) जुरैज की इबादत गाह की पनाह लिया करता था। उस औरत ने चारवाहे को अपने आप को पेश किया तो उस चारवाहे ने औरत के साथ बदकरी की और वो हामिला हो गई।
जब उस औरत ने बच्चे को जन्म दिया तो कहा: ये बच्चा जुरैज का है।
लोग जुरैज के पास आए। उन्हे (इबादतगाह से) नीचे आने का कहा। उनकी इबादतगाह ढाह (तोड) दी और उन्हे मारना शुरू कर दिया।
जुरैज ने पूछा: तुम लोगों को क्या हुआ है?
लोगों ने कहा: तुमने इस बदकार औरत से ज़िना किया है और इसने तुम्हारे बच्चे को जन्म दिया है।
जुरैज ने पूछा: बच्चा कहां है?
वो बच्चे को ले आए।
जुरैज ने कहा: मुझे नमाज पढ़ लेने दो, फिर उन्होन ने नमाज पढ़ी, जब नमाज से फारिग हुए तो बच्चों के पास आए, इस के पेट में उन्गली चुभोई,
पूछा: बच्चे! तुम्हारा बाप कौन है।
बच्चे ने जवाब दिया: मेरा बाप फला चारवाहा है।
फिर वो लोग ने जुरैज की तरफ़ लपके, उन्हें छुआ और चूमा (बरकत हासिल करने के लिए) और कहा हम आप की इबादतगाह सोने (चांदी) की बना देते हैं।
जुरैज ने कहा: नहीं, इसे मिट्टी से दुबारह उसी तरह बना दो जैसी पहले थी तो उन्होंने वैसा ही किया।
रावी: अबू हुरैरा (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ)
रावी: अबू हुरैरा (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ)
सहीह मुस्लिम: किताब अल-बिर व अल-अदब,
हदीस संख्या: 2550
सबक:
1. हम सब जानते हैं कि मां की दुआ जितनी रफ्तार से असर करती है उतनी ही तेजी से उसकी बददुआ भी लगती है।
2. इस कहानी से हमें मालूम हुआ की हमें मां की नाफ़रमानी नहीं करनी चाहिए। आप खुद सोचे इस्लाम में मां का मर्तबा कितना बुलंद है के अल्लाह ने उसके पैरों के तले जन्नत रख दी।
3. हमें अपनी माँ को कभी तकलीफ नहीं पूछना चाहिए और हम कभी किसी भी काम में मसरूफ हो, चाहे वो कितना ही बड़ा काम हो, हमें उसकी बात का जवाब देना चाहिए।
4. इस कहानी से या भी पता चलता है कि अगर हम नफिल नमाज पढ़ रहे हैं और इसी दौरान हमारी मां हमें बुला रही है तो पहले हमें उसको सुन्ना चाहिए।
Posted By Islamic Theology
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