Heroes ki nursery

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हजरत मुहम्मद ﷺ के अल्लाह के पैग़म्बर होने के सबूत


हीरोज़ की नर्सरी 

मुहम्मद ﷺ के सच्चे पैगम्बर होने की दलीलों में से एक दलील ये है कि मुहम्मद ﷺ खुद ही हीरो नहीं थे बल्कि आप ﷺ ने हीरोज की नर्सरी लगा दी थी जिसमे से आज तक हीरोज निकल रहे है। इस बात के सबूत में हम ऐसे हजारों नाम आपके सामने पेश कर सकते है जिनकी जिंदगी में इंकलाब मुहम्मद ﷺ की तालीमात की वजह से आया और फिर उन्होंने दुनिया में वो कारनामे करके दिखाएं जिनको कोई आम इंसान नहीं कर सकता।

जो लोग मुहम्मद ﷺ को अल्लाह का पैगम्बर मानकर और आप ﷺ को अपना रहनुमा मान लेते है और ज़िन्दगी के उस तरीक़े की पैरवी पर राज़ी हो जाते है जिसे आप ﷺ पेश कर रहे है तो उन लोगों की जिंदगी में इंकलाब लाज़िमन आता है और दुनिया में जो लोग भी क़ुरआन और मुहम्मद ﷺ की बात मानकर अपने अंदर वह सिफात (गुण) पैदा कर लेंगे जिनका हुक्म कुरआन और मुहम्मद ﷺ ने दिया है तो वह दुनिया में भी कामयाब होंगे और मरने के बाद की जिंदगी में भी उनकी कमियाबी यकीनी है चाहे वो लोग किसी भी क़ौम, नस्ल या देश के हों।

मुहम्मद ﷺ पर ईमान लाने वालों की जिंदगी में इंकलाब का आ जाना और उनके अंदर सबसे आला दर्जे की सिफात (गुण) का पैदा होना इस बात की खुली दलील है कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के सच्चे पैगम्बर है। और कोई भी इंसान इस बात का खुद मुशाहिदा कर सकता है कि मुहम्मद ﷺ की तालीम ने ख़ुद तुम्हारी सोसाइटी में और तुम्हारे बीच में रहने वाले वो लोग पैदा कर दिए जो मुहम्मद ﷺ की तालीम पर अमल करते है उन लोगों की सीरत (जीवनी) और किरदार को कितना आला कर दिया है और जिस तालीम ने उनके अख़लाक़ बेहतरीन कर दिए और उनको सबसे आला खूबियां का मालिक बना दिया है। 

अब तुम ख़ुद ही सोच लो कि, 

मुहम्मद ﷺ की तालीम हक़ (सत्य) न होती तो ऐसे अच्छे नतीजे किस तरह पैदा कर सकती थी? 

क्या किसी झूठे इंसान की तालीम में इतना असर होगा की वह लोगों की जिंदगी में इंकलाब बरपा कर दें?

लोगों को चाहिए था कि इन सवालों पर गौर करते लेकिन लोगों ने उल्टा ही मुहम्मद ﷺ पर शायर होने का इल्ज़ाम लगा दिया और उनके साथियों को शायरों के साथ लगा रहने वाला बता दिया। 

आईए इस बात पर भी चर्चा कर लेते है;

मुहम्मद ﷺ के साथियों और शायरों के साथ लगे रहने वालों में फर्क:

शाइरों के साथ लगे रहनेवाले लोग अपने अख़लाक़, आदतों और मिज़ाज में उन लोगों से बिलकुल अलग होते हैं, जो मुहम्मद ﷺ के साथ तुम्हें नज़र आते हैं। दोनों गरोहों का फ़र्क़ ऐसा खुला हुआ फ़र्क़ है कि एक नज़र देखकर ही आदमी जान सकता है कि ये कैसे लोग हैं और वो कैसे। एक तरफ़ इन्तिहाई संजीदगी, तहज़ीब, शराफ़त, सच्चाई और ख़ुदा का डर है। बात-बात में ज़िम्मेदारी का एहसास है। बर्ताव में लोगों के हक़ों का ख़याल रखा जाता है। मामलों में इन्तिहाई दर्जे कि ईमानदारी है और ज़बान जब खुलती है, भलाई ही के लिये खुलती है, बुराई की बात कभी उससे नहीं निकलती। सबसे ज़्यादा ये कि इन लोगों को देखकर साफ़ मालूम होता है कि इनके सामने एक बुलन्द और पाकीज़ा नस्बुल-ऐन (मक़सद व लक्ष्य) है जिसकी धुन में ये रात-दिन लगे हुए हैं और इनकी सारी ज़िन्दगी एक बड़े मक़सद के लिये वक़्फ़ है।

दूसरी तरफ़ हाल ये है कि, 

  • कहीं इश्क़बाज़ी और शराब पीने की बातें बयान हो रही हैं और वहाँ मौजूद लोग उछल-उछलकर उनपर दाद दे रहे हैं। 
  • कहीं किसी बाज़ारी औरत या किसी घर की बहू-बेटी की ख़ूबसूरती पर बात हो रही है और सुननेवाले उसपर मज़े ले रहे हैं। 
  • कहीं जिंसी मेल-मिलाप (यौन-सम्बन्धों) की कहानी बयान हो रही है और पूरी भीड़ पर शह्वानियत (कामुकता) का भूत सवार है। 
  • कहीं बेहूदा बातें बकी जा रही हैं या हँसी-मज़ाक़ हो रहा है और भीड़ में हर तरफ़ ठहाके लग रहे हैं। 
  • कहीं किसी की बुराई बयान की जा रही है और लोग उससे मज़े ले रहे हैं। 
  • कहीं किसी की बेजा तारीफ़ हो रही है और उसपर तारीफ़ और शाबाशी के डोंगरे बरसाए जा रहे हैं और 
  • कहीं किसी के ख़िलाफ़ नफ़रत, दुश्मनी और इन्तिक़ाम के जज़्बात भड़काए जा रहे हैं और सुननेवालों के दिलों में उनसे आग-सी लग जाती है। 

इन मजलिसों में शाइरों के कलाम सुनने के लिये जो भीड़ लगती है, और बड़े-बड़े शाइरों के पीछे जो लोग लगे फिरते हैं, उनको देखकर कोई शख़्स ये महसूस किये बिना नहीं रह सकता कि ये अख़लाक़ की बन्दिशों से आज़ाद, जज़्बात और ख़ाहिशों के बहाव में बहनेवाले और मौज-मस्ती के दीवाने, आधे जानवर क़िस्म के लोग हैं, जिनके ज़ेहन को कभी ये ख़याल छूकर भी नहीं गया है कि दुनिया में इन्सान के लिये ज़िन्दगी का कोई बुलन्द मक़सद और नस्बुल-ऐन भी हो सकता है।

जिस शख़्स की ज़िन्दगी ये कुछ हो जैसी कि मुहम्मद (ﷺ) की है। और जिसके साथियों की सिफ़ात वो कुछ हों जैसी कि मुहम्मद (ﷺ) के साथियों की हैं, उसके बारे कोई अक़ल का अन्धा ही ये कह सकता है कि उसपर शैतान उतरते है और वो शाइर है। शैतान जिन काहिनों पर उतरते हैं और शाइर और उनके साथ लगे रहनेवालों के जैसे कुछ रंग-ढंग हैं, वो आख़िर किससे छिपे हैं। तुम्हारे अपने समाज में ऐसे लोग बड़ी तादाद में पाए ही जाते हैं। क्या कोई आँखोंवाला ईमानदारी के साथ ये कह सकता है कि उसे मुहम्मद (ﷺ) और उनके साथियों की ज़िन्दगी में और शाइरों और काहिनों की ज़िन्दगी में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता? 

अब ये कैसी ढिठाई है कि ख़ुदा के इन बन्दों का खुल्लम-खुल्ला कहानत और शाइर कहकर मज़ाक़ उड़ाया जाता है और किसी को इसपर शर्म भी नहीं आती।

इन दोनों गरोहों का खुला-खुला फ़र्क़ अगर किसी को नज़र नहीं आता तो वो अन्धा है और अगर सब कुछ देखकर भी कोई सिर्फ़ हक़ को नीचा दिखाने के लिये ईमान निगलकर ये कहता है कि मुहम्मद (ﷺ) और उनके आसपास इकठ्ठा होनेवाले उसी तरह के लोग हैं जैसे शाइर और उनके पीछे लगे रहनेवाले लोग होते हैं, तो वो झूठ बोलने में बेशर्मी की सारी हदें पार कर गया है।


नोट: मुहम्मद ﷺ पर ईमान लाने वालों की सिफात को तफसील से जानने के लिए आप कुरआन को तर्जुमे (अनुवाद) के साथ पढ़े और मुहम्मद ﷺ की सीरत (जीवनी) भी जरूर पढ़ें।


By- इस्लामिक थियोलॉजी

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