सबसे पहले हम जानते है ये मुहर्रम क्या है?
मुहर्रम इस्लामिक महीने का नाम है जो इस्लामी महीनो में सबसे पहले आता है।
हिजरी:
रमजान के बाद दूसरा सबसे पाक महीना मुहर्रम है। इस्लामिक न्यू ईयर की शुरुआत एक हिजरी 622 AD में हुई थी जब रसूल अल्लाह ﷺ और उनके सहाबी मक्का छोड़कर मदीना गए जो सहाबाओ के मशवरे से हिजरी सन् का आगाज हुआ।
1 तारीख को 1 मुहर्रम है सन 1445 और उसी महीने में 10 अशुरा का दिन भी आता है जो बड़ी फज़ीलत वाला है और उस दिन रसूल अल्लाह ﷺ के नवासे हुसैन इब्ने अली र.अ. को ज़ालिमों ने शहीद किया जो जन्नती नौजवानों के सरदार है लेकिन अफसोस की बात है की हमे उनके फ़ज़ाइल ,उनकी बहादुरी लोगो को बताने के बजाये उस दिन ढोल /तासे बाजाने, नोहा करने में और अपने आप को ज़ख़्मी करने में मशगुल रहते है, लोगो को हकायक बताने के बजाये हम लोगो को जाहिलियत की तरफ धकेलते है और तरह तरह की दलीले पेश करते है और अल्लाह और उसके रसूल पे झूट बंधते है जो सरासर गुनाह का काम है।
इसमें एक बात ये भी है की इस दिन हमें आशूरा का रोजा रखने का भी हुक्म है जो इस तरह है,
हजरत इब्ने अब्बास रजी. ने कहा रसूलुल्लाह ﷺ ने दसवीं तारीख़ को आशुरा का रोज़ा रखने का हुक्म दिया। [तिर्मिज़ी 755]
मैंने नबी करीम ﷺ को सिवा आशुरा के दिन के और इस रमज़ान के महीने के और किसी दिन को दूसरे दिनों से बेहतर जान कर ख़ास तौर से इरादा करके रोज़ा रखते नहीं देखा। [सहीह बुखारी 2006; मिस्कातुल मसाबीह 2040]
ज़मानाए-जाहिलियत में क़ुरैश रोज़ा रखा करते थे:
हजरत आयशा बयान करती है की आशुरा के दिन ज़मानाए-जाहिलियत में क़ुरैश रोज़ा रखा करते थे और रसूलुल्लाह ﷺ भी रखते। फिर जब आप ﷺ मदीना तशरीफ़ लाए तो आप ﷺ ने यहाँ भी आशुरा के दिन रोज़ा रखा और उसका लोगों को भी हुक्म दिया। लेकिन रमज़ान की फ़र्ज़ियत के बाद आप ने उसको छोड़ दिया और फ़रमाया कि अब जिसका जी चाहे उस दिन रोज़ा रखे और जिसका चाहे न रखे। [सहीह बुखारी 2002]
मूसा (अलैहि०) की सुन्नत:
हजरत इब्ने अब्बास से रिवायत है की नबी करीम ﷺ मदीना में तशरीफ़ लाए। (दूसरे साल) आप (सल्ल०) ने यहूदियों को देखा कि वो आशुरा के दिन रोज़ा रखते हैं। आप (सल्ल०) ने उन से उसका सबब मालूम फ़रमाया तो उन्होंने बताया कि ये एक अच्छा दिन है। उसी दिन अल्लाह तआला ने बनी-इसराईल को उनके दुश्मन (फ़िरऔन) से नजात दिलाई थी। इसलिये मूसा (अलैहि०) ने उस दिन का रोज़ा रखा था। आप ने फ़रमाया, फिर मूसा (अलैहि०) के (ख़ुशी में शरीक होने में) हम तुम से ज़्यादा मुसतहिक़ हैं। चुनांचे आप (सल्ल०) ने उस दिन रोज़ा रखा और सहाबा (रज़ि०) को भी उसका हुक्म दिया। [सही मुस्लिम 2004]
पिछले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा:
हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है की एक आदमी रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और पूछा: आप (सल्ल०) किस तरह रोज़े रखते हैं?
उसकी बात से रसूलुल्लाह ﷺ ग़ुस्सा में आ गए।
जब हज़रत उमर (रज़ि०) ने आप ﷺ का ग़ुस्सा देखा तो कहने लगे: हम अल्लाह के रब होने, इस्लाम के दीन होने और मुहम्मद ﷺ के रसूल होने पर राज़ी हैं। हम अल्लाह के ग़ुस्से से और उस के रसूल ﷺ के ग़ुस्से से अल्लाह की पनाह में आते है। हज़रत उमर (रज़ि०) बार-बार उन कलिमात को दोहराने लगे, यहाँ तक कि रसूलुल्लाह ﷺ का ग़ुस्सा ठण्डा हो गया, तो हज़रत उमर (रज़ि०) ने कहा अल्लाह के रसूल ﷺ इस शख़्स का क्या हुक्म है जो साल भर (मुसलसल) रोज़ा रखता है?
आप ﷺ ने फ़रमाया: "न उसने रोज़ा रखा न उस ने इफ़्तार किया। या फ़रमाया कि उसने रोज़ा नहीं रखा, उसने इफ़्तार नहीं किया।
कहा: इसका क्या हुक्म है। जो दो दिन रोज़ा रखता है। और एक दिन इफ़्तार करता है।
आप ﷺ ने फ़रमाया: क्या कोई इसकी ताक़त रखता है?
पूछा: इसका क्या हुक्म है। जो एक दिन रोज़ा रखता है और एक दिन इफ़्तार करता है।
आप ﷺ ने फ़रमाया: ये दाऊद (अलैहि०) का रोज़ा है।
पूछा: इसका क्या हुक्म है। जो एक दिन रोज़ा रखता है और दो दिन इफ़्तार करता है।
आप ﷺ ने फ़रमाया: मुझे पसन्द है कि मुझे इस की ताक़त मिल जाती।
फिर रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "हर महीने के तीन रोज़े और एक रमज़ान (के रोज़ों) से (लेकर दूसरे) रमज़ान (के रोज़े) ये (अमल) सारे साल के रोज़ों (के बराबर) है और अरफ़ा के दिन का रोज़ा मैं अल्लाह से उम्मीद रखता हूँ कि पिछले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाएगा और अगले साल के गुनाहों का भी और आशुरा के दिन का रोज़ा। मैं अल्लाह से उम्मीद रखता हूँ कि पिछले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाएगा।"
[सहीह मुस्लिम 2746]
नोट: इससे सिर्फ सगीरा गुनाह ही माफ़ होंगे कबीरा गुनाह सिर्फ तौबा से माफ़ होंगे।
अब्दुल कादिर मंसूरी
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