मरे हुए इन्सान ज़मीन से किस तरह निकलेंगे?
अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि:
"और आसमान से हमने बरकत वाला पानी नाज़िल किया, फिर उससे बाग़ और फ़सल के ग़ल्ले और ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़ पैदा कर दिये जिनपर पर फलों से लदे हुए गुच्छे एक के ऊपर एक लगते हैं।
ये इन्तिज़ाम है बन्दों को रिज़्क़ देने का। इस पानी से हम एक मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दगी बख़्श देते हैं।(मरे हुए इन्सानों का ज़मीन से) निकलना भी इसी तरह होगा।"
[कुरआन 50:9-11]
दलील ये दी जा रही है कि जिस ख़ुदा ने ज़मीन नाम के इस ग्रह को ज़िंदा मख़लूक़ात रहने-बसने के लिये मुनासिब मक़ाम बनाया, और जिसने ज़मीन की बे-जान मिटटी को आसमान के बे-जान पानी के साथ मिला कर इतनी आला दर्जे की हरियाली ज़िन्दगी पैदा कर दी जिसे तुम अपने बाग़ों और खेतों की शकल में लहलहाते देख रहे हो, और जिसने इस हरियाली को इंसान व हैवान सबके लिये रिज़्क़ का ज़रिया बना दिया, उसके बारे में तुम्हारा ये गुमान कि वो तुम्हें मरने के बाद दोबारा पैदा करने की ताक़त नहीं रखता है, सरासर बेअक़्ली का गुमान है।
तुम अपनी आँखों से आए दिन देखते हो कि एक इलाक़ा बिलकुल ख़ुश्क और बे जान पड़ा हुआ है। बारिश का एक छींटा पड़ते ही इसके अंदर से यकायक ज़िन्दगी के चश्मे (सोते) फूट निकलते हैं, मुद्दतों की मरी हुई जड़ें यकायक जी उठती हैं, और तरह-तरह के ज़मीनी कीड़े-मकोड़े ज़मीन की तहों से निकल कर उछल-कूद शुरू कर देते हैं।
ये इस बात का खुला सुबूत है के मौत के बाद दोबारा ज़िन्दगी मुमकिन है।
अपनी आँखों-देखी इस हक़ीक़त को जब तुम नहीं झुटला सकते, तो इस बात को कैसे झुटलाते हो कि जब ख़ुदा चाहेगा, तुम ख़ुद भी उसी तरह ज़मीन से निकल आओगे जिस तरह पैधों की कोपलें निकल आती हैं, इस सिलसिले में ये बात क़ाबिले ज़िक्र है के अरब की सरज़मीन में बहुत से इलाक़े ऐसे हैं जहाँ कभी-कभी पाँच-पाँच बरस बारिश नहीं होती, बल्कि कभी-कभी इससे भी ज़्यादा मुद्दत गुज़र जाती है और आसमान से एक बूँद तक नहीं टपकती। इतने लम्बे ज़माने तक तपते हुए रेगिस्तानों में घास की जड़ों और कीड़े-मकोड़ों का ज़िंदा रहना तसव्वुर के क़ाबिल नहीं है। इसके बावजूद जब वहाँ किसी वक़्त थोड़ी सी बारिश भी हो जाती है तो घास निकल आती है और कीड़े-मकोड़े जी उठते हैं। इसलिये अरब के लोग दलील के इस तरीक़े को उन लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्हें इतने लम्बे सूखा का तजुर्बा नहीं होता।
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