इस्लाम: हमेशा से इंसानों का दीन और दुनिया में धर्म कैसे बने?
अल्लाह के नज़दीक इनसान के लिये सिर्फ़ एक ही निज़ामे-ज़िन्दगी और ज़िन्दगी गुज़ारने का एक ही तरीक़ा सही और ठीक है। और वो ये है कि इनसान अल्लाह को अपना मालिक व माबूद (उपास्य) माने और उसकी बन्दगी व ग़ुलामी में अपने आपको बिलकुल सुपुर्द कर दे और उसकी बन्दगी करने का तरीक़ा ख़ुद से न गढ़े, बल्कि उसने अपने पैग़म्बरों के ज़रिए से जो हिदायत और रहनुमाई भेजी है, बिना कुछ घटाए-बढ़ाए सिर्फ़ उसी की पैरवी करे। सोचने और अमल करने के इसी तरीक़े का नाम इस्लाम है।
और अल्लाह ने दुनिया में अपने सभी पैगंबरों को एक ही दीन देकर भेजा है जिसका नाम इस्लाम ही है। और अल्लाह के नजदीक दीन सिर्फ इस्लाम ही कुबूल किया जाएगा जिसकी तालीम अल्लाह के सभी पैगंबरों ने दी है। और ये बात बिलकुल ठीक और हक़ है कि कायनात का ख़ालिक़ व मालिक अपनी मख़लूक़ और रिआया के लिये इस इस्लाम के सिवा किसी दूसरे तरीक़े को जाइज़ न माने। आदमी अपनी बेवक़ूफ़ी और नासमझी से अपने आपको दहरियत (ख़ुदा का इनकार) से लेकर शिर्क व बुतपरस्ती तक हर नज़रिए और हर मसलक (पंथ) की पैरवी का जाइज़ हक़दार समझ सकता है, मगर कायनात के बादशाह (अल्लाह) की निगाह में तो ये खुली बग़ावत है। इसलिए ही अल्लाह ने अपने आखिरी संदेश कुरआन में कहा है कि:
"अल्लाह के नज़दीक दीन सिर्फ़ इस्लाम है। इस दीन से हटकर जो बहुत से तरीक़े उन लोगों ने अपनाए, जिन्हें किताब दी गई थी, उनके इस रवैये की कोई वजह इसके सिवा न थी कि उन्होंने इल्म आ जाने के बाद आपस में एक-दूसरे पर ज़ुल्म करने के लिये ऐसा किया, और जो कोई अल्लाह के हुक्मों और हिदायतों को मानने से इनकार कर दे, अल्लाह को उससे हिसाब लेते कुछ देर नहीं लगती।"
[कुरआन 3:19]
मतलब ये है कि अल्लाह की तरफ़ से जो पैग़म्बर भी दुनिया के किसी कोने और किसी ज़माने में आया है उसका दीन इस्लाम ही था और जो किताब भी दुनिया की किसी ज़बान और किसी क़ौम में उतरी है, उसने इस्लाम ही की तालीम (शिक्षा) दी है। इस असल दीन को बिगाड़कर और इसमें कमी-बेशी करके जो बहुत से दीन इनसानों में राइज किये गए, उनके पैदा होने का सबब इसके सिवा कुछ न था कि लोगों ने अपनी जाइज़ हद से बढ़कर हुक़ूक़, फ़ायदे और अपने लिये ख़ास दर्जे हासिल करने चाहे और अपनी ख़ाहिशों के मुताबिक़ असल दीन के अक़ीदों, उसूलों और हुक्मों में फेर-बदल कर डाला।
अल्लाह ने शुरू इंसान से लेकर अब तक इंसानों को सिर्फ एक ही दीन और एक ही ज़िंदगी गुजारने का तरीका बताया है और वो निजामे जिंदगी इस्लाम है। सभी पैगंबरों ने इस्लाम की तरफ ही लोगों को बुलाया है। लेकिन लोगों ने आपस में इख्तिलाफ किए और अपने अलग अलग धर्म और मसलक (पंथ) बना लिए। इसी बात को अल्लाह के आखिरी संदेश कुरआन में कुछ यूं कहता है कि:
"शुरू में सब लोग एक ही तरीक़े पर थे। [ फिर ये हालत बाक़ी न रही और इख़्तिलाफ़ पैदा हुए] तब अल्लाह ने नबी भेजे जो सीधी राह पर चलने पर ख़ुशख़बरी देनेवाले और टेढ़ी चाल के नतीजों से डरानेवाले थे, और उनके साथ किताबे-बरहक़ [ सत्य पर आधारित किताब] उतारी ताकि हक़ के बारे में लोगों के बीच जो इख़्तिलाफ़ पैदा हो गए थे, उनका फ़ैसला करे – [और इन इख़्तिलाफ़ के पैदा होने की वजह ये न थी कि शुरू में लोगों को हक़ बताया नहीं गया था। नहीं,] इख़्तिलाफ़ उन लोगों ने किया जिन्हें हक़ का इल्म दिया जा चुका था। उन्होंने रौशन हिदायत पा लेने के बाद सिर्फ़ इसलिये हक़ को छोड़कर अलग-अलग तरीक़े निकाले कि वो आपस में ज़्यादती करना चाहते थे तो जो लोग नबियों पर ईमान ले आए, उन्हें अल्लाह ने अपनी इजाज़त से उस हक़ का रास्ता दिखा दिया जिसमें लोगों ने इख़्तिलाफ़ किया था। अल्लाह जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है।"
[कुरआन 2:213]
कुरआन की इस आयत से पता चला कि नावाक़िफ़ लोग जब अपनी अटकल गुमान की बुनियाद पर मज़हब का इतिहास तैयार करते हैं, तो कहते हैं कि इन्सान ने अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत शिर्क (बहुदेवबाद) के अंधेरों से की फिर तदरीजी (चरणबद्ध) तरक़्क़ी को तय करने के साथ-साथ ये अंधियारी छँटती गई और रौशनी बढ़ती गई, यहाँ तक कि आदमी तौहीद (ऐकेश्वरबाद) के मक़ाम पर आ पहुँचा।
इसके बरख़िलाफ़ क़ुरआन ये बताता है की दुनिया में इन्सान की ज़िन्दगी की शुरुआत पूरी रौशनी में हुई है। अल्लाह ने सबसे पहले जिस इन्सान को पैदा किया था, उसको ये भी बता दिया था की हक़ीक़त क्या है और तेरे लिये सही रास्ता कौन-सा है। इसके बाद एक मुद्दत तक आदम की नस्ल सीधे रास्ते पर चलती रही और एक उम्मत (समुदाय) बनी रही। फिर लोगों ने नए-नए रास्ते निकाले और अनेक तरीक़े इजाद कर लिये, इस वजह से नहीं कि उनको हक़ीक़त नहीं बताई गई थी, बल्कि इस वजह से कि हक़ को जानने के बावजूद कुछ लोग अपने जाइज़ हक़ से बढ़कर इम्तियाज़ (विशेषाधिकार) और फ़ायदे हासिल करना चाहते थे, और आपस में एक-दूसरे पर ज़ुल्म, सरकशी और ज़्यादती करने के ख़ाहिशमन्द थे। इसी ख़राबी को दूर करने के लिये अल्लाह ने पैगंबरों को भेजना शुरू किया। ये पैगम्बर इसलिये नहीं भेजे गए थे कि हर एक अपने नाम से एक नए मज़हब की बुनियाद डाले और अपनी एक नई उम्मत बना ले, बल्कि उनके भेजे जाने का मक़सद ये था कि लोगों के सामने इस खोए हुए हक़ की राह को वाज़ेह करके उन्हें फिर से एक उम्मत बना दें।
ऐ नबी! कहो कि, “हम अल्लाह को मानते हैं, उस तालीम को मानते हैं जो हमपर उतारी गई है, उन तालीमात को भी मानते हैं जो इबराहीम, इसमाईल, इस्हाक़, याक़ूब और याक़ूब की औलाद पर उतरी थीं और उन हिदायतों पर भी ईमान रखते हैं जो मूसा और ईसा और दूसरे पैग़म्बरों को उनके रब की तरफ़ से दी गईं। हम उनके बीच फ़र्क़ नहीं करते, और हम अल्लाह के फ़रमाँबरदार [ मुस्लिम] हैं।”
[कुरआन 3:84]
पैगंबरों की उम्मत (समुदाय) में बिगाड़ आने की वजह
"लोगों में जो फूट पड़ी, वो इसके बाद पड़ी कि उनके पास ‘इल्म’ (सत्यज्ञान) आ चुका था और इस वजह से कि वो आपस में एक-दूसरे पर ज़्यादती करना चाहते थे। अगर तेरा रब पहले ही ये न फ़रमा चुका होता कि एक तयशुदा वक़्त तक फ़ैसला टाले रखा जाएगा तो उनका झगड़ा चुका दिया गया होता। और हक़ीक़त ये है कि अगलों के बाद जो लोग किताब के वारिस बनाए गए, वो उसकी तरफ़ से बड़े बेचैन करनेवाले शक में पड़े हुए हैं।"
[कुरआन 42:14]
यानी लोगों के बीच फूट की वजह ये न थी कि अल्लाह ने पैग़म्बर नहीं भेजे थे और किताबें नहीं उतारी थीं, इस वजह से लोग सीधा रास्ता न जानने की वजह से अपने-अपने अलग मज़हब और नज़रिये और निज़ामे-ज़िन्दगी ख़ुद बना बैठे, बल्कि ये फूट उनमें अल्लाह की तरफ़ से इल्म आ जाने के बाद पड़ी। इसलिये अल्लाह इसका ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि वे लोग ख़ुद इसके ज़िम्मेदार हैं, जिन्होंने दीन के साफ़-साफ़ उसूल और शरीअत के साफ़ हुक्मों से हटकर नए-नए मज़हब और मसलक बनाए।
और लोगों के बीच पड़ी इस फूट के लिये उभारनेवाला कोई नेक जज़्बा न था, बल्कि ये अपनी निराली उपज दिखाने की ख़ाहिश, अपना अलग झंडा बुलन्द करने की फ़िक्र, आपस की ज़िद्दम-ज़िद्दा, एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश और माल और शोहरत की तलब का नतीजा थी। होशियार और हौसला रखने वाले लोगों ने देखा कि ख़ुदा के बन्दे अगर सीधे-सीधे ख़ुदा के दीन पर चलते रहें तो बस
- एक ख़ुदा होगा जिसके आगे लोग झुकेंगे,
- एक रसूल होगा जिसको लोग पेशवा और रहनुमा मानेंगे,
- एक किताब होगी जिसकी तरफ़ लोग रुजू करेंगे और
- एक साफ़ अक़ीदा और बेलाग ज़ाब्ता होगा, जिसकी पैरवी वे करते रहेंगे।
इस निज़ाम में उनकी अपनी ज़ात के लिये कोई ख़ास जगह नहीं हो सकती, जिसकी वजह से उनकी सरदारी चले और लोग उनके आस-पास इकट्ठा हों और उनके आगे सर भी झुकाएं और जेबें भी ख़ाली करें। यही वो असल सबब था जो नए-नए अक़ीदे और फ़लसफ़े, इबादत के नए-नए तरीक़े और नई-नई मज़हबी रस्में और नए-नए निज़ामे-ज़िन्दगी ईजाद करने का सबब बना और इसी ने ख़ुदा के बन्दों के एक बड़े हिस्से को दीन की साफ़ डगर से हटाकर अलग-अलग राहों में भटका दिया। फिर ये भटकाव इन गरोहों की आपसी बहस और झगड़ों और मज़हबी और मआशी और सियासी कशमकश की बदौलत सख़्त कडुवाहटों में तब्दील होता चला गया, यहाँ तक कि नौबत उन ख़ून-ख़राबों तक पहुँची जिनकी छींटों से इन्सानी इतिहास लाल हो रहा है। लोग अपने बनाए हुए धर्म और मजहब के उपर लड़ रहे है जबकि लोगों को अपने असल मालिक के दीन की तरफ आना चाहिए जो हमेशा से एक ही रहा है जिसका नाम इस्लाम है।
उपर की आयत में अल्लाह ने उन लोगों को भी जवाब दिया है जो कहते है कि अगर अल्लाह चाहता तो सबको एक ही दीन पर जबरदस्ती चला सकता था और जो उसके दीन से बगावत करें उसपर अजाब नज़िल करता ताकि सब लोग एक ही दीन की पैरवी करते रहे।
इसके जवाब में अल्लाह ने कहा है कि अगर तेरा रब पहले ही ये न फ़रमा चुका होता कि एक तयशुदा वक़्त तक फ़ैसला टाले रखा जाएगा तो उनका झगड़ा चुका दिया गया होता।
अगर अल्लाह दुनिया ही में अज़ाब देकर उन सब लोगों का ख़ातिमा कर दिया जाता जो गुमराहियाँ निकालने और जान-बूझकर उनकी पैरवी करने के मुजरिम थे और सिर्फ़ सीधे रास्ते पर चलनेवाले बाक़ी रखे जाते, जिससे ये बात वाज़ेह हो जाती कि ख़ुदा के नज़दीक हक़ पर कौन हैं और बातिल पर कौन। लेकिन अल्लाह ने ये दो टूक फ़ैसला क़ियामत तक के लिये टाले रखा है, क्योंकि दुनिया में ये फ़ैसला कर देने के बाद इन्सान की आज़माइश बेमतलब हो जाती है। और अल्लाह ने इंसानों को बनाया ही आजमाइश के लिए है कि कौन अल्लाह को बिना देखें और अपने इख्तियार से उसके बताए हुए तरीके पर चलें।
उपर की आयत में अल्लाह ने ये भी बताया है कि जब पैगंबरों की तालीम और वो जो किताब अल्लाह की तरफ से लाए थे उसमे फेर बदल किया और वो किताब अपनी असल शक्ल में मौजूद न रही तो बाद में आने वाले लोग उस किताब के अल्लाह की तरफ से होने में शक करने लगे थे।
और हक़ीक़त ये है कि अगलों के बाद जो लोग किताब के वारिस बनाए गए, वो उसकी तरफ़ से बड़े बेचैन करनेवाले शक में पड़े हुए हैं।
मतलब ये है कि हर पैगम्बर और उसके क़रीबी पैरोकारों (followers) का दौर गुज़र जाने के बाद जब पिछली नस्लों तक अल्लाह की किताब पहुँची तो उन्होंने उसे यक़ीन और भरोसे के साथ नहीं लिया, बल्कि वे उसके बारे में सख़्त शक-शुब्हों और उलझनों में मुब्तला हो गईं। इस हालत में उनके मुब्तला हो जाने की बहुत-सी वजहें थीं, जिन्हें हम उस सूरते-हाल का जाइज़ा लेकर आसानी से समझ सकते हैं जो तौरात और इंजील के मामले में पेश आई है। इन दोनों किताबों को पहले की नस्लों ने उनकी असली हालत पर उनकी असल इबारत और ज़बान में महफ़ूज़ रखकर बाद में आनेवाली नस्लों तक नहीं पहुँचाया। उनमें ख़ुदा के कलाम के साथ तफ़सीर और इतिहास और सुनी-सुनाई रिवायतों और फ़क़ीहों की निकाली हुई बारीकियों की सूरत में इन्सानी बातें गड्ड-मड्ड कर दी। उनके तर्जमों को इतना रिवाज दिया कि असल ग़ायब हो गई और सिर्फ़ तर्जमे बाक़ी रह गए। उनकी तारीख़ी सनद भी इस तरह बरबाद कर दी कि अब कोई शख़्स भी पूरे यक़ीन के साथ नहीं कह सकता कि जो किताब उसके हाथ में है, वो वही है जो हज़रत मूसा (अलैहि०) या हज़रत ईसा (अलैहि०) के ज़रिए से दुनियावालों को मिली थी। फिर उनके बड़ों ने वक़्त-वक़्त पर मज़हब, इलाहियात, फ़लसफ़ा, क़ानून, तबीइयात, नफ़सियात और सामाजिकता की ऐसी बहसें छेड़ीं और ऐसे निज़ामे-फ़िक्र बना डाले जिनकी भूल-भुलैयों में फँसकर लोगों के लिये ये तय करना मुश्किल हो गया कि इन पेचीदा रास्तों के बीच हक़ की सीधी राह कौन-सी है और चूँकि अल्लाह की किताब अपनी असल हालत और भरोसेमन्द हालत में मौजूद न थी, इसलिये लोग किसी ऐसी सनद की तरफ़ रुजू भी न कर सकते थे जो सही को ग़लत से अलग करने में मदद करतीI
एक ऐतराज लोग कुरआन पर भी ये कर सकते है की जब पिछले तमाम पैगंबरों की किताब अपनी असल सूरत में मौजूद नहीं है तो कुरआन कैसे अपनी असल सूरत में मौजूद है?
इसका जवाब भी अल्लाह ने कुरआन में दिया है कि:
"रहा ये ज़िक्र (यानी कुरआन) तो इसको हमने उतारा है और हम ख़ुद इसके निगहबान हैं।"
[कुरआन 15:9]
इस आयत में अल्लाह, इंसानों को ये बता रहा है कि ये ख़याल तुम अपने दिल से निकाल दो कि तुम इस ज़िक्र (यानी कुरान) का कुछ बिगाड़ सकोगे। ये सीधे तौर पर हमारी हिफ़ाज़त में है। न तुम्हारे मिटाए मिट सकेगा, न तुम्हारे दबाए दब सकेगा, न तुम्हारे तानों और एतिराज़ों से इसकी क़द्र घट सकेगी, न तुम्हारे रोके उसकी दावत रुक सकेगी, न इसमें फेर-बदल करने का कभी किसी को मौक़ा मिल सकेगा।
अल्लाह ने पहले की किसी भी किताब के महफूज रखने को जिम्मेदारी नहीं ली थी लेकिन इस कुरआन की निगहबानी की जिम्मेदारी अल्लाह ने खुद ली है क्योंकि पहले सब पैगम्बर किसी एक कौम की तरफ भेजे जाते थे और वो कौम जब अल्लाह की किताब में फेर बदल करती थी तो अल्लाह अपने दूसरे पैगम्बर को भेजकर उन्हे असल तालीम याद दिलाता रहा है पहले दुनिया के लोग एक दूसरे से जुड़े हुए नहीं थे यानी ग्लोबल नहीं थे इसलिए अल्लाह हर कौम की तरफ अपने अलग अलग पैगम्बर भेजा करता था लेकिन जब अल्लाह ने इंसानों को तरक्की देने की सोची और अल्लाह जानता था कि अब दुनिया के इंसान एक दूसरे से जुड़ने वाले है और ये दुनिया ग्लोबल विलेज (वैश्विक गांव) बनने वाली है तो अल्लाह ने पूरी इंसानियत के लिए अपने आखिरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद ﷺ अपना आखिरी संदेश कुरान देकर भेजा। और ये कुरान अल्लाह की तरफ से आखिरी संदेश था इसलिए अल्लाह ने इसकी हिफाजत की जिम्मेदारी खुद ली है कि कोई इंसान कयामत तक इसमें फेर बदल नहीं कर पाएगा। और कुरआन को पैगम्बर मुहम्मद ﷺ ने जैसा इंसानों तक पहुंचाया बिलकुल वैसा ही वह आज तक मौजूद है और इस चीज की गवाही कुरआन पर ईमान न रखने वाले लोग भी खुद देते है। और दुनिया का कोई शख्स भी यह नही कह सकता है की कुरआन में फेर बदल हुआ है चाहे वो इस किताब को अल्लाह की माने या न माने।
कुरआन अल्लाह की तरफ से भेजा हुआ आखिरी संदेश है और इस संदेश पर ईमान लाना हर इंसान के लिए जरूरी है। कुरआन का पैगाम वही है जो अल्लाह हर दौर में अपने पैगंबरों के जरिए देता रहा है। इसलिए सब इंसानों को अपने असल दीन (धर्म) की तरफ पलटना चाहिए और इस कुरान पर ईमान लाकर इस्लाम को कुबूल कर लेना चाहिए।
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