सोशल मीडिया की मोहब्बत
आज हम ऐसे दौर मे जी रहे हैं जहां मुस्लिम मुआशरे का हर इंसान खुद को मोमिन कहता है।
- पाँच वक्त की नमाज़ क्या शुरू की मोमिन हो गए,
- कुछ अहदीस पर अमल किया मोमिन हो गए,
- कुछ मसले मसाइल जानते ही मोमिन का टैग लगा लिया,
- दिल में खुराफातें भरी हैं फिर भी मोमिन होने का दावा ठोक दिया ।
हर चीज़ के दो पहलू होते हैं अच्छा और बुरा, इस लिहाज़ से हर इंसान मे अच्छाइयां हैं तो कमियाँ भी है। अक्सर जब हम किसी को कुछ गलत करते देखते हैं तो उसपर लान तान शुरू कर देते हैं, और हम ये सोचते ही नहीं कि ये कमी कभी हमारे अंदर भी थी जिसे हम गलत समझते ही नहीं थे कभी ख़ुद को उस इंसान की जगह रख कर देखना चाहिए अगर ऐसा हो तो?
हम पाते हैं के हम गुज़रे वक्त मे ऐसे ही थें इन्हीं गलतियों के मालिक थे जो कभी अच्छी लगती थी, और अल्लाह ने हमारे ऐब को ज़ाहिर ना होने दिया फिर भी हम दूसरों के ऐब टटोलते फिरते हैं। हद तो तब होती है जब सामने से बोलते है तुम गलत हो, तुमने ये किया, तुमने वो किया, तुम ये गुनाह करते हो, तुम वो गुनाह करते हो?
इस पर एक सवाल है क्या दिल के राज़ आप जानते है, वो बंदा तन्हाई मेें क्या करता है, क्या आपको इसकी ख़बर है? ये तो अल्लाह ही जानता है ना?
आइये सबसे पहले जान लेते है मोमिन की सिफत क्या है?
- मोमिन ताना देने वाला नहीं होता।
- मोमिन लान तान करने वाला नहीं होता
- मोमिन झूठ नहीं बोलता।
- मोमिन बदगुमानी नहीं करता
- मोमिन सब्र करने वाला होना चाहिए
- मोमिन इंसाफ़ पर कायम रहने वाला होता है
- मोमिन अपने दीनी भाई से बुगज़ और किना नहीं रखता।
अक्सर देखा जाता है जब हम किसी से अल्लाह के लिए मुहब्बत रखते है और वो हम पर तव्वजो नहीं देते तो हम जाने कितनी बातें बोल जाते है। खास कर लड़कियाँ जब किसी लड़के से अटैचड होती हैं और उन्हें पता चलता है कि वो किसी और से निकाह की ख्वाहिश कर रहा है तो वो अपना असल रंग दिखाने लग जाती हैं, मानो वो लड़का उनकी जागीर हो, किसी और से निकाह कैसे कर सकता है? ये तो हुई आम लड़कियों की बात अब आते है मोमिनाह पर जो पहले एक तरफा मोहब्बत करती हैं फिर निकाह की ख्वाहिश रखती है और इंकार होने पर अक्सर ताने मारती हैं, लानत और बदज़ुबानी करती हैं।
हुज़ूर ﷺ ने फरमाया, "मोमिन ताना देने वाला, लानत करने वाला, बेहया और बदज़ुबान नहीं होता है।" [तिर्मिज़ी 1977]
अब मेरा सवाल ये है क्या वाक़ई आप मोमिन/मोमिनह हैं?
1. सबसे पहली बात, एक मोमिन/मोमिनह कभी किसी गैर मेहरम से बात नहीं करते, इस पर भी जवाब मिलता है कि हम दीन सीखते है। तो मेरी भाई/बहनो दीन सीखने के लिए आलिम/आलिमाह भी मौजूद हैं अगर नहीं तो आप यूट्यूब पर विडियो देखें, ज़ूम क्लासेज़ लें, गैर महरम के इनबाक्स में जाकर दीन क्यूँ सीखना अगर आप खुद को मोमिन कहते हैं?
2. दूसरी बात, एक मोमिन नसीब पर ईमान रखता है अगर आप किसी से निकाह के ख्वाहिशमंद है और निकाह नहीं होता तो सामने वाले से लड़ाई कैसी? ये तो अल्लाह का फैसला था। आपके नसीब का आपको मिलेगा, उसके नसीब का उसे। दिल आपने लगाया अल्लाह ने तो सख्ती से मना किया था।
क्या आपको ख्याल नहीं आया कि मोमिन निकाह से पहले दिल नहीं लगाते?
3. तीसरी बात, एक मोमिन भाई/बहन दूसरे पर बोहतान नहीं बांधते। वो दूसरों पर बेहयाई या अय्याशी का इल्ज़ाम नहीं लगाते पर अक्सर देखा जाता है जब लड़के/लड़कियाँ मोहब्बत में नाकामयाब होते हैं तो सामने वाले यानी अपने महबूब/महबूबा पर तरह तरह के इल्ज़ाम लगाते हैं, क्या ये बात दुरुस्त है? क्या आपको पता है वो शख्स किस तरह का रिश्ता निभा रहा है?
ये भी हो सकता है कि उसके दिल मे आप के लिय कुछ था ही नहीं वो आप से ज़्यादा अल्लाह का खौफ़ रखता हो, और ये भी तो हो सकता है जो इल्ज़ाम अपने लगाए वो झूठे हों। अफसोस की ये शिफत भी आज कल के उन लड़के/लड़कियों मे पाई जाती है जो खुद को मोमिन/मोमिनह कहते हैं।
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया, “जिस ने किसी मोमिन के बारे में ऐसी बात कही जो उसमें नहीं है, तो अल्लाह तआला उस को दोज़खियों के पीप में डाल देगा, यहाँ तक के उस की सजा पा कर उस से निकल जाए।” [अबू दाऊद: 3597]
4. चौथी बात, जब हम किसी से एक तरफा उम्मीदें रखते हैं और वो उम्मींदें खत्म हो जाती हैं तो उस शख्स के खिलाफ झूठी बातें गढ़ते हैं, नफ़रत, जलन, बद-जुबानी जैसे गुनाहों में मुलव्विस हो जाते हैं, लोगों में बदनाम करने लग जाते हैं। मोमिन तो ऐसा नहीं होता।
रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, "बद गुमानी से बचो क्योंकि बद गुमानी सबसे ज्यादा झूठी बात है, किसी के ऐब मत तलाश करो और ना जासूसी करो (दौलत,नुमाइश में) मुकाबला बाजी ना करो, हसद ना करो, बुग्ज (नफरत) ना रखो, एक दूसरे से मुंह ना फेरो, और अल्लाह के ऐसे बंदे बन जाओ जो आपस में भाई भाई हैं।" [सहीह मुस्लिम 6536]
5. पांचवी और सबसे बड़ी बात है सब्र। हम अक्सर कहते हैं "हमने सब्र किया" लेकिन दर हकीकत हम सब्र का हक़ अदा ही नहीं कर पाते, क्यों कि हमें पता ही नहीं होता सब्र होता क्या है? हमे इसका सही मतलब नहीं पता। दिल और उम्मीदें टूटने पर रोना, चीखना, चिल्लाना, बुरा भाला कह कर हम अपने दिल को तसल्ली दे रहे होते है और ये सब्र के बरअक्स है। सब्र का माना ये है के बंदा तकलीफ़ मे अल्लाह की तरफ रुजू करे, उससे मदद मांगे पर हम लोगों के सामने अपना रोना रो रहे होते है दूसरों की बुराई कर रहे होते हैं। अल्लाह का फ़रमान है, "सब्र और नमाज़ से मदद लो, और बेशक यह (नमाज़) बहुत मुश्किल है, लेकिन उन लोगों के लिए नहीं जो आजिज़ी करते हैं।" [कुरान 2: 45]
सबसे पहली बात इस दर्द का इंतिखाब आपने खुद किया था अल्लाह तो गैर मेहरम के बारे में सोचने तक कि इजाज़त नहीं देता और आपने उसे दिल में बिठा लिया और फिर अपनी गलतियों को आज़माइशों का नाम दें दिया।
सलाह:
हमारे समाज मे लड़का/लडकी की पसंद को कोई अहमियत नहीं दी जाती जब के इस्लाम दोनों की पसंद को तरजीह देता है और वो निकाह हराम है जिसमें दोनों की रजामंदी ना हो। जब वो अपनी पसंद का इज़हार करते हैं तो परिवार के लोग खिलाफ हो जाते हैं, ज़्यादातर घरों में यही देखा जाता है कि वालदेन अपने बच्चों के ख़ुद की पसंद को सिरे से ही इंकार कर देते हैं बाद में इसके संगीन नतीज़े भुगतने पड़ते हैं इसलिए बेहतर ये है कि आप अपने फैसले अल्लाह के जि़म्मे छोड़ कर मुतमईन रहे, अल्लाह पर मुकम्मल तवक्कुल करें। इसके अलावा इन बातों पर गौर करें -
1. अगर आप किसी से निकाह में दिलचस्पी रखते हैं तो सबसे पहले अल्लाह से दुआ करें क्यूँ कि आपके मसले सिर्फ अल्लाह ही हल कर सकता है उसके सिवा किसी में ताकत नहीं कि किसको आपका कर दे या जो आपको मिलना है उससे दूर कर दे।
2. अपनी पसंद की ल़डकी/लड़के को साफ़ साफ़ लफ़्ज़ों मे निकाह का पैगाम पहुंचाये और मुमकिन ना हो तो खुद भी कह दे अगर जवाब हाँ है तो दिल्लगी नहीं बल्कि निकाह की तैयारी करें।
3. अगर जवाब ना मे हो तो दूरी बढ़ा लें, सब्र करें और अपने हक़ में दुआ करते रहें। क्योंकि "अल्लाह सब्र करने वालों को पसंद करता है।" [कुरान 2: 153]
4. कई दफा कुछ मजबूरियां होती हैं जिससे सामने वाले को कुछ वक्त चाहिए होता है तब उसे वक्त दें पर ख्याल रहे ऐसी कोई बात ना करें जिससे शैतान जिना का रास्ता खोलने में कामयाब हो जाए, हराम रिश्ते से बचें।
5. दुआ और सब्र का दमन थाम कर अल्लाह तआला पर मुकम्मल तवक्कल करें, सही वक्त का इंतजार करें। "बेशक अल्लाह उनसे मुहब्बत करता है जो उस पर तवक्कल करते हैं।" [कुरान 3:159]
6. ऐसा कोई काम ना करें जिससे आपका दामन दागदार हो, आपके अपने शर्मशार हों, समाज में उनका सर झुक जाय और मुस्तक़बिल बर्बाद हो जाए और अल्लाह नाराज़ हो क्यों कि "अल्लाह पाक रहने वालो से मुहब्बत करता है।" [कुरान 9: 108]
7. अगर जानें अंजाने में कोई गुनाह किया हो या किसी ना मेहरम के टच में रहें हों तो कसरत से तौबा करें क्योंकि "बेशक अल्लाह उनसे मुहब्बत करता है जो बहुत तौबा करते हैं।" [कुरान 2: 222]
अल्लाह अपने बन्दों पर उसकी ताकत से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। शुक्र, सब्र और हिकमत से काम लें और दुआ करते रहें अल्लाह हम सभी भाई बहनों को हिदायत दे और ज़िना जैसी बदतरीन बुराई से दूर रखे।
By Islamic Theology
2 टिप्पणियाँ
माशाअल्लाह आप जो बाते लिख्खी है बीलकूल सही ओर दुरश्त है. जजाकल्लाहु. खैरन
जवाब देंहटाएं👌
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।