Namaz- jahannam se najaat ka rasta

Namaz jahannam se najaat ka rasta


नमाज़ की एहमियत (नमाज़ जहन्नम से नजात)

इरशादे बारी त'आला है:

"यक़ीनन जो अल्लाह के साथ शिर्क करता है अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है और उस का ठिकाना दोज़ख़ है।" 
[क़ुरान 5 : 74]


नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने फरमाया:

"जो इस हाल में फोत (मरा) हुआ के अल्लाह के साथ कुछ भी (किसी को भी) शरीक करता था वो दोज़ख़् में जाएगा।" 
[सहीह मुस्लिम : 93]


कुरान और सही हदीस से हमें पता चला कि जो शिर्क करता है वह जहन्नम में जायेगा। अल्लाह ने उस पे जन्नत हराम क़रार दे दी। 

नमाज़ छोड़ना एक शिरकिया अमल हैं और नमाज़ जानबूझकर छोड़ने वाला जहन्नम में जाएगा इस सिलसिले में कुरान क्या कहता है-

अल्लाह फरमाता है:


وَ اَقِيْمُوا الصَّلٰوةَ وَلَا تَکُوْنُوْا مِنَ الْمُشْرِکِيْنَ
"और नमाज कायम करो और मुशरिको में से ना हो जाओ।" 
[क़ुरान 30 : 31]


दी गई आयत से पता चला नमाज छोड़ना शिर्क है। अंदाज़ा लगाओ शिर्क की माफी नहीं। आज हम कितने वक्त नमाज छोड़कर शिर्क करते हैं। 

एक मुशरिक वह होता है जो सिरे से अल्लाह को नहीं मानता लेकिन एक मुशरिक वह है जो अल्लाह को मानकर भी शिर्क कर रहा है अब अंदाजा लगाओ कौन ज्यादा गुनाहगार होगा। 

मुसलमानों में ऐसे भी लोग हैं जो मुसलमान होने के साथ-साथ शिर्क करते हैं। 

अल्लाह फरमाता है:


"अक्सर लोग ईमान नहीं रखते मगर शिर्क करते हैं।" 
[क़ुरान 12 : 106]


यानी मुसलमान ईमान लाने के बाद भी शिर्क कर सकतें है। नमाज़ छोड़ना भी एक शिर्क हैं लिहाज़ा मुस्लिम होने के साथ साथ मुशरिक भी हैं। 

अल्लाह फरमाता है:


مَا سَلَکَکُمْ فِيْ سَقَرَ قَالُوْا لَمْ نَکُ مِنَ الْمُصَلِّيْنََ
"(और कहेँगे ) तुम्हें क्या चीज दोजख़ में ले गई कहेंगे हम नमाज नहीं पढ़ते थे।" 
 [क़ुरान 74 : 42-43]


आयत से वाज़ेह है नमाज़ को छोड़ने वाले को अपने किये पर पछतावा होगा, वो जहन्नम में जाने का ये सबब बयान कर रहें हैं की नमाज़ नहीं पढ़ते थे। अंदाजा लगाओ अगर हम नमाज़ छोडेंगे तो क्या हम बच जायेंगे?

एक मक़ाम पर अल्लाह तआला फरमाता हैं :-


اِنَّ الۡمُنٰفِقِيۡنَ فِى الدَّرۡكِ الۡاَسۡفَلِ مِنَ النَّارِ‌ ۚ وَلَنۡ تَجِدَ لَهُمۡ نَصِيۡرًا
"कुछ शक नहीं मुनाफिक़ जहन्नम के निचले दर्जे में होंगे और तुम इनका किसी को मददगार नहीं पाओगे।" 
[क़ुरान 4 : 145]


क्या नमाज छोड़ने वाला भी मुनाफिक है?

यानी मुनाफिक लोग जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे अब आइए जान लेते हैं क्या नमाज छोड़ने वाला भी मुनाफिक है?

 इस मुतालिक नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की हदीस है-


नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया,
"मुनाफ़िक़ों पर फ़ज्र और इशा की नमाज़ से ज़्यादा और कोई नमाज़ भारी नहीं और अगर उन्हें मालूम होता कि उन का सवाब कितना ज़्यादा है (और चल न सकते) तो घुटनों के बल घिसट कर आते और मेरा तो इरादा हो गया था कि मुअज़्ज़न से कहूँ कि वो तकबीर कहे फिर मैं किसी को नमाज़ पढ़ाने के लिये कहूँ और ख़ुद आग की चिंगारियाँ ले कर उन सब के घरों को जला दूँ जो अभी तक नमाज़ के लिये नहीं निकले।"
[सहीह बुखारी 657]


अंदाजा तो लगाओ जो इंसान सिर्फ दो वक्त की नमाज को छोड़ता है उसको नबी ने मुनाफिक कहा अब जरा सोचिए जिसने रोज़ाना पांच वक्त की नमाजों का इनकार किया, यहां तक कि पूरी जिंदगी नमाज को नहीं पढ़ा वह कितना बड़ा मुनाफिक होगा?

हैरत तो तब होती हैं की जब एक इंसान सूअर का गोश्त खाने से बेहतर मरना पसंद करता हैं क्योंकि उसका यह ईमान गवारा नहीं करता है कि वह सूअर का गोश्त खाए क्योंकि उसके रब ने तो खाने को मना किया। 

अब जरा सोचो उसी रब ने नमाज को पढ़ने का हुक्म दिया, क्यों हम अल्लाह का हुकुम नहीं मानते?

अल्लाह का हुकुम तो हुकुम होता है चाहे वह नमाज का हो या फिर सूअर के गोश्त की मनाही का हो। 

जैसे कि शैतान ने आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करने से मना किया और कयास करते हुए कहा कि आदम तो मिट्टी का बना हुआ है और मैं आग का बना हुआ हूं, मिट्टी नीचे जाती है आग ऊपर जाती है लिहाजा आग अफजल है मिट्टी से। अल्लाह ने शैतान से कहा इब्लीस क्या सिर्फ तेरे लिए अल्लाह का हुक्म काफी नहीं था। 

यानी शैतान ने जो शैतानी प्रयास किया था कि आदम मुझसे कम अफजल है उसको यह ना देखते हुए बस यह देखना था कि अल्लाह का हुक्म है। अब ठीक उसी तरह से हम मुसलमानों को भी नमाज़ के हुकुम में देखना है कि चाहे सूअर के गोश्त की मनाही का हुकुम हो या नमाज का पढ़ने का हुकुम अल्लाह का हुक्म बराबर है इसको बजा लाने का हमको हुकुम हुआ है। 

अल्लाह नमाज पढ़ने की तौफीक दे। 

जुड़े रहे आगे "नमाज़ क़ुर्ब ए इलाही" पर बात होगी। 

इंशाअल्लाह


आपका दीनी भाई
मुहम्मद

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