Maut ke baad ki zindagi ka inkaar kyun? Part-2

Maut ke baad ki zindagi ka inkaar kyun? Part-2


इंसान मौत के बाद की जिंदगी का इनकार क्यों करता है? पार्ट - 2

हमेशा से आखिरत का इनकार करने वाले लोग जिन वजहों से मौत के बाद की ज़िन्दगी का इनकार करते है उनमें से कुछ वजहों पर चर्चा हम अपने पिछले आर्टिकल में कर चुके है। आज के आर्टिकल में हम मजीद जानेंगे की आखिर इंसान मौत के बाद की जिंदगी का इनकार किन वजहों से करता है।:-


1. आख़िरत का इनकार करने वाले अपनी मर्जी के मुताबिक जिंदगी गुजारने चाहते है।


اَفَرَءَیۡتَ مَنِ اتَّخَذَ اِلٰـہَہٗ ہَوٰىہُ وَ اَضَلَّہُ اللّٰہُ عَلٰی عِلۡمٍ وَّ خَتَمَ عَلٰی سَمۡعِہٖ وَ قَلۡبِہٖ وَ جَعَلَ عَلٰی بَصَرِہٖ غِشٰوَۃً ؕ فَمَنۡ یَّہۡدِیۡہِ مِنۡۢ بَعۡدِ اللّٰہِ ؕ اَفَلَا تَذَکَّرُوۡنَ
"फिर क्या तुमने कभी उस शख़्स के हाल पर भी ग़ौर किया जिसने अपने मन की ख़ाहिश को अपना ख़ुदा बना लिया। और अल्लाह ने इल्म के बावजूद उसे गुमराही में फेंक दिया और उसके दिल और कानों पर मुहर लगा दी और उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया? अल्लाह के बाद अब और कौन है जो उसे हिदायत दे? क्या तुम लोग कोई सबक़ नहीं लेते?"
[कुरआन 45:23]


आख़िरत का इनकार असल में वही लोग करते हैं जो मन की ख़ाहिशों की बन्दगी करना चाहते हैं और आख़िरत के अक़ीदे को अपनी इस आज़ादी में रुकावट समझते हैं। फिर जब वे आख़िरत का इनकार कर देते हैं तो उनका मन की बन्दगी करना और ज़्यादा बढ़ता चला जाता है और वे अपनी गुमराही में दिन-ब-दिन ज़्यादा ही भटकते चले जाते हैं। कोई बुराई ऐसी नहीं होती जिसको करने से वे बाज़ रह जाएँ। किसी का हक़ मारने में उन्हें झिझक नहीं होती। किसी ज़ुल्म और ज़्यादती का मौक़ा पा जाने के बाद उनसे ये उम्मीद ही नहीं की जा सकती कि वे उससे सिर्फ़ इसलिये रुक जाएँगे कि हक़ और इन्साफ़ का कोई एहतिराम उनके दिलों में है। 

जिन वाक़िआत को देखकर कोई इन्सान सबक़ ले सकता है, वही वाक़िआत उनकी आँखों के सामने भी आते हैं, मगर वे उनसे उलटा ये नतीजा निकालते हैं कि हम जो कुछ कर रहे हैं ठीक कर रहे हैं और हमें यही कुछ करना चाहिये। नसीहत की कोई बात उनपर असर नहीं करती। जो दलील भी किसी इन्सान को बुराई से रोकने के लिये फ़ायदेमंद हो सकती है, वो उनके दिल को अपील नहीं करती, बल्कि वे ढूँढ-ढूँढकर सारी दलीलें अपनी इसी बे-क़ैद आज़ादी के हक़ में निकालते चले जाते हैं और उनके दिलो-दिमाग़ किसी अच्छी सोच के बजाय रात-दिन अपने फ़ायदों और ख़ाहिशों को हर मुमकिन तरीक़े से पूरा करने की उधेड़-बुन ही में लगे रहते हैं। ये इस बात का खुला सुबूत है कि आख़िरत के अक़ीदे का इनकार इन्सानी अख़लाक़ के लिये तबाह करनेवाला है। आदमी को आदमियत के दायरे में अगर कोई चीज़ रख सकती है तो वो सिर्फ़ ये एहसास है कि हम ग़ैर-ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि हमें ख़ुदा के सामने अपने आमाल (कर्मों) की जवाबदेही करनी होगी। इस एहसास से ख़ाली हो जाने के बाद कोई आदमी बड़े-से-बड़ा आलिम भी हो तो वो जानवरों से बदतर रवैया अपनाए बिना नहीं रहता।


2. आख़िरत का इनकार करने वाले सीधे रास्ते से हटकर चलना चाहते है।

وَ اِنَّ الَّذِیۡنَ لَا یُؤۡمِنُوۡنَ بِالۡاٰخِرَۃِ عَنِ الصِّرَاطِ لَنٰکِبُوۡنَ 
"मगर जो लोग आख़िरत को नहीं मानते, वो सीधे रास्ते से हटकर चलना चाहते हैं।"
[कुरआन 23:74]


आख़िरत के अक़ीदे के सिवा कोई दूसरी चीज़ ऐसी नहीं है जो इस दुनिया में इन्सान को सीधे रास्ते पर क़ायम रखने की ज़मानत देती हो। अगर कोई शख़्स ये न मानता हो कि उसे मरकर दोबारा उठना है और अपने ख़ुदा के सामने अपने आमाल की जवाबदेही करनी है, तो वो लाज़िमन गुमराह होकर और भटककर रहेगा, क्योंकि उसके अन्दर सिरे से ज़िम्मेदारी का वो एहसास पैदा ही न हो सकेगा जो आदमी को सीधी राह पर जमाए रखता है। इसी लिये शैतान की सबसे बड़ी चाल, जिसके ज़रिए से वो आदमी को अपने फन्दे में फाँसता है, ये है कि वो उसे आख़िरत की तरफ़ से भुलावे में डालता है। उसके इस धोखे से जो शख़्स बच निकले, वो कभी इस बात पर राज़ी न होगा कि अपनी असली हमेशा रहनेवाली ज़िन्दगी के फ़ायदे को दुनिया की इस थोड़े दिनों की ज़िन्दगी पर क़ुर्बान कर दे। 

इसके बरख़िलाफ़ जो शख़्स शैतान के फन्दे में आकर आख़िरत का इनकारी हो जाए, या कम-से-कम उसकी तरफ़ से शक में पड़ जाए, उसे कोई चीज़ इस बात पर आमादा नहीं कर सकती कि जो नक़द सौदा इस दुनिया में हो रहा है उससे सिर्फ़ इसलिये हाथ उठा ले कि उससे किसी बाद की ज़िन्दगी में नुक़सान पहुँचने का अन्देशा है। दुनिया में जो शख़्स भी गुमराह हुआ है, इसी आख़िरत के इनकार या आख़िरत के बारे में शक की वजह से हुआ है और जिसने भी सीधी राह अपनाई है, उसके सही रवैये की बुनियाद आख़िरत पर ईमान ही पर क़ायम हुई है।


3. आख़िरत का इनकार करने वाले इसी दुनिया की जिदंगी को असल समझते है।


وَ قَالُوۡا مَا ہِیَ اِلَّا حَیَاتُنَا الدُّنۡیَا نَمُوۡتُ وَ نَحۡیَا وَ مَا یُہۡلِکُنَاۤ اِلَّا الدَّہۡرُ ۚ وَ مَا لَہُمۡ بِذٰلِکَ مِنۡ عِلۡمٍ ۚ اِنۡ ہُمۡ اِلَّا یَظُنُّوۡنَ
ये लोग कहते हैं कि “ज़िन्दगी बस यही हमारी दुनिया की ज़िन्दगी है, यहीं हमारा मरना-जीना है और दिनों के आने-जाने के सिवा कोई चीज़ नहीं जो हमें हलाक करती हो,” हक़ीक़त में इस मामले में इनके पास कोई इल्म नहीं है। ये सिर्फ़ गुमान की बुनियाद पर ये बातें करते हैं।
[कुरआन 45:24]


यानी इल्म का कोई ज़रिआ ऐसा नहीं है जिससे उनको सच्चाई का पता लगाकर ये मालूम हो गया हो कि इस ज़िन्दगी के बाद इन्सान के लिये कोई दूसरी ज़िन्दगी नहीं है और ये बात भी उन्हें मालूम हो गई हो कि इन्सान की रूह किसी ख़ुदा के हुक्म से नहीं निकाली जाती है, बल्कि आदमी सिर्फ़ दिनों के गुज़रने से मरकर मिट जाता है। आख़िरत का इनकार करनेवाले ये बातें किसी इल्म की बुनियाद पर नहीं, बल्कि सिर्फ़ गुमान की बुनियाद पर करते हैं। 

इल्मी हैसियत से अगर वे बात करें तो ज़्यादा से ज़्यादा जो कुछ कह सकते हैं, वो बस ये है कि हम नहीं जानते कि मरने के बाद कोई ज़िन्दगी है या नहीं, लेकिन ये हरगिज़ नहीं कह सकते कि हम जानते हैं कि इस ज़िन्दगी के बाद कोई दूसरी ज़िन्दगी नहीं है। इसी तरह इल्मी तरीक़े पर वे ये जानने का दावा नहीं कर सकते कि आदमी की रूह ख़ुदा के हुक्म से निकाली नहीं जाती, बल्कि वो सिर्फ़ उस तरह मरकर ख़त्म हो जाता है जैसे एक घड़ी चलते-चलते रुक जाए। ज़्यादा से ज़्यादा जो कुछ वे कह सकते हैं वो सिर्फ़ ये है कि हम इन दोनों में से किसी के बारे में ये नहीं जानते कि हक़ीक़त में क्या सूरत पेश आती है। 

अब सवाल ये है कि जब इन्सानी इल्म के ज़रिओं की हद तक मरने के बाद की ज़िन्दगी के होने या न होने और रूह निकाले जाने या दिनों के गुज़रने से आप ही आप मर जाने का एक जैसा इमकान है, तो आख़िर क्या वजह है कि ये लोग आख़िरत के आने के इमकान को छोड़कर पूरी तरह आख़िरत के इनकार के हक़ में फ़ैसला कर डालते हैं। क्या इसकी वजह इसके सिवा कुछ और है कि असल में इस मसले का आखिरी फ़ैसला वे दलील की बुनियाद पर नहीं, बल्कि अपनी ख़ाहिश की बुनियाद पर करते हैं? 

चूँकि उनका दिल ये नहीं चाहता कि मरने के बाद कोई ज़िन्दगी हो और मौत की हक़ीक़त मिट जाना और ख़त्म हो जाना नहीं, बल्कि ख़ुदा की तरफ़ से रूह का क़ब्ज़े में लिया जाना हो, इसलिये वे अपने दिल की माँग को अपना अक़ीदा बना लेते हैं और दूसरी बात का इनकार कर देते हैं।


4. दुनिया में मजे की जिंदगी मिल जाना भी आख़िरत का इनकार की वजह बनती है।

अल्लाह फरमाता है:


وَ لَئِنۡ اَذَقۡنٰہُ رَحۡمَۃً مِّنَّا مِنۡۢ بَعۡدِ ضَرَّآءَ مَسَّتۡہُ لَیَقُوۡلَنَّ ہٰذَا لِیۡ ۙ وَ مَاۤ اَظُنُّ السَّاعَۃَ قَآئِمَۃً ۙ وَّ لَئِنۡ رُّجِعۡتُ اِلٰی رَبِّیۡۤ اِنَّ لِیۡ عِنۡدَہٗ لَلۡحُسۡنٰی ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِیۡنَ کَفَرُوۡا بِمَا عَمِلُوۡا ۫ وَ لَنُذِیۡقَنَّہُمۡ مِّنۡ عَذَابٍ غَلِیۡظٍ
मगर ज्यों ही कि सख़्त वक़्त गुज़र जाने के बाद हम इसे अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं, ये कहता है कि “मैं इसी का हक़दार हूँ और मैं नहीं समझता कि क़ियामत कभी आएगी, लेकिन अगर सचमुच मैं अपने रब की तरफ़ पलटाया गया तो वहाँ भी मज़े करूँगा।” हालाँकि इनकार करनेवालों को लाज़िमी तौर से हम बताकर रहेंगे कि वो क्या करके आए हैं, और उन्हें हम बड़े गन्दे अज़ाब का मज़ा चखाएँगे।
[कुरआन 41:50]


قُلِ اللّٰہُ یُحۡیِیۡکُمۡ ثُمَّ یُمِیۡتُکُمۡ ثُمَّ یَجۡمَعُکُمۡ اِلٰی یَوۡمِ الۡقِیٰمَۃِ لَا رَیۡبَ فِیۡہِ وَ لٰکِنَّ اَکۡثَرَ النَّاسِ لَا یَعۡلَمُوۡنَ
ऐ नबी! "इनसे कहो, अल्लाह ही तुम्हें ज़िन्दगी देता है, फिर वही तुम्हें मौत देता है, फिर वही तुमको उस क़ियामत के दिन इकट्ठा करेगा जिसके आने में कोई शक नहीं, मगर अक्सर लोग जानते नहीं हैं।"
[कुरआन 45:26]


यानी जहालत और सोचने-देखने का ग़लत तरीक़ा ही लोगों के आख़िरत के इनकार का असल सबब है, वरना हक़ीक़त में तो आख़िरत का होना नहीं, बल्कि उसका न होना अक़ल से परे है। कायनात के निज़ाम और ख़ुद अपने वुजूद पर कोई शख़्स सही तरीक़े से ग़ौर करे तो उसे ख़ुद महसूस हो जाएगा कि आख़िरत के आने में किसी शक की गुंजाइश नहीं।


5. क्या आख़िरत का इनकार करने से उसका आना रूक जाएगा?

आख़िरत की दलीलें बयान करने के बाद अब सिर्फ इनकार करने वालों से इतना ही कहेंगे कि तुम चाहे उस आख़िरत को मानो या उसका इनकार करो, बहरहाल उसको आना है, और ये एक ऐसी हक़ीक़त है जो तुम्हारे इनकार के बावजूद पेश आकर रहेगी। नबियों (अलैहि०) की पेशगी तंबीह को मानकर उस वक़्त के लिये पहले से तैयारी कर लोगे तो अपना भला करोगे। न मानोगे तो ख़ुद ही अपनी शामत बुलाओगे। तुम्हारे न मानने से आख़िरत आते-आते रुक नहीं जाएगी और ख़ुदा का क़ानूने-अद्ल ख़त्म न हो जाएगा।


اِنَّ عَذَابَ رَبِّکَ لَوَاقِعٌ مَّا لَہٗ مِنۡ دَافِعٍ
"कि तेरे रब का अज़ाब ज़रूर ही आनेवाला है, जिसे कोई दफ़ा करनेवाला नहीं।"
[कुरआन 52:7-8]


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